योजना आयोग खत्म होने के बाद जरूरी है कि उसकी जगह एक सक्षम और प्रभावी संस्था ले। नए संस्थान का संभावित नाम और उसकी रूपरेखा सुझा रहे हैं शंकर आचार्य
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प्रधानमंत्री ने पिछले महीने लाल किले के प्राचीर से जब योजना आयोग को खत्म करने की घोषणा की तब से तमाम टीकाकार इसकी जगह लेने वाले नए संस्थान की संभावित रूपरेखा पर चर्चा करने में व्यस्त हो गए। ऐसे में मैं भी अपने विचार व्यक्त करना जरूरी समझता हूं। मेरा पूरा ध्यान नई संस्था पर होगा, न कि योजना आयोग पर। उसके बारे में तो मैं केवल यही कहना चाहूंगा कि मैं इस व्यापक विचार से सहमत हूं कि वित्तीय संसाधन आवंटन, परियोजनाओं के आकलन और प्रोत्साहन तथा राष्ट्रीय विकास परिषद के सचिवालय के रूप में आयोग की भूमिका को अब अन्य संस्थानों के हवाले कर दिया जाना चाहिए। यह काम विभिन्न मंत्रालयों तथा वित्त आयोग को सौंपा जा सकता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि नए संस्थान की क्या भूमिका होगी? इसमें कर्मचारियों की नियुक्ति कैसे की जाएगी? इसे किस तरह अधिकार संपन्न बनाया जाएगा? इसे किस नाम से पुकारा जाएगा आदि।
कामकाज
इस सिलसिले में अब तक जो भी बातचीत हुई है उसका लब्बोलुआब यही रहा है कि नई संस्था एक तरह का सरकारी थिंकटैंक हो। इस राय से मेरी असहमति यह है कि हमारे देश में सरकारी संस्थानों की प्रवृत्ति थिंकटैंक को खारिज करने की रही है। यहां उनको व्यावहारिक रूप से उपयोगी नहीं माना जाता है। मेरा मानना है कि यहां सरकार का इरादा नीति आधारित संस्थान बनाने का अधिक है जो सरकार को देश के आर्थिक और सामाजिक विकास को लेकर जरूरी सलाह मशविरा दे सके। निश्चित तौर पर ऐसे मशविरे की गहरी छानबीन भी करनी होगी। उसका शोध आधारित विश्लेषण करना होगा। इसमें रचनात्मक सोच जाहिर होनी चाहिए। नए संस्थान से यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह राष्ट्रीय विकास के सभी बड़े मसलों पर तत्काल अपनी राय देना आरंभ कर देगा। सवाल यह उठता है कि उसे आखिर कहां से शुरुआत करनी चाहिए? मेरा सुझाव है कि पहले उसे निम्रलिखित चार पांच प्राथमिकता वाले विषयों के विश्लेषण और इन पर सुझाव देना शुरू करना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का विश्लेषण: हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जो तेजी से बदल रही है। यहां आर्थिक शक्ति, कारोबार, तकनीक और पूंजी का प्रवाह प्राय: बेहद सहज होता है। भारत की विकास संबंधी संभावनाओं, नीतियों और बाधाओं को लेकर इसके गहरे निहितार्थ हैं। इसके बावजूद मौजूदा सरकार का कोई विभाग इनके आकलन के लिए तैयार नहीं है। नया संस्थान इसके लिए बेहतर जगह हो सकता है।
रोजगार और श्रम बाजार: हर वर्ष देश की श्रम शक्ति में शामिल होने वाली एक करोड़ से अधिक की युवा आबादी के लिए रोजगार तैयार कर पाना देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। समावेशन का सबसे बेहतर तरीका है श्रम आधारित आर्थिक विकास करना। नए संस्थान को रोजगार आधारित विकास के मार्ग की बड़ी बाधाओं पर पहले ध्यान देना होगा और फिर उनसे निपटने की नीति तैयार करनी होगी।
ऊर्जा और पर्यावरण: जैसा कि हमें रोज अखबारों से पता चलता है, भारत के सामने पर्यावरण और उसके संरक्षण के क्षेत्र में ऊर्जा उत्पादन, कीमत निर्धारण, मांग प्रबंधन, कोयला, जलविद्युत, तेल एवं गैस, नाभिकीय ऊर्जा, बिजली और सौर ऊर्जा एवं अपारंपरिक माध्यमों को लेकर तमाम दिक्कतें हैं। इन तमाम मुद्दों पर सतत और स्तरीय विश्लेषण की आवश्यकता है ताकि देश के विकास के लिए बेहतर नीतियां तैयार की जा सकें।
परिवहन एवं संचार: इसी तरह, परिवहन और संचार क्षेत्र का विकास भी कई क्षेत्रों मसलन, रेल, सड़क, बंदरगाह, जहाजरानी, हवाई परिवहन, दूरसंचार आदि में बंटा हुआ है। इसके लिए अलग अलग मंत्रालय जवाबदेह हैं। यहां भी माध्यम और लंबी अवधि का सोच आवश्यक है क्योंकि उसकी मदद से ही सही ढंग की नीतियां और तेज नियामकीय और नीतिगत ढांचा तैयार किया जा सकेगा। ऊर्जा और पर्यावरण के मामले में तत्काल विश्लेषण करने और ध्यान देने की आवश्यक है। नए संस्थान को यह मुहैया कराना चाहिए।
जल, स्वच्छता और जन स्वास्थ्य: पानी की कमी और उसका कुप्रबंधन ग्रामीण और शहरी विकास दोनों के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। पानी कई चीजों से जुड़ा हुआ है। इसमें सफाई और नाली आदि की व्यवस्था भी शामिल है। अब इन पर गंभीरता से ध्यान दिया जा रहा है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि ये जनस्वास्थ्य से बहुत करीबी से जुड़े हुए हैं। एक बार फिर इन समस्याओं की परस्पर विरोधी क्षेत्रों से जुड़ी छवि दिक्कत की वजह बनेग
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कामकाज
इस सिलसिले में अब तक जो भी बातचीत हुई है उसका लब्बोलुआब यही रहा है कि नई संस्था एक तरह का सरकारी थिंकटैंक हो। इस राय से मेरी असहमति यह है कि हमारे देश में सरकारी संस्थानों की प्रवृत्ति थिंकटैंक को खारिज करने की रही है। यहां उनको व्यावहारिक रूप से उपयोगी नहीं माना जाता है। मेरा मानना है कि यहां सरकार का इरादा नीति आधारित संस्थान बनाने का अधिक है जो सरकार को देश के आर्थिक और सामाजिक विकास को लेकर जरूरी सलाह मशविरा दे सके। निश्चित तौर पर ऐसे मशविरे की गहरी छानबीन भी करनी होगी। उसका शोध आधारित विश्लेषण करना होगा। इसमें रचनात्मक सोच जाहिर होनी चाहिए। नए संस्थान से यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह राष्ट्रीय विकास के सभी बड़े मसलों पर तत्काल अपनी राय देना आरंभ कर देगा। सवाल यह उठता है कि उसे आखिर कहां से शुरुआत करनी चाहिए? मेरा सुझाव है कि पहले उसे निम्रलिखित चार पांच प्राथमिकता वाले विषयों के विश्लेषण और इन पर सुझाव देना शुरू करना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का विश्लेषण: हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जो तेजी से बदल रही है। यहां आर्थिक शक्ति, कारोबार, तकनीक और पूंजी का प्रवाह प्राय: बेहद सहज होता है। भारत की विकास संबंधी संभावनाओं, नीतियों और बाधाओं को लेकर इसके गहरे निहितार्थ हैं। इसके बावजूद मौजूदा सरकार का कोई विभाग इनके आकलन के लिए तैयार नहीं है। नया संस्थान इसके लिए बेहतर जगह हो सकता है।
रोजगार और श्रम बाजार: हर वर्ष देश की श्रम शक्ति में शामिल होने वाली एक करोड़ से अधिक की युवा आबादी के लिए रोजगार तैयार कर पाना देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। समावेशन का सबसे बेहतर तरीका है श्रम आधारित आर्थिक विकास करना। नए संस्थान को रोजगार आधारित विकास के मार्ग की बड़ी बाधाओं पर पहले ध्यान देना होगा और फिर उनसे निपटने की नीति तैयार करनी होगी।
ऊर्जा और पर्यावरण: जैसा कि हमें रोज अखबारों से पता चलता है, भारत के सामने पर्यावरण और उसके संरक्षण के क्षेत्र में ऊर्जा उत्पादन, कीमत निर्धारण, मांग प्रबंधन, कोयला, जलविद्युत, तेल एवं गैस, नाभिकीय ऊर्जा, बिजली और सौर ऊर्जा एवं अपारंपरिक माध्यमों को लेकर तमाम दिक्कतें हैं। इन तमाम मुद्दों पर सतत और स्तरीय विश्लेषण की आवश्यकता है ताकि देश के विकास के लिए बेहतर नीतियां तैयार की जा सकें।
परिवहन एवं संचार: इसी तरह, परिवहन और संचार क्षेत्र का विकास भी कई क्षेत्रों मसलन, रेल, सड़क, बंदरगाह, जहाजरानी, हवाई परिवहन, दूरसंचार आदि में बंटा हुआ है। इसके लिए अलग अलग मंत्रालय जवाबदेह हैं। यहां भी माध्यम और लंबी अवधि का सोच आवश्यक है क्योंकि उसकी मदद से ही सही ढंग की नीतियां और तेज नियामकीय और नीतिगत ढांचा तैयार किया जा सकेगा। ऊर्जा और पर्यावरण के मामले में तत्काल विश्लेषण करने और ध्यान देने की आवश्यक है। नए संस्थान को यह मुहैया कराना चाहिए।
जल, स्वच्छता और जन स्वास्थ्य: पानी की कमी और उसका कुप्रबंधन ग्रामीण और शहरी विकास दोनों के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। पानी कई चीजों से जुड़ा हुआ है। इसमें सफाई और नाली आदि की व्यवस्था भी शामिल है। अब इन पर गंभीरता से ध्यान दिया जा रहा है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि ये जनस्वास्थ्य से बहुत करीबी से जुड़े हुए हैं। एक बार फिर इन समस्याओं की परस्पर विरोधी क्षेत्रों से जुड़ी छवि दिक्कत की वजह बनेग
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