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Thursday, 6 November 2014

समावेशी विकास की राह में ये बाधाएं हैं खास :-

समावेशी विकास की राह में ये बाधाएं हैं खास :-
शंकर आचार्य
अगर देश का निर्बाध विकास सुनिश्चित करना है तो कुछसमस्याओं पर खासतौर पर ध्यान देकर उनका हल तलाशने की कोशिश करनी होगी।विस्तार से बता रहे हैं शंकर आचार्य
वर्तमान में आर्थिक विषयों पर हो रही तमाम चर्चा बाहरी वित्त पर पड़ रहे दबाव और अर्थव्यवस्था को 5 फीसदी की धीमी विकास दर से उबारने पर केंद्रित है। जैसा कि मैंने पिछले दिनों लिखा भी था, यह काम आसान नहीं है। अब हमें इन तात्कालिक लक्ष्यों से परे मध्यम अवधि के दौरान तेज उच्च और समावेशी विकास दर हासिल करने के बारे में सोचना होगा। बहरहाल अगर मौजूदा बाधाओं पर नजर डाली जाए तो परिदृश्य बहुत बेहतर नहीं नजर आता। इसे प्रबंधनीय स्तर पर बनाए रखने के लिए मैं चार प्रमुख बाधाओं पर अपना ध्यान केंद्रित करूंगा।
रोजगार विरोधी कानून
अप्रत्याशित रूप से प्रतिबंधात्मक श्रम कानूनों (इंदिरा गांधी द्वारा छोड़ी गई सबसे नुकसानदेह गरीब विरोधी विरासत में से एक) में थोड़ी ढील देने के लिए कैबिनेट मसौदा तैयार किए जाने के 20 वर्ष बाद अब तक उस दिशा में जरा भी तरक्की नहीं हो सकी है। जाहिर है इसके परिणाम मोटे तौर पर नकारात्मक ही बने रहे हैं। आजादी के 65 साल बाद देश के 50 करोड़ श्रमिकों में से 90 फीसदी से अधिक असंगठित क्षेत्र के रोजगार के जरिये अपना जीवन बिता रहे हैं। उन्हें रोजगार की सुरक्षा भी प्राप्त नहीं है और उनकी आय भी बेहद कम है। औद्योगिक क्षेत्र के नियोक्ताओं ने तमाम वजहों से नए नियमित कर्मचारियों को भर्ती नहीं किया और उन्होंने श्रम आधरित क्षेत्रों मसलन कपड़ा, वस्त्र, चमड़ा उद्योग, खिलौनों और इलेक्ट्रॉनिक्स आदि क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर परिचालन से परहेज किया जबकि ये क्षेत्र सन 1970 के दशक से ही पूर्वी एशियाई देशों में रोजगार आधारित औद्योगीकरण का सफल जरिया बने हुए थे।
आश्चर्य नहीं कि औपचारिक क्षेत्र में रोजगार में ठहराव आ गया। हाल के वर्षों में यानी वर्ष 2004-05 से 2009-10 के दौरान भी रोजगार बहुत धीमी गति से विकसित हुआ। इस बारे में पर्याप्त आंकड़े मौजूद हैं और कुल रोजगार में कृषि की हिस्सेदारी अस्वाभाविक रूप से ऊंची यानी करीब 50 फीसदी बनी रही, जबकि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी में जमकर कमी आई और वह 15 फीसदी रह गई। युवा आबादी के चलते जिस जननांकीय लाभान्श की बढ़चढ़ कर बात की जाती है वह हमारी खराब श्रम नीतियों के कारण बेकार साबित हो रहा है और बहुत जल्दी वह रोजगार की असुरक्षा, बेरोजगारी और अल्परोजगारी की समस्या में बदल सकता है।
बड़े और मझोले उद्यमों में श्रमिकों को प्रोत्साहन न मिलने ने भी विनिर्माण क्षेत्र के विकास को बुरी तरह प्रभावित किया है। क्षेत्र का जीडीपी में योगदान कई सालों से 15-16 फीसदी पर ठिठका हुआ है। जबकि चीन समेत अन्य एशियाई मुल्कों में यह 30 फीसदी से ज्यादा है। निश्चित तौर अन्य कारक भी इसकी वजह रहे हैं लेकिन श्रम कानूनों से कम।
लुभावनी कल्याण योजनाएं
मोटे तौर पर देखा जाए तो तेज और व्यापक विकास की राह में दूसरा बड़ा रोड़ा है लोकप्रिय राजकोषीय नीतियां और प्रतिस्पर्धी अदूरदर्शी राजनीति। ऐसी राजनीति हर जगह और हर स्तर पर देखने को मिल रही है। इसके दो पहलू हैं: पहला, खराब तरीके से तैयार की गई कल्याण योजनाओं की अपरिपक्व लॉन्चिंग। मसलन काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार आदि। दूसरा, भारी सब्सिडी का माहौल। संप्रग सरकार के कार्यकाल वाले नौ सालों में कल्याण योजनाओं को खूब बढ़ावा दिया गया। जबकि इन उपायों को किफायती और खामी रहित बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया। इसका सीधा मतलब यह है कि विभिन्न योजनाओं में लीकेज, भ्रष्टïाचार और ऐसी अन्य गतिविधियां बनी रहेंगी। इसका नतीजा है राजकोषीय घाटे में इजाफा, बढ़ती महंगाई का जोखिम, भारी भरकम बाहरी घाटा और उच्च ऋण दर तथा कर्ज।
सब्सिडी का लंबा इतिहास रहा है और यह अब भी प्रमुख क्षेत्रों की आर्थिक व्यवहार्यता पर असर डाल रही है। बिजली सब्सिडी (खासकर किसानों की) बिजली क्षेत्र की खस्ता हालत के लिए जिम्मेदार है। इसकी वजह से ही पश्चिमी और उत्तरी भारत में भू-जल स्तर भी खूब गिरा है क्योंकि मुफ्त बिजली होने के चलते लोग खूब पानी निकालते हैं। इसने जल संकट को भी जन्म दिया है। खाद्यान्न सब्सिडी ने कृषि अर्थव्यवस्था में विसंगतियां पैदा की हैं और गैर खाद्य फसलों का विकास रोक दिया है। यूरिया उर्वरक पर बढ़ती सब्सिडी ने मिट्टïी की उर्वर क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारी भरकम डीजल सब्सिडी ने ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है।
शासन-प्रशासन की कमजोरी
शासन और प्रशासन भी बड़ा विषय हैं क्योंकि ये हमारे आर्थिक और सामाजिक जीवन के हर पहलू को प्रभावित करते है

नेपाल को एक अरब डॉलर का क़र्ज़: मोदी

नेपाल को एक अरब डॉलर का क़र्ज़: मोदी


भारत नेपाल को एक अरब डॉलर यानी क़रीब 10 हज़ार करोड़ नेपाली रुपए का रियायती क़र्ज़ देगा. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल की संसद में इसकी घोषणा की.

इस रकम का इस्तेमाल नेपाल अपनी प्राथमिकता के अनुसार कर सकेगा.

नेपाल की संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि नेपाल के साथ भारत के रिश्ते अटूट हैं और भारत पड़ोसी का धर्म निभाने के लिए प्रतिबद्ध है.

इससे पहले मोदी ने नेपाल की संसद में अपना संबोधन नेपाली भाषा में शुरू किया.

कारोबार
मोदी ने दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्ते मज़बूत करने पर ज़ोर दिया. उनका कहना था कि नेपाल को हिट की ज़रूरत है. हिट यानी एचआईटी यानी हाइवेज़, इन्फॉर्मेशन वेज़ और ट्रांसवेज़.

मोदी ने अपने भाषण में नेपाल से बिजली ख़रीदने की इच्छा भी जताई.

उन्होंने कहा, "भारत को बिजली बेचकर नेपाल विकसित देशों में जगह बना सकता है."

उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल के लिए ट्रांसमिशन लाइन दोगुना की जाएगी.

मोदी ने कहा कि नेपाल हर्बल दवाओं का बड़ा निर्यातक बन सकता है और भारत इसमें मदद करने को तैयार है.

'युद्ध से बुद्ध की ओर'

मोदी ने अपने भाषण में कई बार उन सांस्कृतिक प्रतीकों का ज़िक्र किया, जो भारत और नेपाल दोनों के लिए साझा हैं.

मोदी ने नेपाल में शांति प्रक्रिया की तारीफ़ करते हुए कहा, "बुलेट को छोड़कर बैलेट की तरफ बढ़ने के लिए... युद्ध से बुद्ध की तरफ़ जाने के लिए नेपाल को बधाई."

उन्होंने भारतीय सेना के लिए काम करने वाले नेपाली सैनिकों की बहादुरी का भी ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, "मैं उन गोरखा सैनिकों को सलाम करता हूं जिन्होंने भारत के लिए शहादत दी."

मोदी ने कहा कि भारत नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देना चाहता.

नरेंद्र मोदी नेपाली संसद को संबोधित करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री
हैं.
बीबीसी से साभार ।

भारत जापान समझौते

भारत जापान समझौते 
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IAS तथा RAS परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए।

1.जापान ने भारत को बुलेट ट्रेन सहित कई क्षेत्रों में भरपूर मदद देने की घोषणा की। 

2.दोनों देशों के बीच रक्षा आदान-प्रदान, स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा, महिला विकास और राजमार्गों को लेकर कुल पांच समझौते हुए हैं।

3.भारत में 35 अरब डॉलर का निवेश करेगा जापान:

*भारत और जापान ने अपने संबंधों को सामरिक वैश्विक भागीदारीसे बढ़ा कर विशेष सामरिक वैश्विक भागीदारी के स्तर पर ले जाने की घोषणा की और जापान ने अगले पांच वर्षों में भारत में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश करने की घोषणा की।

* यह राशि नए स्मार्ट शहरों के विकास, गंगा और अन्य नदियों की सफाई, कृषि, जल सुरक्षा, परिवहन और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल की जाएगी।

4.लेकिन दोनों देश के बीच असैन्य परमाणु समझौतानहीं हो पाया। असैन्य परमाणु समझौते पर भारत और जापान के बीच समझ बढ़ी है। दोनों नेताओं ने अपने अधिकारियों को बातचीत पूरी करने का निर्देश दिया ताकि रणनीतिक सहयोग मजबूत करने के लिए इस समझौते पर जल्दी हस्ताक्षर हो सकें।

5.छह कंपनियों से प्रतिबंध हटा:

जापान ने 6 प्रमुख भारतीय कंपनियों से प्रतिबंध हटा लिया है।जिससे रक्षा और सैन्य क्षेत्र में दि्वपक्षीय सहयोग बढ़ने की संभावना है। जिन कंपनियों से प्रतिबंध हटाया गया है वे कंपनियां जापान की कंपनियों से मिलकर काम करेंगी और तकनीक का एक दूसरे को हस्तांतरण भी करेंगी। हालांकि जापान ने अभी 4 कंपनियों पर प्रतिबंध जारी रखा है।

योजना आयोग

योजना आयोग खत्म होने के बाद जरूरी है कि उसकी जगह एक सक्षम और प्रभावी संस्था ले। नए संस्थान का संभावित नाम और उसकी रूपरेखा सुझा रहे हैं शंकर आचार्य

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नए संस्थान पर विशेषज्ञों का मंथन
प्रधानमंत्री ने पिछले महीने लाल किले के प्राचीर से जब योजना आयोग को खत्म करने की घोषणा की तब से तमाम टीकाकार इसकी जगह लेने वाले नए संस्थान की संभावित रूपरेखा पर चर्चा करने में व्यस्त हो गए। ऐसे में मैं भी अपने विचार व्यक्त करना जरूरी समझता हूं। मेरा पूरा ध्यान नई संस्था पर होगा, न कि योजना आयोग पर। उसके बारे में तो मैं केवल यही कहना चाहूंगा कि मैं इस व्यापक विचार से सहमत हूं कि वित्तीय संसाधन आवंटन, परियोजनाओं के आकलन और प्रोत्साहन तथा राष्ट्रीय विकास परिषद के सचिवालय के रूप में आयोग की भूमिका को अब अन्य संस्थानों के हवाले कर दिया जाना चाहिए। यह काम विभिन्न मंत्रालयों तथा वित्त आयोग को सौंपा जा सकता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि नए संस्थान की क्या भूमिका होगी? इसमें कर्मचारियों की नियुक्ति कैसे की जाएगी? इसे किस तरह अधिकार संपन्न बनाया जाएगा? इसे किस नाम से पुकारा जाएगा आदि।

कामकाज

इस सिलसिले में अब तक जो भी बातचीत हुई है उसका लब्बोलुआब यही रहा है कि नई संस्था एक तरह का सरकारी थिंकटैंक हो। इस राय से मेरी असहमति यह है कि हमारे देश में सरकारी संस्थानों की प्रवृत्ति थिंकटैंक को खारिज करने की रही है। यहां उनको व्यावहारिक रूप से उपयोगी नहीं माना जाता है। मेरा मानना है कि यहां सरकार का इरादा नीति आधारित संस्थान बनाने का अधिक है जो सरकार को देश के आर्थिक और सामाजिक विकास को लेकर जरूरी सलाह मशविरा दे सके। निश्चित तौर पर ऐसे मशविरे की गहरी छानबीन भी करनी होगी। उसका शोध आधारित विश्लेषण करना होगा। इसमें रचनात्मक सोच जाहिर होनी चाहिए। नए संस्थान से यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह राष्ट्रीय विकास के सभी बड़े मसलों पर तत्काल अपनी राय देना आरंभ कर देगा। सवाल यह उठता है कि उसे आखिर कहां से शुरुआत करनी चाहिए? मेरा सुझाव है कि पहले उसे निम्रलिखित चार पांच प्राथमिकता वाले विषयों के विश्लेषण और इन पर सुझाव देना शुरू करना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का विश्लेषण: हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जो तेजी से बदल रही है। यहां आर्थिक शक्ति, कारोबार, तकनीक और पूंजी का प्रवाह प्राय: बेहद सहज होता है। भारत की विकास संबंधी संभावनाओं, नीतियों और बाधाओं को लेकर इसके गहरे निहितार्थ हैं। इसके बावजूद मौजूदा सरकार का कोई विभाग इनके आकलन के लिए तैयार नहीं है। नया संस्थान इसके लिए बेहतर जगह हो सकता है।

रोजगार और श्रम बाजार: हर वर्ष देश की श्रम शक्ति में शामिल होने वाली एक करोड़ से अधिक की युवा आबादी के लिए रोजगार तैयार कर पाना देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। समावेशन का सबसे बेहतर तरीका है श्रम आधारित आर्थिक विकास करना। नए संस्थान को रोजगार आधारित विकास के मार्ग की बड़ी बाधाओं पर पहले ध्यान देना होगा और फिर उनसे निपटने की नीति तैयार करनी होगी।

ऊर्जा और पर्यावरण: जैसा कि हमें रोज अखबारों से पता चलता है, भारत के सामने पर्यावरण और उसके संरक्षण के क्षेत्र में ऊर्जा उत्पादन, कीमत निर्धारण, मांग प्रबंधन, कोयला, जलविद्युत, तेल एवं गैस, नाभिकीय ऊर्जा, बिजली और सौर ऊर्जा एवं अपारंपरिक माध्यमों को लेकर तमाम दिक्कतें हैं। इन तमाम मुद्दों पर सतत और स्तरीय विश्लेषण की आवश्यकता है ताकि देश के विकास के लिए बेहतर नीतियां तैयार की जा सकें।

परिवहन एवं संचार: इसी तरह, परिवहन और संचार क्षेत्र का विकास भी कई क्षेत्रों मसलन, रेल, सड़क, बंदरगाह, जहाजरानी, हवाई परिवहन, दूरसंचार आदि में बंटा हुआ है। इसके लिए अलग अलग मंत्रालय जवाबदेह हैं। यहां भी माध्यम और लंबी अवधि का सोच आवश्यक है क्योंकि उसकी मदद से ही सही ढंग की नीतियां और तेज नियामकीय और नीतिगत ढांचा तैयार किया जा सकेगा। ऊर्जा और पर्यावरण के मामले में तत्काल विश्लेषण करने और ध्यान देने की आवश्यक है। नए संस्थान को यह मुहैया कराना चाहिए।

जल, स्वच्छता और जन स्वास्थ्य: पानी की कमी और उसका कुप्रबंधन ग्रामीण और शहरी विकास दोनों के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। पानी कई चीजों से जुड़ा हुआ है। इसमें सफाई और नाली आदि की व्यवस्था भी शामिल है। अब इन पर गंभीरता से ध्यान दिया जा रहा है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि ये जनस्वास्थ्य से बहुत करीबी से जुड़े हुए हैं। एक बार फिर इन समस्याओं की परस्पर विरोधी क्षेत्रों से जुड़ी छवि दिक्कत की वजह बनेग

भारतीय अर्थव्यवस्था- स्थिति और चुनोतियाँ

भारतीय अर्थव्यवस्था- स्थिति और चुनोतियाँ
भारत में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्ण बहुमत वाली केंद्र सरकार बनने के बाद देश में ही नहीं बल्कि विश्व भर में एक उम्मीद की लहर दौड़ती दिखाई दे रही है.

लोग आस लगाए हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में पिछले कई वर्षों से लगातार बढ़ती महंगाई और दयनीय आर्थिक स्थिति को जल्दी ही दुरुस्त करने के लिए ठोस कदम उठाएंगे.

विदेशी निवेशक, जो पिछली केंद्र सरकार के एक दशक लंबे शासन के अंतिम दिनों तक भी अपूर्ण रह गई अनगिनत परियोजनाओं और व्यापक होते भ्रष्टाचार की वजह से निराश बैठे थे, अब उत्साहित हैं कि भारत के औद्योगिक विकास में तेज़ी आएगी.

निश्चित रूप से केंद्र सरकार में इतने लंबे अरसे के बाद एक बड़ा बदलाव होने से यह उत्साह स्वाभाविक है, लेकिन क्या सिर्फ़ प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल बदल जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल कमज़ोरियाँ और अक्षमताएँ इतनी जल्दी दूर की जा सकती हैं?

भारतीय अर्थव्यवस्था की असलियत और संभावित बाधाओं पर एक रिपोर्ट

विश्व बैंक जैसे कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने आगाह किया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है और आने वाले वर्षों में इस नई सरकार को अत्यधिक सतर्क और विषम परिस्थितियों के लिए तैयार रहना होगा. देखिए, आँकड़े क्या कहते हैं:

भारत बनाम चीन

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की हाल ही की रिपोर्ट दर्शाती है कि राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था आँकने के कई मापदंडों में भारत गंभीर रूप से पिछड़ा हुआ है.

रिपोर्ट यहाँ तक कहती है कि भारत की अर्थव्यवस्था आपातकालीन दौर से गुज़र रही है. इस रिपोर्ट ने 144 देशों की आर्थिक स्थिति और भविष्य में उनकी विकास दरों की संभावनाओं को आँका है.

भारत इन देशों में 71वें स्थान पर है, जो इसी रिपोर्ट के पिछले संस्करण से 11 स्थान नीचे चला गया है.

यही नहीं, पिछले 6 वर्षों से भारत लगातार इन मापदंडों में फिसलता जा रहा है.

एशिया के दो सबसे विकासशील देशों– चीन और भारत के आर्थिक विकास को अक्सर एक स्पर्धा की तरह देखा जाता है.

2007 में भारत चीन से सिर्फ़ 14 स्थान पीछे था और अब यह फासला 43 स्थानों का हो गया है. दो दशक पहले भारत का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद चीन से अधिक था, लेकिन अब चीन भारत से चार गुना अधिक धनी देश है. कौन से कारण हैं जो भारत को लगातार पीछे धकेल रहे हैं?

अच्छी विकास दर ज़रूरी

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार एक देश की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक एक अच्छी विकास दर बनाए रखने के लिए तीन चरणों से गुज़रना पड़ता है.

पहला, मूल आधारिक संरचना, यानी स्वास्थ्य और शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं. इनके साथ ही वृहत आर्थिक स्थिति – महंगाई, राजकोषीय घाटा और आयात-निर्यात तंत्र, आदि को भी सुदृढ़ रहना चाहिए.

इन दोनों मापदंडों में भारत की स्थिति दयनीय है. इसको बदलने के लिए सरकारी व निजी संगठनों की सक्रियता, आपसी तालमेल और नौकरशाही तंत्र का सक्रिय होना आवश्यक है.

इस बुनियादी संरचना के कमज़ोर होने से कोई भी अर्थव्यवस्था देर-सवेर ज़रूर लड़खड़ा जाएगी.

भारत की कुख्यात लालफ़ीताशाही और राजनीतिक खींचातानियों को देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था की नींव ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है.

कृषि में तकनीक बढ़े

उदाहरण के लिए, वर्ल्ड बैंक के आकलन के अनुसार भारत में कोई भी परियोजना या व्यापार शुरू करने के लिए औसतन 12 औपचारिकताएं और एक महीने का समय लगता है.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 144 देशों की रैंकिंग में इस मापदंड में भारत तकरीबन सभी देशों से पीछे है.

एक और बड़ी खामी यह है कि भारत की विशाल जनसंख्या के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में कर्मियों की संख्या में बहुत असमानताएँ हैं.

लगभग हर कृषि-प्रधान देश धीरे-धीरे अन्य उद्योगों और उत्पादन-प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर अग्रशील होता है.

यह प्रक्रिया बढ़ती जनसंख्या और तकनीकी विकास की देन है. भारत की पहली समस्या यह है कि वह खेती पर निर्भर देश की 54 प्रतिशत जनता को पिछले कई दशकों से पर्याप्त संरचनात्मक सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाया.

यही वजह है कि देश की आधी से ज़्यादा आबादी का सकल घरेलू उत्पाद में सिर्फ़ 14 फीसदी योगदान है.

दूसरी तरफ, कम आय से परेशान और नए उद्यमों की ओर आकर्षित युवाओं को पर्याप्त शिक्षा और प्रशिक्षण मुहैया नहीं हो पा रहा है, इस कारण नए उद्योगों को सक्षम इंजीनियर, मैकेनिक, आदि नहीं मिलते.

बुनियादी सुविधाओं की कमी

बिजली, पानी, और औद्योगिक ऊर्जा जैसी बुनियादी चीज़ें भारत में वैसे भी विकट समस्याएँ हैं और नई परियोजनाओं को शुरू करने में बड़ी बाधा बनती हैं.

भारत के पास काम करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन उनको खपाने और उनका लाभ उठाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.

नतीजतन श्रम-सक्षमता के आंकड़े में भारत 144 देशों में 121वें स्थान पर है. यह विसंगति देश में आय असमानता और अमीर-गरीब के बीच लगातार चौड़ी होती खाई का भी कारण है.

नरेंद्र मोदी से आशाएं हैं कि वे ‘अच्छे दिनों’ को जल्दी ही ले आएंगे. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने प्रदेश में विकास की दिशा में बहुत कार्य किए, किन्तु पूरे देश की अर्थव्यवस्था के ढांचे को बदलना इतना आसान नहीं होगा.

सिर्फ़ नई योजनाएं बनाना काफी नहीं, उनको लागू करने के लिए इन मूल समस्याओं पर ध्यान देना ज़्यादा ज़रूरी है.

निवेशकों में उत्साह

केंद्र में सरकार बदलने के बाद निवेशकों के उत्साह के कुछ संकेत दिखाई देने लगे हैं.

शेयर बाज़ार का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स नई ऊंचाइयों को छू रहा है, लेकिन यह याद रखना होगा कि विदेशी निवेश, जो इस बढ़ोत्तरी का एक बड़ा कारण है, अमरीका और यूरोप के विकसित देशों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है.

अभी उन देशों की मौद्रिक नीति नरम है और ब्याज दरें बहुत कम, जिस कारण निवेशकों और उपभोक्ताओं दोनों को पैसा आसानी से उपलब्ध है.

जैसे-जैसे विश्व इस लंबी आर्थिक मंदी के दौर से उबरेगा, विकसित देशों में ब्याज दरें बढ़ेंगी. उस समय निवेशक निश्चय ही भारत की मूल कमजोरियों पर ज़्यादा ध्यान देंगे.

सतही तौर पर भारत अपने निजी आर्थिक संकट से निकलता लगता है, लेकिन देश की विकास क्षमता और स्थिरता की असली परीक्षा अभी बाकी है

(राष्ट्रपति शी चिनफिंग)

(राष्ट्रपति शी चिनफिंग)
मैंने 17 साल पहले भी प्राचीन व रहस्यमय भारत की यात्र की थी। उस वक्त भारत आर्थिक सुधारों की नीति को आगे बढ़ा रहा था और आर्थिक विकास के क्षेत्र में नई उम्मीद दिख रही थी। भारत का प्रमुख समृद्ध वाणिज्यिक शहर मुंबई, सिलिकॉन वैली बेंगलूर और बॉलीवुड की फिल्में व योग विश्व भर को प्रभावित करते रहे हैं। भारतीय जनता को अपने भविष्य के प्रति बहुत सारी उम्मीदें हैं। पुरानी सभ्यता में पुन: युवा शक्ति का जोश दिखने लगा है। 17 साल बाद फिर एक बार मैं इस सुंदर भूमि पर कदम रखूंगा। आज का भारत एक उल्लेखनीय नवोदित बाजार और बड़ा विकासशील देश बन चुका है। यह एशिया का तीसरा बड़ा आर्थिक समुदाय, विश्व का दूसरा बड़ा सॉफ्टवेयर पॉवर और कृषि उत्पादों का निर्यातक देश भी है। भारत संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और ब्रिक्स आदि संगठनों का भी सदस्य है। भारत की कहानी लोगों की जुबान पर गूंजती रहती है। भारत में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद विकास व आर्थिक सुधारों का रुझान तेज हुआ है। आज अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत में मौके तलाश रहा है।

नई सदी में प्रवेश करने के बाद चीन-भारत संबंधों का व्यापक विकास हुआ है। दोनों देशों ने शांति व समृद्धि की दिशा में रणनीतिक सहयोग आधारित साङोदारी संबंध स्थापित किए हैं। चीन भारत का सबसे बड़ा बिजनेस भागीदार बन चुका है। द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2000 में तीन अरब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अब लगभग 70 अरब अमेरिकी डॉलर पर पहुंच चुका है। पिछले साल दोनों देशों के 8 लाख 20 हजार नागरिकों ने एक-दूसरे के यहां दौरा या पर्यटन किया। जलवायु परिवर्तन, खाद्यान्न सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा जैसे वैश्विक समस्याओं पर दोनों देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग है। इसके साथ ही द्विपक्षीय संबंधों तथा विकासशील देशों के समान हितों की रक्षा के लिए कारगर पहल हुई है। दोनों देशों के बीच सीमा वार्ता को लेकर भी सक्रिय प्रगति हुई है। दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्र में अमन-चैन स्थापित करने की पूरी कोशिश की है। चीन-भारत संबंध 21वीं सदी में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सक्रिय द्विपक्षीय संबंधों में से एक बन चुका है। चीन और भारत के बीच अच्छे रिश्ते जरूरी हैं। हम एक-दूसरे पर भरोसे के सिद्धांत को अपनाकर रणनीतिक संपर्क को निरंतर मजबूत करने के साथ-साथ परस्पर विश्वास को और प्रगाढ़ करने के प्रति संकल्पबद्ध हैं। इसके साथ ही हम मतभेदों का निपटारा करने के लिए संकल्पबद्ध हैं।

वर्तमान में चीन और भारत सुधार व विकास के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। चीनी जनता अपने राष्ट्र के महान पुनरुत्थान के चीनी सपने को साकार करने के लिए कठिन मेहनत कर रही है। चीन सुधार को सर्वागीण रूप से अपना रहा है और आगे बढ़ रहा है। वहीं चीनी विशेषता वाली समाजवादी प्रणाली में सुधार व विकास करने, देश की प्रशासनिक व्यवस्था के आधुनिकीकरण के काम को आगे बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया है। चीन ने 15 क्षेत्रों में 330 से अधिक सुधार के कदम उठाए हैं। हमारी सरकार अब इन नीतियों को आगे बढ़ा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत की नई सरकार ने नौकरशाही को दुरुस्त करने और देश के आधारभूत ढांचे में सुधार के लिए 10 प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं। भारत एकजुट, शक्तिशाली व आधुनिक देश के तौर पर अपने महान राष्ट्र का निर्माण करने में लगा हुआ है।

चीन व भारत के राष्ट्रीय पुनरुत्थान का सपना एक-दूसरे से मिलता-जुलता है। हमें शक्तिशाली व समृद्ध देश के सपने को साकार करने की कोशिश करनी चाहिए। विभिन्न श्रेष्ठताओं वाले नवोदित बाजारवादी देश के तौर पर हमें विकास के लिए और अधिक साङोदारी की जरूरत है। हमें एक-दूसरे की खूबियों से सीख कर अपनी कमियों को दूर करते हुए आगे विकास करना चाहिए। नियादी संरचनाओं के निर्माण और प्रसंस्करण उद्योग के क्षेत्र में चीन के पास अधिक व्यापक अनुभव है। इन क्षेत्रों में चीन भारत के विकास में बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। भारत में सूचना व दवा उद्योग बहुत विकसित है। हम भारतीय कारोबारियों का चीन के बाजार में निवेश करने के लिए स्वागत करते हैं। विश्व का कारखाना और विश्व का दफ्तर यदि एक साथ आते हैं तो हम दुनिया में सर्वाधिक प्रतिस्पर्धी उत्पादन केंद्र बन सकते हैं और सबसे आकर्षक उपभोक्ता बाजार तैयार कर सकते हैं। चीन और भारत को एशियाई अर्थव्यवस्था के दो इंजन होने के कारण आर्थिक विकास में परस्पर साङोदारी बढ़ानी चाहिए। मुङो विश्वास है कि चीनी ऊर्जा और भारतीय बुद्धिमत्ता का मिलन हो जाए तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। एशियाई अर्थव्यवस्था के अनवरत विकास को आगे बढ़ाने के लिए हम बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक कॉरिडोर के निर्माण को आगे बढ़ाएंगे, जबकि सिल्क रोड आर्थिक जोन और 21वीं शताब्दी में समुद्री सिल्क रोड के आान पर भी चर्चा करेंगे। वैश्विक बहुध्रुवीकरण की प्रक्रिया में दो बड़ी और महत्वपूर्ण शक्तियां होने के कारण हमें रणनीतिक सहयोग वाली वैश्विक साङोदारी करनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का मानना है कि चीन व भारत दो शरीर और एक भावना हैं। मैं इससे सहमत हूं। हालांकि चीनी ड्रैगन और भारतीय हाथी की भिन्न-भिन्न विशेषताएं हैं, फिर भी दोनों देश शांति, निष्पक्षता और न्याय के पक्षधर हैं।

हमें पंचशील सिद्धांत का प्रसार करके अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को और अधिक निष्पक्ष व सही दिशा में विकसित करने की कोशिश जारी रखनी चाहिए। वहीं युग के विकास और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की समान मांग को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को बेहतर ढंग से हल करने की आवश्यकता है चीनी नेता देंग ने कहा था, एशिया की सदी का सपना चीन-भारत और अन्य पड़ोसी देशों के विकास के बाद ही साकार हो सकेगा। हम इस युग प्रदत्त जिम्मेदारी को निभाते हुए चीन-भारत मैत्री की प्रेरणाशक्ति बनने को तैयार हैं। भारत यात्र के दौरान शांति व समृद्धि की दिशा में उन्मुख चीन-भारत रणनीतिक सहयोग आधारित साङोदारी संबंधों में नई प्रेरणा शक्ति डालने के लिए मैं भारतीय नेताओं के साथ दोनों देशों के बीच रिश्तों पर गहन आदान-प्रदान की प्रतीक्षा में हूं। मुङो विश्वास है कि अगर चीन व भारत एकजुट होकर सहयोग करते रहे तो एक समृद्ध व पुनर्जीवित एशिया की सदी अवश्य ही जल्द साकार होगी।

भारत और चीन के रिश्ते

भारत और चीन के रिश्ते ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. आजादी के बाद 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारे से स्टैपल वीज़ा पर उपजे विवाद तक.

इस बीच दोनों मुल्कों की एक जंग हुई और बातचीत की मेज पर अक्साई चीन समेत अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे भी आते रहे.

लद्दाख में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबरों से लेकर दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन का सवाल अखबारों की सुर्खियां बटोरता रहा है.

लेकिन अब नई सरकार विदेश नीति के मोर्चे पर सक्रिय दिख रही है और पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को पटरी पर लाने की पहल ज़मीन पर देखी जा सकती है.

इन्हीं कोशिशों की ताजा कड़ी है शी जिनपिंग का भारत दौरा.

और मोदी और शी जिनपिंग की दोस्ती रूमानी हो, इसके लिए सात बाहरी कारणों को समझना जरूरी है.

जापान से मुकाबला और अहमदाबाद

जापान की सौ कंपनियों ने भारत में निवेश करने की योजना बना रखी है. उनमें से 50 ने इस दिशा में कदम भी बढ़ा दिए हैं.

जापान के कारोबारी संगठन 'जेट्रो' ने अहमदाबाद में पिछले साल अपना दफ्तर खोला है.

यह जापान की चीन से प्रतिस्पर्द्धा है जिसकी वजह से शी जिनपिंग ने भारत दौरे की शुरुआत के लिए अहमदाबाद को चुना है न कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से किसी लगाव की वजह से.

जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने मुंबई को अहमदाबाद से जोड़ने वाले रेल लिंक के लिए बुलेट ट्रेन देने पर सहमति भी दी है.

भारत पर आबे के असर को चुनौती

चीन ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वह इस मुद्दे पर किस हद तक जा सकता है.

चीन के एक मंत्री ने हाल ही में भारत को एक नाभिकीय संयंत्र बनाने में मदद की पेशकश की थी.

इस पेशकश के पीछे विचार जापान के तरफ से आने वाले ऐसे किसी प्रस्ताव को बेअसर करना था.

चीन भी भारत को 100 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता देना चाहता है.

यह रकम हाल ही में जापान दौरे पर मोदी को आबे की ओर से मिली पेशकश की तकरीबन तीन गुनी है.पाकिस्तान में अस्थिर सरकार

चीन की सीमा में अतिक्रमण करने वाले इस्लामी चरमपंथियों से निपटने का सवाल हो या फिर भारत पर दबाव बनाने की जरूरत हो, इन दो मुद्दों पर चीन हमेशा से पाकिस्तान पर निर्भर रहा है.

लेकिन हाल के समय में पाकिस्तान की अहमियत चीन की नज़र में कम हुई है.

नवाज़ शरीफ की सरकार विपक्ष के विरोध की वजह से अस्थिर नजर आ रही है.

नवाज़ शरीफ चरमपंथियों पर थोड़ा असर रखते हैं जो उन पर लगाम रखने के लिए जरूरी है.

हिंद महासागर से जुड़ने की चीन की चाह

श्रीलंका और मालदीव में चीन की मौजूदगी भारत पर दबाव डाल रही है. दोनों ही देशों ने चीन के मैरीटाइम सिल्क रूट में शामिल होने पर सहमति दी है. भारत इससे सहमत नहीं है.

माले एयरपोर्ट की कमान चीन के हाथ में है. मालदीव शंघाई कॉरपोरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन में शामिल होना चाहता है जिसमें भारत और पाकिस्तान एक प्रेक्षक की भूमिका में हैं न कि सदस्य की हैसियत से.

माले ने सार्क में चीन को अपनी भूमिका बढ़ाने में मदद देने पर सहमति दी है. बदले में चीन ने मालदीव के आंतरिक मामलों में दखल न देने का वादा किया है, जाहिर है इसका सरोकार भारत से है.

श्रीलंका और मालदीव, दोनों ही हिंद महासागर में चीन को रास्ता देने के सवाल पर संजीदा हैं.

वियतनाम के साथ भारत का सौदा, चीन की चिंता

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की हाल की हनोई यात्रा में चौंका देने वाला समझौता हुआ है.

भारत 'साउथ चाइना सी' में तेल खनन के लिए वियतनामी कंपनी के साथ उतरेगा.

ऐसे ही एक सौदे का चीन ने ज़बरदस्त विरोध किया था और दो साल पहले वियतनाम ने अपने पांव वापस खींच लिए.

चीन और वियतनाम दोनों ही समुद्र के एक हिस्से पर दावा करते हैं. इस नए समझौते ने चीन पर ज़बरदस्त दबाव डाला है और इस विवाद में वियतनाम का पक्ष मजबूत कर दिया है.

यह पहली बार है कि भारत ने चीन से निपटने के लिए किसी और देश का इस्तेमाल किया है.

पर्यावरण और डब्ल्यूटीओ के सवाल पर पश्चिमी देशों का दबाव

पर्यावरण में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय कारोबारी मुद्दों पर भारत और चीन ने एक साथ काम करके बड़ी कामयाबी के साथ पश्चिमी देशों को किनारे कर दिया था.

उनके साथ आने से विकासशील देशों की आवाज़ भी बुलंद हुई.

विश्व व्यापार संगठन में भारत को उस वक्त एक बड़ा झटका लगा जब उसने एक प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया लेकिन इस मुद्दे पर चीन ने उसका साथ नहीं दिया.

लेकिन इन मुद्दों पर अलग प्राथमिकताओं वाले पश्चिमी देशों से निपटने के लिए दोनों ही देशों को एक दूसरे की जरूरत है.

ब्रिक्स और एससीओ

ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के संगठन 'ब्रिक्स' में चीन एक नेता के तौर पर उभरा है.

उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों को अमरीकी प्रभाव से दूर रखने और अपना असर बढ़ाने के मद्देनज़र ब्रिक्स चीन की जरूरतों पर खरा उतरता है.

पांच देशों के क्लब के अघोषित नेता की अपनी हैसियत बरकार रखने और ब्रिक्स बैंक की योजना को कामयाब करने के लिए शी जिनपिंग को मोदी की मदद की जरूरत होगी

मैक इन इंडिया : एक मुल्यांकन

मैक इन इंडिया : एक मुल्यांकन 

IAS तथा RAS परीक्षा हेतु

अ )क्या है मैक इन इंडिया 
ब )आवश्यकता क्यों
स ) प्रमुख बिंदु 
द ) लाभ 
य )चीन से भिन्नता 
र ) बाधाएँ
व ) निष्कर्ष

अ )क्या है मैक इन इंडिया

यह भारत को विनिर्माण में अग्रणी बनाने का एक संकल्प है।इस प्रोग्राम की शुरुवात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में की गयी। इस अवसर पर
30 देशों के उद्योगपतियों ने भाग लिया।

ब )आवश्यकता क्यों

वैश्विक विनिर्माण में भारत की भगीदारी मात्र 2.1 %है जबकि चीन की 22.4% ।इसलिए इस और ध्यान दिया जाना चाहिए।

भारत के GDP में विनिर्माण का हिस्सा मात्र 15% है जबकि चीन काजहाँ 33 % वहीँ इंडोनेशिया ,पाकिस्तान, बांग्लादेश सरीके मुल्क भी हमसे आगे है जिनका योगदान क्रमश: 26%,19% एवं 19% है।
(स्रोत -UNO की वेबसाइट )

तथ्यों से जाहिर है कि इस सेक्टर को अभी तक उपेक्षित ही माना गया है।

स ) प्रमुख बिंदु

इसका लोगो दहाड़ता हुवा शेर है।

अब उधोग हेतु लाइसेंस पाना आसान होगा।

सरकार भारत में निवेशकों की सुगमता के लिए सभी प्रयास करेगी। इसमें व्यावसायिक इकाइयों की पूछताछ आदि का 72 घंटे में जवाब देने के लिए एक प्रकोष्ठ का गठन भी शामिल है। यह सभी नियामकीय प्रक्रियाओं की निगरानी भी करेगा और उन्हें सरल बनाएगा। इसके साथ अनुपालन के बोझ को भी कम किया जाएगा।

एक आधिकारिक बयान में कहा गया है, ‘सरकार एक नया रास्ता बनाने को प्रतिबद्ध है जिसमें कारोबारी इकाइयों को लाल कालीन पर स्वागत जैसा अनुभव देने का विचार है। विदेशी निवेशकों को नियामकीय व नीतिगत मुद्दों पर दिशानिर्देशन के लिए ‘भारत में निवेश’ प्रमुख संदर्भ बिंदु के रूप में काम करेगा। और उन्हें नियामकीय मंजूरियां दिलाने में मदद करेगा।’

केंद्र सरकार ने ऐसे 25 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें भारत दुनिया में अग्रणी स्थिति हासिल करने की क्षमता रखता है। इस अवसर पर एक सामान्य परिचय पुस्तिका के अलावा उपरोक्त महत्पूर्ण चिह्नित क्षेत्रों के बारे में अलग-अलग ब्रोशर भी जारी किये गए। जिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों के अलग-अलग ब्रोशर जारी किए जाएंगे उनमें वाहन, रसायन, आईटी, फार्मा, परिधान, बंदरगाह, विमानन, चमड़ा, पर्यटन एवं आतिथ्य, वेलनेस व रेलवे शामिल हैं।

विदेशी निवेशकों के भारत आगमन या प्रस्थान पर निवेशक सुविधा सेल उनकी मदद करेगा। यह मुख्य रूप से हरित व आधुनिक विनिर्माण पर केंद्रित होगा। इन कंपनियों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने में मदद की जाएगी।

यह अभियान राष्ट्रीय के अलावा राज्यस्तर व देश के बाहर मिशनों में भी पेश किया जाएगा।

यह चयनित देश में विभिन्न क्षेत्रों की शीर्ष कंपनियों को लक्ष्य करेगा।

इसके अलावा यह चुनिंदा घरेलू कंपनियों की भी पहचान करेगा जो नवोन्मेषण और नई प्रौद्योगिकी में अग्रणी हैं जिससे उन्हें वैश्विक स्तर पर चैंपियन के रूप में स्थापित किया जा सके।

द )लाभ

विनिर्माण सेक्टर से ही बेरोजगारी की समस्या को दूर किया जा सकता है।

भारत के व्यापर भुगतान के संतुलन हेतु भी विनिर्माण सेक्टर में तेजी आवश्यक है

भारत काफी मात्रा में तेल का आयात करता है लेकिन निर्यात करने हेतु मदें बहुत कम है

इससे हमारे निर्यात क्षेत्र में वॄद्धि होगी।

सर्विस सेक्टर का उपभोग केवल स्थानीय स्तर पर ही किया जा सकता है उसका निर्यात नहीं किया जा सकता। जैसे कोई धोबी केवल स्थानीय स्तर पर ही अपनी सेवा दे सकता है।

सोफ्टवेयर क्षेत्र में निर्यात संभव है लेकिन सेवा क्षेत्र में इसका योगदान मात्र 5-6% ही है।परन्तु यदि हम सामान या वस्तुएं बनायें जैसे ऑटोमोबाइल, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक, टेक्सटाइल आदि ।इनका निर्यात सम्भव है।

इससे हमें विदेशी मुद्रा भी मिलेगी।जिससे हमारा फोरेक्स रिज़र्व भी बढेगा।

इसमें किसी भी प्रकार प्रकार की सब्सिडी की बात नहीं बल्कि यह अपील है कि आप भारतीय है या विदेशी आप अपना सामान चाहे जहाँ बेचे लेकिन निर्माण भारत में ही करें।

इससे ओधोगिक कल्चर का विकास होगा।

य) चीन से भिन्नता

मैक इन इंडिया प्रोग्राम के अगले ही दिन चीन ने मेड इन चाइना प्रोग्राम की शुरुवात कर यह संकेत देने की कोशिश की विनिर्माण क्षेत्र में वह अपना दबदबा बनाये रखना चाहेगा।परन्तु दोनों में काफी हद तक असमानता है।

हमारा विनिर्माण मॉडल चीन से भिन्न होगा। चीन ने तो हर इंडस्ट्री को विशेष सब्सिडी दे कर बुला लिया

वहां सब कुछ द्विपक्षीय होता है ,नीति नहीं होती।

परन्तु हमारा उदेश्य किसी विशेष इंडस्ट्री को वरीयता देने का नहीं बल्कि सभी के लिए सामान रूप से बहेतर शासन उपलब्ध करवाना है।

चीन की तुलना में हम एक लोकतंत्र है ।यहाँ श्रमिक कानूनों का विशेष महत्व है।

र ) बाधाएँ

हमारे पास सपष्ट रणनीति और योजना का अभाव है।

पूर्व में कहा गया कि योजना आयोग को समाप्त किया जायेगा लेकिन उसकी जगह नयी सरंचना क्या होगी अभी तक अस्पष्ट है।

हमारी आर्थिक संरचना अत्यधिक जटिल है सबसे ज्यादा 50% रोजगार देने वाला सेक्टर कृषि है जिसमें मात्र 4% निवेश आ रहा है।जबकि बड़े उधोगों में 80% निवेश आ रहा है जो कि मात्र 6% लोगों को रोजगार दे रहे है।

1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण के नाम पर लघु और मध्यम उधोगों को जो संरक्षण मिलता है उसे समाप्त कर दिया गया।

यदि हम बिना भारतीय कंपनियों को विशेष सब्सिडी देते हुवे मार्केट खोल देंगे तो इससे तो नुकसान ही होगा। उदाहरण के तौर पर भारतीय कम्पनी भेल किसी भी सुरत में जर्मनी कम्पनी सिमंस का मुकाबला नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास उच्च टेक्नोलॉजी और संसाधन है।

भारत में बदनाम कठोर नौकरशाही और लाल फीताशाही इसमें महत्वपूर्ण अडंगा है।

सुशासन हेतु पर व्यापक परिवर्तनों की आवश्यकता है।

व ) निष्कर्ष

व्यपार करने की सहूलियत आर्थिक आजादी के लिए अभी वैश्विक सूचकांकों में भारत अभी काफी पीछे है इसके लिए कठोर कदम उठाने होंगे। हमारा सर्विस सेक्टर उतना रोजगार निर्माण नहीं कर सकता जो कि विनिर्माण क्षेत्र द्वारा किया जा सकता है।परन्तु प्रशासनिक मशीनरी की उलझी प्रक्रियाओं से इसे निकलना होगा। छोटे उधोगों के विकास की अन्य सबसे बड़ी समस्या वित्त की कमी है इस ओर भी ध्यान देना होगा।

अंत में हमें यह नहीं भुलाना चाहिए कि "मैक इन इंडिया " प्रोगाम के उद्यघाटन अवसर पर बाटें गए
ब्रोशर पर मेड इन चाइना लिखा था
12 वीं पंच वर्षीय योजना महत्वपूर्ण तथ्य 

RAS 2013 प्रारम्भिक परीक्षा हेतु अति महत्वपूर्ण 

अवधि -1 अप्रैल 2012 से 31 मार्च 2017

उप शीर्षक -तीव्रतर ,धारणीय और अधिक समावेशी संवॄदि

इसमें कुल 25 संकेतकों का वर्णन किया गया है।

GDPग्रोथ रेट -पहले लक्ष्य 8.2 बाद में 8किया गया।

कृषि विकास दर लक्ष्य -4.00%
विनिर्माण विकास दर लक्ष्य - 10.00%

स्कूल शिक्षा के ओसत वर्षों की संख्या 7 वर्ष करना।

प्रजनन दर -2.1 तक लाना

योजना के अंत तक 90% भारतियों को बैंकिंग सुविधा प्रदान करना।

कुल परिव्यय -₹ 80,50,123 करोड़

क्षेत्रीय आवंटन

सामाजिक सेवा -32.6%
कृषि -19.6%
ऊर्जा-18.6%
परिवहन-16.7%
उधोग एवं खनन -5.1%

GDP में विनिर्माण क्षेत्र को वर्तमान 16% से बढाकर 2025 तक 25% करना।

हरित क्रांति को पूर्व के कम उत्पादक क्षेत्रों तक पहुँचाना।

"राजस्थान के श्रम सुधार"

आगामी RAS परीक्षा के लिए अति महत्वपूर्ण

"राजस्थान के श्रम सुधार"
राजस्थान विधानसभा ने आज औद्योगिक विवाद (राजस्थान संशोधन) विधेयक 2014 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इसके अलावा ठेका श्रम (विनियमन और उत्पादन) राजस्थान संशोधन विधेयक, कारखाना (राजस्थान संशोधन) विधेयक और प्रशिक्षु अधिनियम भी पारित हो गया है।

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श्रम कानून में संशोधन की तैयारी
श्रम कानूनों में सुधार के लिए कठोर परिश्रम की है दरकार
प्रभारी मंत्री एवं संसदीय कार्य मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने औद्योगिक विवाद (राजस्थान संशोधन) विधेयक को सदन में प्रस्तुत करते हुए बताया कि वर्तमान विधेयक में किसी व्यतिगत कर्मकार के हटाने या छंटनी से संबंधित विवादों को उठाने की समय-सीमा निर्धारित नहीं थी। लेकिन इस संशोधन के बाद ऐसे विवादों को उठाने के लिए तीन वर्ष की समय-सीमा निर्धारित की गई है तथा 45 दिन में कार्यवाही करना आवश्यक होगा।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में किसी भी कारखाने में नियोजित कामगारों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक सदस्य रखने वाले संघ को प्रतिनिधि संघ के रूप में मान्यता थी लेकिन अब इसे बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया है। इसी प्रकार किसी भी कारखाने में औसतन 100 कामगार रहने की सीमा को बढ़ाकर अब 300 कर दिया गया है। राठौड़ ने बताया कि किसी भी उद्योग से किसी कर्मचारी की छंटनी करने या हटाने पर कर्मचारी को तीन माह के नोटिस के साथ कामगार को तीन महीने के अतिरिक्त वेतन के साथ एक वर्ष में औसत 15 दिन के वेतन के बराबर मजदूरी देनी होगी।

ठेका श्रम (विनियमन और उत्पादन) विधेयक को पेश करते हुए प्रभारी मंत्री एवं सार्वजनिक निर्माण मंत्री यूनुस खान ने बताया कि संशोधन श्रमिकों की संख्या को लेकर है, जिसे 20 से बढ़ाकर 50 किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बड़ी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के नियमानुसार श्रम कानूनों का पूरा ध्यान रखती हैं। वे श्रमिकों के लिए बीमा, स्वास्थ्य, पेयजल, केंटीन जैसी सुविधाएं सुनिश्चित करती हैं। उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि संशोधन के बाद यह संभव नहीं होगा कि कोई ठेकेदार 49 के समूह बनाकर इस कानून से बच सके।

इसी तरह कारखाना विधेयक पेश करते हुए उन्होंने कहा यह विधेयक राज्य में निवेश बढ़ाने, रोजगार सृजित करने और उद्योगों के लिए अच्छा माहौल तैयार करने की मंशा से लाया गया है। इस संशोधन विधियेक में शक्ति से संचालित कारखानों में श्रमिकों की संख्या को 10 से 20 करने और बिना शक्ति से संचालित कारखानों में श्रमिकों की संख्या 20 से 40 करने का प्रावधान किया गया है।

खान ने आश्वस्त किया कि श्रमिकों के हितों का पूरा ख्याल रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार की मंशा है कि कारखाना खोलने वाला कोई भी व्यवसायी हतोत्साहित नहीं हो। उन्होंने कहा कि छोटे और मझोले उद्योग खोलने की प्रक्रिया को सरलीकृत किया जाएगा। इस विधेयक के पारित होने से 3000 छोटे, मझोले और बड़े कारखानों को लाभ मिलेगा।

इसके अलावा विधानसभा में आज प्रशिक्षु (राजस्थान संशोधन) विधेयक को भी मंजूरी मिल गई। विधेयक पेश करते हुए प्रभारी मंत्री एवं शिक्षा मंत्री कालीचरण सराफ ने कहा कि ताजा संशोधन के तहत स्टेट एप्रेंटिसशिप काउंसिल को यह अधिकार होगा कि वह तय करे कि किस उद्योग में कितने एप्रेंटिस लगें। साथ ही पाठ्यक्रम की अवधि तय करने और किसी विवाद को सुलझाने का अधिकार भी इस काउंसिल के पास होगा।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में कई बार एप्रेंटिस को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मानदेय दिए जाने के मामले सामने आते हैं। संशोधन के बाद इस तरह के मामलों पर भी नियंत्रण रहेगा। यह विधेयक युवाओं में कौशल प्रशिक्षण बढ़ाने, रोजगार बढ़ाने और उद्योगों के लिए अहम साबित होगा।

Thursday, 11 July 2013

GENERAL KNOWELDGE 1

Q. H7 N9 is a rare form of ?bird flu
Q.WHO's headquarter is situated in ?Geneva

 Q.Consider the following statements About Proposed NATIONAL FOOD SECURITY BILL 2013:

-It will cover up to 75% of eligible priority households in rural holds.
-State Food Commissions will investigate violations of antitlements.
Which of the above statement is/are correct?
ANS-Both 1 & 2
Q.In which countrie,s Nitaqat labour law raised concerns in Indian Subcontinet.
Saudi Arabia

Q. Consider the following statements and choose the correct option:
1. Ishwar Chandra Vidhyasagar started a weekly, the Darpan.
2. Paramahansa Mandali, was founded in Bengal in 1849. Its founders believed in one God and were primarily interested in breaking rigid caste rules.
3. Karsondas Mulji started the 'Satya Prakash' in Gujarati in 1852 to advocate widow remarriage.
4. All his life Jotiba Phule carried on a campaign against upper caste domination and Brahmnical supremacy.
ANS- 3 and 4
Q. Identify the incorrect statement/s regarding International Trade Centre (ITC):
1. ITC's mission is to enable small business export success in developing and transition-economy countries, by providing, with partners, sustainable and inclusive development solutions to the private sector, trade support institutions and policymakers.
2. Our aim is for businesses in developing countries to become more competitive in global markets, speeding economic development and contributing to the achievement of the UN's Millennium Development Goals (MDGs) by 2020.
ANS- 2 only

Q. Consider the following statements and choose the correct option regarding the causes of 'The Revolt of 1857".
1. The most important cause of the popular discontent was the economic exploitation of the country by the British and the complete destruction of its traditional economic fabric.
2. The growing poverty of the people made them desperate and led them to join a general revolt in the hope of improving their lot.
3. The annexation of Awadh by Lord Dalhousie in 1856.
4. Use of greased cartridges and other grievances of the Indian sepoys.
ANS) 1, 2, 3 and 4
Q Choose the correct statement/s regarding International Labour Organisation (ILO).
1. The ILO is the international organization responsible for drawing up and overseeing international labour standards. It is the only 'bipartite' United Nations agency that brings together representatives of governments, employers and workers to jointly shape policies and programmes promoting decent work for all.
2. Conventions and Recommendations are the instruments used by the International Labour Conference to set international labour standards.
ANS) 2 only
Q. Consider the following statements and choose the correct option:
1. Gopal Hari Deshmukh popularly know as 'Lokahitwadi' was the earliest religious reformer in Western India.
2. Prarthana Samaj was started with the aim of reforming Hindu religious thought and practice in the light of modern knowledge.
3. Prarthana Samaj was strongly against the Brahmo Samaj.
4. Gopal Ganesh Agarkar was one of the greatest rationalist thinkers of Modern India. He was an advocate of the power of human reason.
ANS) 1, 2 and 4




Wednesday, 3 July 2013

HISTORY QUIZ

Q.What is the correct chronological order in which the following appeared in India?
I. Gold coins. 2. Punch-marked silver coins.
3. Iron plough. 4. Urban culture.
Select the correct answer using the codes given:
ANS-3421
Q2.The medieval Indian writer who refers to the discovery of America is
ANS-Abul Fazl
Q3.Assertion (A) : Muhammad bin Tughlaq left Delhi, and, for two years lived in a camp called Swarga-dwari.
Reason (R) : At that time, Delhi was ravaged by a form of plague and many people died.
ANS-Both A and R are true and R is the correct explanation of A

Q4.With reference to medieval Indian rulers, which one of the following statements is correct?
ANS-Firoz Tughlaq set up a separate department of slaves
Q5.Mate" Lilt I with List II and select the correct answer asing the codes given below the lilts:
List I List II
A. Surendranath Bannerjee 1. Hind Swaraj
B. M. K. Gandhi                  2. The Indian Struggle
C. Subhash Chandra            3. Autobiographical
Bose                                         Writings
D. LajpatRai                       4. A Nation in Making
ANS-4123

Q6.Which one of the following is an important historical novel written during the latter half of the nineteenth century ?
ANS- Durgesh Nandini
Q7.The educated middle class in India?
ANS-remained neutral to the revolt of 1857
Q8.What is the correct sequence of the following events?
1. Tilak's Home Rule League.
2. Komagatamaru Inqident.
3. Mahatama gandhi’s arrival in india.
Select the correct answer using the codes given below the lists:   
ANS-231

Q9.Which one of the following pairs is not correctly matched?
ANS-Vernacular Press Act -Curzon

10.Which one of the following revolts was made famous by Bankim Chandra Chatterjee in hisnoval Anand Math?
ANS- Sanyasi rebellion
Q11.The educated middle class in India?
ANS- remained neutral to the revolt of 1857
12.Who among the following organized the famous Chittagong armoury raid?
ANS-Surya Sen
13.With which one of the following mountain tribes did the British first come into contact with after the grant of Diwani in the year 1765?
ANS-Khasis
14.During the Indian Freedom Struggle, who among the following proposed that Swaraj should be defined as complete independence free from all foreign control?
ANS-Maulana Hasrat Mohani
15.Who among the following Europeans were the last to come to preindependence India as traders?
ANS-French