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Thursday, 6 November 2014

इराक संघर्ष तथा भारत पर प्रभाव

इराक संघर्ष तथा भारत पर प्रभाव

हाल ही में इराक में उत्पन्न हुवा संघर्ष IR तथा करंट इशू के संदर्भ में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा एवं साक्षात्कार हेतु महत्वपूर्ण मुद्दा है।
इसे निम्न प्रकार से समझ सकते है-
1.क्या है विवाद
2.ISIS क्या है 
3.अन्य पडोसी देशों का रुख
3.अमेरिका का रुख
4.भारत पर प्रभाव

1.क्या है विवाद-

इराक मूलत: शिया मुसलमानों के बाहुल्य वाला एक देश है। इस पर सदाम हुसैन के समय सुन्नियों का शासन रहा था। इराक में अमेरिकी हस्तक्षेप के पश्चात तथा सदाम हुसैन के शासन के अंत के पश्चात शिया समर्थित सरकार का गठन हुवा हैं। अमेरिकी सेना के घर वापसी के पश्चात से सुन्नियों पुन: अपना अधिकार प्राप्त करने की कोशिश में है तथा इसका ही परिणाम वर्तमान संघर्ष है।

2.ISIS क्या है--

Islamic state of iraq and syria ,यह सुन्नी मुसलमानों का एक संगठन है।जो की इराक पर पुन : सुन्नियों के अधिकार को लेकर संघर्ष कर रहा है। यह एक प्रकार से अलकायदा का ही नया सवरूप है। इसका प्रभाव इराक और सीरिया दोनों देशों में हैं।यह शरियत कानून को लागू करना चाहता है।

3.अन्य पडोसी देशों का रुख -

ईरान ,इराक तथा सीरिया शिया बाहुल्य वाले देश है। इनमें ईरान की स्थिति सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यदि ईरान भविष्य में परमाणु बम बनाने की क्षमता हासिल करता है तो उससे न केवल अमेरिका वरन आस पड़ोस के सुन्नी बाहुल्य वाले देशों को भी खतरा उत्पन्न हो जायेगा। सुन्नी बाहुल्य वाले देश एक मजबूत शिया बाहुल्य वाले देश का स्वीकार नहीं कर सकते ।यही कारण है की सऊदी अरब जैसे देश ISIS को वित्तीय रूप से मदद पहुंचा रहे है ताकि इराक, ईरान तथा सीरिया के रूप में एक मजबूत शिया बाहुल्य वाला गठजोड़ न बन जाये।

4.अमेरिका का रुख-

वर्तमान इराक संघर्ष ने अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों को अजीब दुविधा की स्थिति में डाल दिया।
ISIS को अरब देश सपोर्ट कर रहे है जो कि अमेरिका के भूतपूर्व सहयोगी रहे है।
ईरान इस मुद्दे पर अमेरिका का सहयोग करने की बात कर रहा है जो कि अमेरिका का कट्टर विरोधी रहा है।
अमेरिका ने यद्दपि दूर तक मार करने वाले अपने विमान वाहक पोत इराक की तरफ भेजे है तथा विरोधियों पर हवाई हमले की भी योजना बना सकता है। परन्तु वह अपनी थल सेना का सीधी तॊर पर प्रयोग करने में हिचकिचा रहा है।
अमेरिका का स्वार्थ उन तेल क्षेत्रों तक सीमित है जो कि विरोधियों के कब्जे में आ गए।

5.भारत पर प्रभाव-

*भारत अपनी आवश्यकता का अधिकांश तेल इराक से आयत करता। संघर्ष से तेल की कीमतें बढ जाने से भारत का आयात ऒर अधिक मंहगा हो सकता है।
*देश के चालू खाता घाटे में बढोतरी हो सकती है।
*अनेक भारतीय इराक समेत खाड़ी देश में काम करते है उन्हें रोजगार सम्बन्धी संकट का सामना करना पड़ सकता है।
*विदेशों से आने वाली राशि पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है जिससे चालू खाता घाटा बड सकता है।
*अगर भारत सुन्नियों का समर्थन करता है तो ऐसी ही स्थिति कश्मीर में दोहराई जा सकती है।
*अगर भारत अमेरिका ऒर ईरान की संभावित हमले को समर्थन करता है तो ऐसी कारवाही की मांग भारत के अशांत एरिया में भी की जा सकती है।
*इस घटना का प्रभाव देश के आन्तरिक हालत पर भी पड सकता है। भारत में शिया ऒर सुन्नी दोनों बहुतायत में है जिसमे सुन्नियों की संख्या अधिक हैं।दोंनो में संघर्ष हो सकता है जिससे देश में law and order की समस्या उत्पन्न हो सकती है तथा साम्प्रदायिक सॊहर्द भी प्रभावित हो सकता है।
*भारत के सम्बन्द अरब देशों, इराक ,ईरान एवं अमेरिका सभी से अच्छे है अत:किसी एक का समर्थन अन्य की कीमत पर नहीं किया जा सकता।
*इराक में यदि चरम पंथी बढते है तो इसका प्रभाव अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान पर पड सकता है ।एक अशांत पडोसी हमारे लिए खतरे का विषय बन सकता है।

समावेशी विकास की राह में ये बाधाएं हैं खास :-

समावेशी विकास की राह में ये बाधाएं हैं खास :-
शंकर आचार्य
अगर देश का निर्बाध विकास सुनिश्चित करना है तो कुछसमस्याओं पर खासतौर पर ध्यान देकर उनका हल तलाशने की कोशिश करनी होगी।विस्तार से बता रहे हैं शंकर आचार्य
वर्तमान में आर्थिक विषयों पर हो रही तमाम चर्चा बाहरी वित्त पर पड़ रहे दबाव और अर्थव्यवस्था को 5 फीसदी की धीमी विकास दर से उबारने पर केंद्रित है। जैसा कि मैंने पिछले दिनों लिखा भी था, यह काम आसान नहीं है। अब हमें इन तात्कालिक लक्ष्यों से परे मध्यम अवधि के दौरान तेज उच्च और समावेशी विकास दर हासिल करने के बारे में सोचना होगा। बहरहाल अगर मौजूदा बाधाओं पर नजर डाली जाए तो परिदृश्य बहुत बेहतर नहीं नजर आता। इसे प्रबंधनीय स्तर पर बनाए रखने के लिए मैं चार प्रमुख बाधाओं पर अपना ध्यान केंद्रित करूंगा।
रोजगार विरोधी कानून
अप्रत्याशित रूप से प्रतिबंधात्मक श्रम कानूनों (इंदिरा गांधी द्वारा छोड़ी गई सबसे नुकसानदेह गरीब विरोधी विरासत में से एक) में थोड़ी ढील देने के लिए कैबिनेट मसौदा तैयार किए जाने के 20 वर्ष बाद अब तक उस दिशा में जरा भी तरक्की नहीं हो सकी है। जाहिर है इसके परिणाम मोटे तौर पर नकारात्मक ही बने रहे हैं। आजादी के 65 साल बाद देश के 50 करोड़ श्रमिकों में से 90 फीसदी से अधिक असंगठित क्षेत्र के रोजगार के जरिये अपना जीवन बिता रहे हैं। उन्हें रोजगार की सुरक्षा भी प्राप्त नहीं है और उनकी आय भी बेहद कम है। औद्योगिक क्षेत्र के नियोक्ताओं ने तमाम वजहों से नए नियमित कर्मचारियों को भर्ती नहीं किया और उन्होंने श्रम आधरित क्षेत्रों मसलन कपड़ा, वस्त्र, चमड़ा उद्योग, खिलौनों और इलेक्ट्रॉनिक्स आदि क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर परिचालन से परहेज किया जबकि ये क्षेत्र सन 1970 के दशक से ही पूर्वी एशियाई देशों में रोजगार आधारित औद्योगीकरण का सफल जरिया बने हुए थे।
आश्चर्य नहीं कि औपचारिक क्षेत्र में रोजगार में ठहराव आ गया। हाल के वर्षों में यानी वर्ष 2004-05 से 2009-10 के दौरान भी रोजगार बहुत धीमी गति से विकसित हुआ। इस बारे में पर्याप्त आंकड़े मौजूद हैं और कुल रोजगार में कृषि की हिस्सेदारी अस्वाभाविक रूप से ऊंची यानी करीब 50 फीसदी बनी रही, जबकि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी में जमकर कमी आई और वह 15 फीसदी रह गई। युवा आबादी के चलते जिस जननांकीय लाभान्श की बढ़चढ़ कर बात की जाती है वह हमारी खराब श्रम नीतियों के कारण बेकार साबित हो रहा है और बहुत जल्दी वह रोजगार की असुरक्षा, बेरोजगारी और अल्परोजगारी की समस्या में बदल सकता है।
बड़े और मझोले उद्यमों में श्रमिकों को प्रोत्साहन न मिलने ने भी विनिर्माण क्षेत्र के विकास को बुरी तरह प्रभावित किया है। क्षेत्र का जीडीपी में योगदान कई सालों से 15-16 फीसदी पर ठिठका हुआ है। जबकि चीन समेत अन्य एशियाई मुल्कों में यह 30 फीसदी से ज्यादा है। निश्चित तौर अन्य कारक भी इसकी वजह रहे हैं लेकिन श्रम कानूनों से कम।
लुभावनी कल्याण योजनाएं
मोटे तौर पर देखा जाए तो तेज और व्यापक विकास की राह में दूसरा बड़ा रोड़ा है लोकप्रिय राजकोषीय नीतियां और प्रतिस्पर्धी अदूरदर्शी राजनीति। ऐसी राजनीति हर जगह और हर स्तर पर देखने को मिल रही है। इसके दो पहलू हैं: पहला, खराब तरीके से तैयार की गई कल्याण योजनाओं की अपरिपक्व लॉन्चिंग। मसलन काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार आदि। दूसरा, भारी सब्सिडी का माहौल। संप्रग सरकार के कार्यकाल वाले नौ सालों में कल्याण योजनाओं को खूब बढ़ावा दिया गया। जबकि इन उपायों को किफायती और खामी रहित बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया। इसका सीधा मतलब यह है कि विभिन्न योजनाओं में लीकेज, भ्रष्टïाचार और ऐसी अन्य गतिविधियां बनी रहेंगी। इसका नतीजा है राजकोषीय घाटे में इजाफा, बढ़ती महंगाई का जोखिम, भारी भरकम बाहरी घाटा और उच्च ऋण दर तथा कर्ज।
सब्सिडी का लंबा इतिहास रहा है और यह अब भी प्रमुख क्षेत्रों की आर्थिक व्यवहार्यता पर असर डाल रही है। बिजली सब्सिडी (खासकर किसानों की) बिजली क्षेत्र की खस्ता हालत के लिए जिम्मेदार है। इसकी वजह से ही पश्चिमी और उत्तरी भारत में भू-जल स्तर भी खूब गिरा है क्योंकि मुफ्त बिजली होने के चलते लोग खूब पानी निकालते हैं। इसने जल संकट को भी जन्म दिया है। खाद्यान्न सब्सिडी ने कृषि अर्थव्यवस्था में विसंगतियां पैदा की हैं और गैर खाद्य फसलों का विकास रोक दिया है। यूरिया उर्वरक पर बढ़ती सब्सिडी ने मिट्टïी की उर्वर क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारी भरकम डीजल सब्सिडी ने ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है।
शासन-प्रशासन की कमजोरी
शासन और प्रशासन भी बड़ा विषय हैं क्योंकि ये हमारे आर्थिक और सामाजिक जीवन के हर पहलू को प्रभावित करते है

क्या भारत इसराइल के साथ है?

क्या भारत इसराइल के साथ है?


ग़ज़ा में संयुक्त राष्ट्र के एक स्कूल पर इसराइली बमबारी की निंदा करते हुए संयुक्त राष्ट्र के एक प्रवक्ता अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके और प्रेस कॉन्फ़्रेंस में रो पड़े.

उन्होंने कहा कि ग़ज़ा की त्रासदी अब एक ऐसे चरण में पहुंच गई है जहां शब्द नहीं बल्कि आंसू ही इस दर्द को बयां कर सकते हैं.

चंद दिनों पहले जब भारतीय संसद में विपक्षी दलों ने ग़ज़ा की स्थिति पर एक प्रस्ताव मंज़ूर करने के लिए सरकार से बहस कराने की मांग की तो सरकार का कहना था कि ग़ज़ा की स्थिति पर बहस देश के हित में नहीं है क्योंकि इसके दोनों ही पक्षों से भारत के दोस्ताना रिश्ते हैं.

सभापति के हस्तक्षेप से सदन में बहस तो हुई लेकिन सरकार ने किसी तरह का प्रस्ताव पास करने से साफ़ इनकार कर दिया.

फ़लस्तीन से पुराने रिश्ते
सरकार का रुख़ यही था कि हमास को संघर्ष विराम के लिए तैयार होना चाहिए. पिछले दिनों विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से एक पत्रकार ने ग़ज़ा पर इसराइली हमले के बारे में भारत के पक्ष को लेकर जब सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि भारत सरकार फ़लस्तीनियों की संघर्ष का समर्थन करती है और इसराइल भारत का एक क़रीबी दोस्त है.

भारत फ़लस्तीनियों का बहुत क़रीबी दोस्त रहा है और एक फ़लस्तीनी राष्ट्र के निर्माण के उनके संघर्ष में भारत ने साथ दिया है लेकिन भारत में फ़लस्तीनियों के लिए ये समर्थन कम होता जा रहा है.

भारत अब इसराइल का एक भरोसेमंद सहयोगी है वो इसराइल से सैन्य साज-सामग्री ख़रीदने वाला सबसे बड़ा देश है.

रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में ही नहीं डेयरी, सिंचाई, ऊर्जा और बहुत से तकनीकी क्षेत्रों में इसराइल भारत के साथ साझेदारी कर रहा है.

भाजपा इसराइल के समर्थन में
पिछले कुछ सालों में इसराइल भारत के बहुत क़रीब आया है. भारत में जिस तरह फ़लस्तीनियों के लिए सहानुभूति है उसी तरह आबादी के एक बड़े हिस्से में शुरू से ही इसराइल का समर्थन भी रहा है.

भाजपा और हिंदू संगठन इसराइल के समर्थन में रहे हैं और अब भी हैं.

दक्षिणपंथी विचारक और विश्लेषक फ़लस्तीनियों का समर्थन करने को मुसलमान वोट हासिल करने की सियासत के तौर पर देखते हैं.

फ़ेसबुक, ट्विटर और दूसरे सोशल मीडिया पर ऐसे लोग काफ़ी सक्रिय हैं.

भारत अगर चाहता तो वो हमास की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए ये कह सकता था कि ग़ज़ा में इसराइली बमबारी से जिस बड़े पैमाने पर आम लोग मारे गए हैं और जिस तरह शहरी इलाकों, अस्पतालों और स्कूलों को निशाना बनाया जा रहा है उसे कतई मंज़ूर नहीं किया जा सकता और इसका कोई शांतिपूर्ण हल निकलना चाहिए.

अपनी ख़ामोशी से भारत ये साफ़ संदेश देना चाहता है कि वो इस संघर्ष में अगर इसराइल के साथ नहीं है तो कम से कम इसराइल के ख़िलाफ़ भी नहीं है

नेपाल को एक अरब डॉलर का क़र्ज़: मोदी

नेपाल को एक अरब डॉलर का क़र्ज़: मोदी


भारत नेपाल को एक अरब डॉलर यानी क़रीब 10 हज़ार करोड़ नेपाली रुपए का रियायती क़र्ज़ देगा. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल की संसद में इसकी घोषणा की.

इस रकम का इस्तेमाल नेपाल अपनी प्राथमिकता के अनुसार कर सकेगा.

नेपाल की संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि नेपाल के साथ भारत के रिश्ते अटूट हैं और भारत पड़ोसी का धर्म निभाने के लिए प्रतिबद्ध है.

इससे पहले मोदी ने नेपाल की संसद में अपना संबोधन नेपाली भाषा में शुरू किया.

कारोबार
मोदी ने दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्ते मज़बूत करने पर ज़ोर दिया. उनका कहना था कि नेपाल को हिट की ज़रूरत है. हिट यानी एचआईटी यानी हाइवेज़, इन्फॉर्मेशन वेज़ और ट्रांसवेज़.

मोदी ने अपने भाषण में नेपाल से बिजली ख़रीदने की इच्छा भी जताई.

उन्होंने कहा, "भारत को बिजली बेचकर नेपाल विकसित देशों में जगह बना सकता है."

उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल के लिए ट्रांसमिशन लाइन दोगुना की जाएगी.

मोदी ने कहा कि नेपाल हर्बल दवाओं का बड़ा निर्यातक बन सकता है और भारत इसमें मदद करने को तैयार है.

'युद्ध से बुद्ध की ओर'

मोदी ने अपने भाषण में कई बार उन सांस्कृतिक प्रतीकों का ज़िक्र किया, जो भारत और नेपाल दोनों के लिए साझा हैं.

मोदी ने नेपाल में शांति प्रक्रिया की तारीफ़ करते हुए कहा, "बुलेट को छोड़कर बैलेट की तरफ बढ़ने के लिए... युद्ध से बुद्ध की तरफ़ जाने के लिए नेपाल को बधाई."

उन्होंने भारतीय सेना के लिए काम करने वाले नेपाली सैनिकों की बहादुरी का भी ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, "मैं उन गोरखा सैनिकों को सलाम करता हूं जिन्होंने भारत के लिए शहादत दी."

मोदी ने कहा कि भारत नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देना चाहता.

नरेंद्र मोदी नेपाली संसद को संबोधित करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री
हैं.
बीबीसी से साभार ।

भारत जापान समझौते

भारत जापान समझौते 
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IAS तथा RAS परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए।

1.जापान ने भारत को बुलेट ट्रेन सहित कई क्षेत्रों में भरपूर मदद देने की घोषणा की। 

2.दोनों देशों के बीच रक्षा आदान-प्रदान, स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा, महिला विकास और राजमार्गों को लेकर कुल पांच समझौते हुए हैं।

3.भारत में 35 अरब डॉलर का निवेश करेगा जापान:

*भारत और जापान ने अपने संबंधों को सामरिक वैश्विक भागीदारीसे बढ़ा कर विशेष सामरिक वैश्विक भागीदारी के स्तर पर ले जाने की घोषणा की और जापान ने अगले पांच वर्षों में भारत में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश करने की घोषणा की।

* यह राशि नए स्मार्ट शहरों के विकास, गंगा और अन्य नदियों की सफाई, कृषि, जल सुरक्षा, परिवहन और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल की जाएगी।

4.लेकिन दोनों देश के बीच असैन्य परमाणु समझौतानहीं हो पाया। असैन्य परमाणु समझौते पर भारत और जापान के बीच समझ बढ़ी है। दोनों नेताओं ने अपने अधिकारियों को बातचीत पूरी करने का निर्देश दिया ताकि रणनीतिक सहयोग मजबूत करने के लिए इस समझौते पर जल्दी हस्ताक्षर हो सकें।

5.छह कंपनियों से प्रतिबंध हटा:

जापान ने 6 प्रमुख भारतीय कंपनियों से प्रतिबंध हटा लिया है।जिससे रक्षा और सैन्य क्षेत्र में दि्वपक्षीय सहयोग बढ़ने की संभावना है। जिन कंपनियों से प्रतिबंध हटाया गया है वे कंपनियां जापान की कंपनियों से मिलकर काम करेंगी और तकनीक का एक दूसरे को हस्तांतरण भी करेंगी। हालांकि जापान ने अभी 4 कंपनियों पर प्रतिबंध जारी रखा है।

योजना आयोग

योजना आयोग खत्म होने के बाद जरूरी है कि उसकी जगह एक सक्षम और प्रभावी संस्था ले। नए संस्थान का संभावित नाम और उसकी रूपरेखा सुझा रहे हैं शंकर आचार्य

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नए संस्थान पर विशेषज्ञों का मंथन
प्रधानमंत्री ने पिछले महीने लाल किले के प्राचीर से जब योजना आयोग को खत्म करने की घोषणा की तब से तमाम टीकाकार इसकी जगह लेने वाले नए संस्थान की संभावित रूपरेखा पर चर्चा करने में व्यस्त हो गए। ऐसे में मैं भी अपने विचार व्यक्त करना जरूरी समझता हूं। मेरा पूरा ध्यान नई संस्था पर होगा, न कि योजना आयोग पर। उसके बारे में तो मैं केवल यही कहना चाहूंगा कि मैं इस व्यापक विचार से सहमत हूं कि वित्तीय संसाधन आवंटन, परियोजनाओं के आकलन और प्रोत्साहन तथा राष्ट्रीय विकास परिषद के सचिवालय के रूप में आयोग की भूमिका को अब अन्य संस्थानों के हवाले कर दिया जाना चाहिए। यह काम विभिन्न मंत्रालयों तथा वित्त आयोग को सौंपा जा सकता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि नए संस्थान की क्या भूमिका होगी? इसमें कर्मचारियों की नियुक्ति कैसे की जाएगी? इसे किस तरह अधिकार संपन्न बनाया जाएगा? इसे किस नाम से पुकारा जाएगा आदि।

कामकाज

इस सिलसिले में अब तक जो भी बातचीत हुई है उसका लब्बोलुआब यही रहा है कि नई संस्था एक तरह का सरकारी थिंकटैंक हो। इस राय से मेरी असहमति यह है कि हमारे देश में सरकारी संस्थानों की प्रवृत्ति थिंकटैंक को खारिज करने की रही है। यहां उनको व्यावहारिक रूप से उपयोगी नहीं माना जाता है। मेरा मानना है कि यहां सरकार का इरादा नीति आधारित संस्थान बनाने का अधिक है जो सरकार को देश के आर्थिक और सामाजिक विकास को लेकर जरूरी सलाह मशविरा दे सके। निश्चित तौर पर ऐसे मशविरे की गहरी छानबीन भी करनी होगी। उसका शोध आधारित विश्लेषण करना होगा। इसमें रचनात्मक सोच जाहिर होनी चाहिए। नए संस्थान से यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह राष्ट्रीय विकास के सभी बड़े मसलों पर तत्काल अपनी राय देना आरंभ कर देगा। सवाल यह उठता है कि उसे आखिर कहां से शुरुआत करनी चाहिए? मेरा सुझाव है कि पहले उसे निम्रलिखित चार पांच प्राथमिकता वाले विषयों के विश्लेषण और इन पर सुझाव देना शुरू करना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का विश्लेषण: हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जो तेजी से बदल रही है। यहां आर्थिक शक्ति, कारोबार, तकनीक और पूंजी का प्रवाह प्राय: बेहद सहज होता है। भारत की विकास संबंधी संभावनाओं, नीतियों और बाधाओं को लेकर इसके गहरे निहितार्थ हैं। इसके बावजूद मौजूदा सरकार का कोई विभाग इनके आकलन के लिए तैयार नहीं है। नया संस्थान इसके लिए बेहतर जगह हो सकता है।

रोजगार और श्रम बाजार: हर वर्ष देश की श्रम शक्ति में शामिल होने वाली एक करोड़ से अधिक की युवा आबादी के लिए रोजगार तैयार कर पाना देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। समावेशन का सबसे बेहतर तरीका है श्रम आधारित आर्थिक विकास करना। नए संस्थान को रोजगार आधारित विकास के मार्ग की बड़ी बाधाओं पर पहले ध्यान देना होगा और फिर उनसे निपटने की नीति तैयार करनी होगी।

ऊर्जा और पर्यावरण: जैसा कि हमें रोज अखबारों से पता चलता है, भारत के सामने पर्यावरण और उसके संरक्षण के क्षेत्र में ऊर्जा उत्पादन, कीमत निर्धारण, मांग प्रबंधन, कोयला, जलविद्युत, तेल एवं गैस, नाभिकीय ऊर्जा, बिजली और सौर ऊर्जा एवं अपारंपरिक माध्यमों को लेकर तमाम दिक्कतें हैं। इन तमाम मुद्दों पर सतत और स्तरीय विश्लेषण की आवश्यकता है ताकि देश के विकास के लिए बेहतर नीतियां तैयार की जा सकें।

परिवहन एवं संचार: इसी तरह, परिवहन और संचार क्षेत्र का विकास भी कई क्षेत्रों मसलन, रेल, सड़क, बंदरगाह, जहाजरानी, हवाई परिवहन, दूरसंचार आदि में बंटा हुआ है। इसके लिए अलग अलग मंत्रालय जवाबदेह हैं। यहां भी माध्यम और लंबी अवधि का सोच आवश्यक है क्योंकि उसकी मदद से ही सही ढंग की नीतियां और तेज नियामकीय और नीतिगत ढांचा तैयार किया जा सकेगा। ऊर्जा और पर्यावरण के मामले में तत्काल विश्लेषण करने और ध्यान देने की आवश्यक है। नए संस्थान को यह मुहैया कराना चाहिए।

जल, स्वच्छता और जन स्वास्थ्य: पानी की कमी और उसका कुप्रबंधन ग्रामीण और शहरी विकास दोनों के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। पानी कई चीजों से जुड़ा हुआ है। इसमें सफाई और नाली आदि की व्यवस्था भी शामिल है। अब इन पर गंभीरता से ध्यान दिया जा रहा है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि ये जनस्वास्थ्य से बहुत करीबी से जुड़े हुए हैं। एक बार फिर इन समस्याओं की परस्पर विरोधी क्षेत्रों से जुड़ी छवि दिक्कत की वजह बनेग

भारतीय अर्थव्यवस्था- स्थिति और चुनोतियाँ

भारतीय अर्थव्यवस्था- स्थिति और चुनोतियाँ
भारत में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्ण बहुमत वाली केंद्र सरकार बनने के बाद देश में ही नहीं बल्कि विश्व भर में एक उम्मीद की लहर दौड़ती दिखाई दे रही है.

लोग आस लगाए हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में पिछले कई वर्षों से लगातार बढ़ती महंगाई और दयनीय आर्थिक स्थिति को जल्दी ही दुरुस्त करने के लिए ठोस कदम उठाएंगे.

विदेशी निवेशक, जो पिछली केंद्र सरकार के एक दशक लंबे शासन के अंतिम दिनों तक भी अपूर्ण रह गई अनगिनत परियोजनाओं और व्यापक होते भ्रष्टाचार की वजह से निराश बैठे थे, अब उत्साहित हैं कि भारत के औद्योगिक विकास में तेज़ी आएगी.

निश्चित रूप से केंद्र सरकार में इतने लंबे अरसे के बाद एक बड़ा बदलाव होने से यह उत्साह स्वाभाविक है, लेकिन क्या सिर्फ़ प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल बदल जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल कमज़ोरियाँ और अक्षमताएँ इतनी जल्दी दूर की जा सकती हैं?

भारतीय अर्थव्यवस्था की असलियत और संभावित बाधाओं पर एक रिपोर्ट

विश्व बैंक जैसे कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने आगाह किया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है और आने वाले वर्षों में इस नई सरकार को अत्यधिक सतर्क और विषम परिस्थितियों के लिए तैयार रहना होगा. देखिए, आँकड़े क्या कहते हैं:

भारत बनाम चीन

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की हाल ही की रिपोर्ट दर्शाती है कि राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था आँकने के कई मापदंडों में भारत गंभीर रूप से पिछड़ा हुआ है.

रिपोर्ट यहाँ तक कहती है कि भारत की अर्थव्यवस्था आपातकालीन दौर से गुज़र रही है. इस रिपोर्ट ने 144 देशों की आर्थिक स्थिति और भविष्य में उनकी विकास दरों की संभावनाओं को आँका है.

भारत इन देशों में 71वें स्थान पर है, जो इसी रिपोर्ट के पिछले संस्करण से 11 स्थान नीचे चला गया है.

यही नहीं, पिछले 6 वर्षों से भारत लगातार इन मापदंडों में फिसलता जा रहा है.

एशिया के दो सबसे विकासशील देशों– चीन और भारत के आर्थिक विकास को अक्सर एक स्पर्धा की तरह देखा जाता है.

2007 में भारत चीन से सिर्फ़ 14 स्थान पीछे था और अब यह फासला 43 स्थानों का हो गया है. दो दशक पहले भारत का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद चीन से अधिक था, लेकिन अब चीन भारत से चार गुना अधिक धनी देश है. कौन से कारण हैं जो भारत को लगातार पीछे धकेल रहे हैं?

अच्छी विकास दर ज़रूरी

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार एक देश की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक एक अच्छी विकास दर बनाए रखने के लिए तीन चरणों से गुज़रना पड़ता है.

पहला, मूल आधारिक संरचना, यानी स्वास्थ्य और शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं. इनके साथ ही वृहत आर्थिक स्थिति – महंगाई, राजकोषीय घाटा और आयात-निर्यात तंत्र, आदि को भी सुदृढ़ रहना चाहिए.

इन दोनों मापदंडों में भारत की स्थिति दयनीय है. इसको बदलने के लिए सरकारी व निजी संगठनों की सक्रियता, आपसी तालमेल और नौकरशाही तंत्र का सक्रिय होना आवश्यक है.

इस बुनियादी संरचना के कमज़ोर होने से कोई भी अर्थव्यवस्था देर-सवेर ज़रूर लड़खड़ा जाएगी.

भारत की कुख्यात लालफ़ीताशाही और राजनीतिक खींचातानियों को देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था की नींव ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है.

कृषि में तकनीक बढ़े

उदाहरण के लिए, वर्ल्ड बैंक के आकलन के अनुसार भारत में कोई भी परियोजना या व्यापार शुरू करने के लिए औसतन 12 औपचारिकताएं और एक महीने का समय लगता है.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 144 देशों की रैंकिंग में इस मापदंड में भारत तकरीबन सभी देशों से पीछे है.

एक और बड़ी खामी यह है कि भारत की विशाल जनसंख्या के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में कर्मियों की संख्या में बहुत असमानताएँ हैं.

लगभग हर कृषि-प्रधान देश धीरे-धीरे अन्य उद्योगों और उत्पादन-प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर अग्रशील होता है.

यह प्रक्रिया बढ़ती जनसंख्या और तकनीकी विकास की देन है. भारत की पहली समस्या यह है कि वह खेती पर निर्भर देश की 54 प्रतिशत जनता को पिछले कई दशकों से पर्याप्त संरचनात्मक सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाया.

यही वजह है कि देश की आधी से ज़्यादा आबादी का सकल घरेलू उत्पाद में सिर्फ़ 14 फीसदी योगदान है.

दूसरी तरफ, कम आय से परेशान और नए उद्यमों की ओर आकर्षित युवाओं को पर्याप्त शिक्षा और प्रशिक्षण मुहैया नहीं हो पा रहा है, इस कारण नए उद्योगों को सक्षम इंजीनियर, मैकेनिक, आदि नहीं मिलते.

बुनियादी सुविधाओं की कमी

बिजली, पानी, और औद्योगिक ऊर्जा जैसी बुनियादी चीज़ें भारत में वैसे भी विकट समस्याएँ हैं और नई परियोजनाओं को शुरू करने में बड़ी बाधा बनती हैं.

भारत के पास काम करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन उनको खपाने और उनका लाभ उठाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.

नतीजतन श्रम-सक्षमता के आंकड़े में भारत 144 देशों में 121वें स्थान पर है. यह विसंगति देश में आय असमानता और अमीर-गरीब के बीच लगातार चौड़ी होती खाई का भी कारण है.

नरेंद्र मोदी से आशाएं हैं कि वे ‘अच्छे दिनों’ को जल्दी ही ले आएंगे. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने प्रदेश में विकास की दिशा में बहुत कार्य किए, किन्तु पूरे देश की अर्थव्यवस्था के ढांचे को बदलना इतना आसान नहीं होगा.

सिर्फ़ नई योजनाएं बनाना काफी नहीं, उनको लागू करने के लिए इन मूल समस्याओं पर ध्यान देना ज़्यादा ज़रूरी है.

निवेशकों में उत्साह

केंद्र में सरकार बदलने के बाद निवेशकों के उत्साह के कुछ संकेत दिखाई देने लगे हैं.

शेयर बाज़ार का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स नई ऊंचाइयों को छू रहा है, लेकिन यह याद रखना होगा कि विदेशी निवेश, जो इस बढ़ोत्तरी का एक बड़ा कारण है, अमरीका और यूरोप के विकसित देशों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है.

अभी उन देशों की मौद्रिक नीति नरम है और ब्याज दरें बहुत कम, जिस कारण निवेशकों और उपभोक्ताओं दोनों को पैसा आसानी से उपलब्ध है.

जैसे-जैसे विश्व इस लंबी आर्थिक मंदी के दौर से उबरेगा, विकसित देशों में ब्याज दरें बढ़ेंगी. उस समय निवेशक निश्चय ही भारत की मूल कमजोरियों पर ज़्यादा ध्यान देंगे.

सतही तौर पर भारत अपने निजी आर्थिक संकट से निकलता लगता है, लेकिन देश की विकास क्षमता और स्थिरता की असली परीक्षा अभी बाकी है

(राष्ट्रपति शी चिनफिंग)

(राष्ट्रपति शी चिनफिंग)
मैंने 17 साल पहले भी प्राचीन व रहस्यमय भारत की यात्र की थी। उस वक्त भारत आर्थिक सुधारों की नीति को आगे बढ़ा रहा था और आर्थिक विकास के क्षेत्र में नई उम्मीद दिख रही थी। भारत का प्रमुख समृद्ध वाणिज्यिक शहर मुंबई, सिलिकॉन वैली बेंगलूर और बॉलीवुड की फिल्में व योग विश्व भर को प्रभावित करते रहे हैं। भारतीय जनता को अपने भविष्य के प्रति बहुत सारी उम्मीदें हैं। पुरानी सभ्यता में पुन: युवा शक्ति का जोश दिखने लगा है। 17 साल बाद फिर एक बार मैं इस सुंदर भूमि पर कदम रखूंगा। आज का भारत एक उल्लेखनीय नवोदित बाजार और बड़ा विकासशील देश बन चुका है। यह एशिया का तीसरा बड़ा आर्थिक समुदाय, विश्व का दूसरा बड़ा सॉफ्टवेयर पॉवर और कृषि उत्पादों का निर्यातक देश भी है। भारत संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और ब्रिक्स आदि संगठनों का भी सदस्य है। भारत की कहानी लोगों की जुबान पर गूंजती रहती है। भारत में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद विकास व आर्थिक सुधारों का रुझान तेज हुआ है। आज अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत में मौके तलाश रहा है।

नई सदी में प्रवेश करने के बाद चीन-भारत संबंधों का व्यापक विकास हुआ है। दोनों देशों ने शांति व समृद्धि की दिशा में रणनीतिक सहयोग आधारित साङोदारी संबंध स्थापित किए हैं। चीन भारत का सबसे बड़ा बिजनेस भागीदार बन चुका है। द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2000 में तीन अरब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अब लगभग 70 अरब अमेरिकी डॉलर पर पहुंच चुका है। पिछले साल दोनों देशों के 8 लाख 20 हजार नागरिकों ने एक-दूसरे के यहां दौरा या पर्यटन किया। जलवायु परिवर्तन, खाद्यान्न सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा जैसे वैश्विक समस्याओं पर दोनों देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग है। इसके साथ ही द्विपक्षीय संबंधों तथा विकासशील देशों के समान हितों की रक्षा के लिए कारगर पहल हुई है। दोनों देशों के बीच सीमा वार्ता को लेकर भी सक्रिय प्रगति हुई है। दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्र में अमन-चैन स्थापित करने की पूरी कोशिश की है। चीन-भारत संबंध 21वीं सदी में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सक्रिय द्विपक्षीय संबंधों में से एक बन चुका है। चीन और भारत के बीच अच्छे रिश्ते जरूरी हैं। हम एक-दूसरे पर भरोसे के सिद्धांत को अपनाकर रणनीतिक संपर्क को निरंतर मजबूत करने के साथ-साथ परस्पर विश्वास को और प्रगाढ़ करने के प्रति संकल्पबद्ध हैं। इसके साथ ही हम मतभेदों का निपटारा करने के लिए संकल्पबद्ध हैं।

वर्तमान में चीन और भारत सुधार व विकास के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। चीनी जनता अपने राष्ट्र के महान पुनरुत्थान के चीनी सपने को साकार करने के लिए कठिन मेहनत कर रही है। चीन सुधार को सर्वागीण रूप से अपना रहा है और आगे बढ़ रहा है। वहीं चीनी विशेषता वाली समाजवादी प्रणाली में सुधार व विकास करने, देश की प्रशासनिक व्यवस्था के आधुनिकीकरण के काम को आगे बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया है। चीन ने 15 क्षेत्रों में 330 से अधिक सुधार के कदम उठाए हैं। हमारी सरकार अब इन नीतियों को आगे बढ़ा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत की नई सरकार ने नौकरशाही को दुरुस्त करने और देश के आधारभूत ढांचे में सुधार के लिए 10 प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं। भारत एकजुट, शक्तिशाली व आधुनिक देश के तौर पर अपने महान राष्ट्र का निर्माण करने में लगा हुआ है।

चीन व भारत के राष्ट्रीय पुनरुत्थान का सपना एक-दूसरे से मिलता-जुलता है। हमें शक्तिशाली व समृद्ध देश के सपने को साकार करने की कोशिश करनी चाहिए। विभिन्न श्रेष्ठताओं वाले नवोदित बाजारवादी देश के तौर पर हमें विकास के लिए और अधिक साङोदारी की जरूरत है। हमें एक-दूसरे की खूबियों से सीख कर अपनी कमियों को दूर करते हुए आगे विकास करना चाहिए। नियादी संरचनाओं के निर्माण और प्रसंस्करण उद्योग के क्षेत्र में चीन के पास अधिक व्यापक अनुभव है। इन क्षेत्रों में चीन भारत के विकास में बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। भारत में सूचना व दवा उद्योग बहुत विकसित है। हम भारतीय कारोबारियों का चीन के बाजार में निवेश करने के लिए स्वागत करते हैं। विश्व का कारखाना और विश्व का दफ्तर यदि एक साथ आते हैं तो हम दुनिया में सर्वाधिक प्रतिस्पर्धी उत्पादन केंद्र बन सकते हैं और सबसे आकर्षक उपभोक्ता बाजार तैयार कर सकते हैं। चीन और भारत को एशियाई अर्थव्यवस्था के दो इंजन होने के कारण आर्थिक विकास में परस्पर साङोदारी बढ़ानी चाहिए। मुङो विश्वास है कि चीनी ऊर्जा और भारतीय बुद्धिमत्ता का मिलन हो जाए तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। एशियाई अर्थव्यवस्था के अनवरत विकास को आगे बढ़ाने के लिए हम बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक कॉरिडोर के निर्माण को आगे बढ़ाएंगे, जबकि सिल्क रोड आर्थिक जोन और 21वीं शताब्दी में समुद्री सिल्क रोड के आान पर भी चर्चा करेंगे। वैश्विक बहुध्रुवीकरण की प्रक्रिया में दो बड़ी और महत्वपूर्ण शक्तियां होने के कारण हमें रणनीतिक सहयोग वाली वैश्विक साङोदारी करनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का मानना है कि चीन व भारत दो शरीर और एक भावना हैं। मैं इससे सहमत हूं। हालांकि चीनी ड्रैगन और भारतीय हाथी की भिन्न-भिन्न विशेषताएं हैं, फिर भी दोनों देश शांति, निष्पक्षता और न्याय के पक्षधर हैं।

हमें पंचशील सिद्धांत का प्रसार करके अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को और अधिक निष्पक्ष व सही दिशा में विकसित करने की कोशिश जारी रखनी चाहिए। वहीं युग के विकास और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की समान मांग को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को बेहतर ढंग से हल करने की आवश्यकता है चीनी नेता देंग ने कहा था, एशिया की सदी का सपना चीन-भारत और अन्य पड़ोसी देशों के विकास के बाद ही साकार हो सकेगा। हम इस युग प्रदत्त जिम्मेदारी को निभाते हुए चीन-भारत मैत्री की प्रेरणाशक्ति बनने को तैयार हैं। भारत यात्र के दौरान शांति व समृद्धि की दिशा में उन्मुख चीन-भारत रणनीतिक सहयोग आधारित साङोदारी संबंधों में नई प्रेरणा शक्ति डालने के लिए मैं भारतीय नेताओं के साथ दोनों देशों के बीच रिश्तों पर गहन आदान-प्रदान की प्रतीक्षा में हूं। मुङो विश्वास है कि अगर चीन व भारत एकजुट होकर सहयोग करते रहे तो एक समृद्ध व पुनर्जीवित एशिया की सदी अवश्य ही जल्द साकार होगी।

भारत और चीन के रिश्ते

भारत और चीन के रिश्ते ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. आजादी के बाद 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारे से स्टैपल वीज़ा पर उपजे विवाद तक.

इस बीच दोनों मुल्कों की एक जंग हुई और बातचीत की मेज पर अक्साई चीन समेत अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे भी आते रहे.

लद्दाख में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबरों से लेकर दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन का सवाल अखबारों की सुर्खियां बटोरता रहा है.

लेकिन अब नई सरकार विदेश नीति के मोर्चे पर सक्रिय दिख रही है और पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को पटरी पर लाने की पहल ज़मीन पर देखी जा सकती है.

इन्हीं कोशिशों की ताजा कड़ी है शी जिनपिंग का भारत दौरा.

और मोदी और शी जिनपिंग की दोस्ती रूमानी हो, इसके लिए सात बाहरी कारणों को समझना जरूरी है.

जापान से मुकाबला और अहमदाबाद

जापान की सौ कंपनियों ने भारत में निवेश करने की योजना बना रखी है. उनमें से 50 ने इस दिशा में कदम भी बढ़ा दिए हैं.

जापान के कारोबारी संगठन 'जेट्रो' ने अहमदाबाद में पिछले साल अपना दफ्तर खोला है.

यह जापान की चीन से प्रतिस्पर्द्धा है जिसकी वजह से शी जिनपिंग ने भारत दौरे की शुरुआत के लिए अहमदाबाद को चुना है न कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से किसी लगाव की वजह से.

जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने मुंबई को अहमदाबाद से जोड़ने वाले रेल लिंक के लिए बुलेट ट्रेन देने पर सहमति भी दी है.

भारत पर आबे के असर को चुनौती

चीन ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वह इस मुद्दे पर किस हद तक जा सकता है.

चीन के एक मंत्री ने हाल ही में भारत को एक नाभिकीय संयंत्र बनाने में मदद की पेशकश की थी.

इस पेशकश के पीछे विचार जापान के तरफ से आने वाले ऐसे किसी प्रस्ताव को बेअसर करना था.

चीन भी भारत को 100 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता देना चाहता है.

यह रकम हाल ही में जापान दौरे पर मोदी को आबे की ओर से मिली पेशकश की तकरीबन तीन गुनी है.पाकिस्तान में अस्थिर सरकार

चीन की सीमा में अतिक्रमण करने वाले इस्लामी चरमपंथियों से निपटने का सवाल हो या फिर भारत पर दबाव बनाने की जरूरत हो, इन दो मुद्दों पर चीन हमेशा से पाकिस्तान पर निर्भर रहा है.

लेकिन हाल के समय में पाकिस्तान की अहमियत चीन की नज़र में कम हुई है.

नवाज़ शरीफ की सरकार विपक्ष के विरोध की वजह से अस्थिर नजर आ रही है.

नवाज़ शरीफ चरमपंथियों पर थोड़ा असर रखते हैं जो उन पर लगाम रखने के लिए जरूरी है.

हिंद महासागर से जुड़ने की चीन की चाह

श्रीलंका और मालदीव में चीन की मौजूदगी भारत पर दबाव डाल रही है. दोनों ही देशों ने चीन के मैरीटाइम सिल्क रूट में शामिल होने पर सहमति दी है. भारत इससे सहमत नहीं है.

माले एयरपोर्ट की कमान चीन के हाथ में है. मालदीव शंघाई कॉरपोरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन में शामिल होना चाहता है जिसमें भारत और पाकिस्तान एक प्रेक्षक की भूमिका में हैं न कि सदस्य की हैसियत से.

माले ने सार्क में चीन को अपनी भूमिका बढ़ाने में मदद देने पर सहमति दी है. बदले में चीन ने मालदीव के आंतरिक मामलों में दखल न देने का वादा किया है, जाहिर है इसका सरोकार भारत से है.

श्रीलंका और मालदीव, दोनों ही हिंद महासागर में चीन को रास्ता देने के सवाल पर संजीदा हैं.

वियतनाम के साथ भारत का सौदा, चीन की चिंता

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की हाल की हनोई यात्रा में चौंका देने वाला समझौता हुआ है.

भारत 'साउथ चाइना सी' में तेल खनन के लिए वियतनामी कंपनी के साथ उतरेगा.

ऐसे ही एक सौदे का चीन ने ज़बरदस्त विरोध किया था और दो साल पहले वियतनाम ने अपने पांव वापस खींच लिए.

चीन और वियतनाम दोनों ही समुद्र के एक हिस्से पर दावा करते हैं. इस नए समझौते ने चीन पर ज़बरदस्त दबाव डाला है और इस विवाद में वियतनाम का पक्ष मजबूत कर दिया है.

यह पहली बार है कि भारत ने चीन से निपटने के लिए किसी और देश का इस्तेमाल किया है.

पर्यावरण और डब्ल्यूटीओ के सवाल पर पश्चिमी देशों का दबाव

पर्यावरण में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय कारोबारी मुद्दों पर भारत और चीन ने एक साथ काम करके बड़ी कामयाबी के साथ पश्चिमी देशों को किनारे कर दिया था.

उनके साथ आने से विकासशील देशों की आवाज़ भी बुलंद हुई.

विश्व व्यापार संगठन में भारत को उस वक्त एक बड़ा झटका लगा जब उसने एक प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया लेकिन इस मुद्दे पर चीन ने उसका साथ नहीं दिया.

लेकिन इन मुद्दों पर अलग प्राथमिकताओं वाले पश्चिमी देशों से निपटने के लिए दोनों ही देशों को एक दूसरे की जरूरत है.

ब्रिक्स और एससीओ

ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के संगठन 'ब्रिक्स' में चीन एक नेता के तौर पर उभरा है.

उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों को अमरीकी प्रभाव से दूर रखने और अपना असर बढ़ाने के मद्देनज़र ब्रिक्स चीन की जरूरतों पर खरा उतरता है.

पांच देशों के क्लब के अघोषित नेता की अपनी हैसियत बरकार रखने और ब्रिक्स बैंक की योजना को कामयाब करने के लिए शी जिनपिंग को मोदी की मदद की जरूरत होगी

मैक इन इंडिया : एक मुल्यांकन

मैक इन इंडिया : एक मुल्यांकन 

IAS तथा RAS परीक्षा हेतु

अ )क्या है मैक इन इंडिया 
ब )आवश्यकता क्यों
स ) प्रमुख बिंदु 
द ) लाभ 
य )चीन से भिन्नता 
र ) बाधाएँ
व ) निष्कर्ष

अ )क्या है मैक इन इंडिया

यह भारत को विनिर्माण में अग्रणी बनाने का एक संकल्प है।इस प्रोग्राम की शुरुवात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में की गयी। इस अवसर पर
30 देशों के उद्योगपतियों ने भाग लिया।

ब )आवश्यकता क्यों

वैश्विक विनिर्माण में भारत की भगीदारी मात्र 2.1 %है जबकि चीन की 22.4% ।इसलिए इस और ध्यान दिया जाना चाहिए।

भारत के GDP में विनिर्माण का हिस्सा मात्र 15% है जबकि चीन काजहाँ 33 % वहीँ इंडोनेशिया ,पाकिस्तान, बांग्लादेश सरीके मुल्क भी हमसे आगे है जिनका योगदान क्रमश: 26%,19% एवं 19% है।
(स्रोत -UNO की वेबसाइट )

तथ्यों से जाहिर है कि इस सेक्टर को अभी तक उपेक्षित ही माना गया है।

स ) प्रमुख बिंदु

इसका लोगो दहाड़ता हुवा शेर है।

अब उधोग हेतु लाइसेंस पाना आसान होगा।

सरकार भारत में निवेशकों की सुगमता के लिए सभी प्रयास करेगी। इसमें व्यावसायिक इकाइयों की पूछताछ आदि का 72 घंटे में जवाब देने के लिए एक प्रकोष्ठ का गठन भी शामिल है। यह सभी नियामकीय प्रक्रियाओं की निगरानी भी करेगा और उन्हें सरल बनाएगा। इसके साथ अनुपालन के बोझ को भी कम किया जाएगा।

एक आधिकारिक बयान में कहा गया है, ‘सरकार एक नया रास्ता बनाने को प्रतिबद्ध है जिसमें कारोबारी इकाइयों को लाल कालीन पर स्वागत जैसा अनुभव देने का विचार है। विदेशी निवेशकों को नियामकीय व नीतिगत मुद्दों पर दिशानिर्देशन के लिए ‘भारत में निवेश’ प्रमुख संदर्भ बिंदु के रूप में काम करेगा। और उन्हें नियामकीय मंजूरियां दिलाने में मदद करेगा।’

केंद्र सरकार ने ऐसे 25 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें भारत दुनिया में अग्रणी स्थिति हासिल करने की क्षमता रखता है। इस अवसर पर एक सामान्य परिचय पुस्तिका के अलावा उपरोक्त महत्पूर्ण चिह्नित क्षेत्रों के बारे में अलग-अलग ब्रोशर भी जारी किये गए। जिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों के अलग-अलग ब्रोशर जारी किए जाएंगे उनमें वाहन, रसायन, आईटी, फार्मा, परिधान, बंदरगाह, विमानन, चमड़ा, पर्यटन एवं आतिथ्य, वेलनेस व रेलवे शामिल हैं।

विदेशी निवेशकों के भारत आगमन या प्रस्थान पर निवेशक सुविधा सेल उनकी मदद करेगा। यह मुख्य रूप से हरित व आधुनिक विनिर्माण पर केंद्रित होगा। इन कंपनियों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने में मदद की जाएगी।

यह अभियान राष्ट्रीय के अलावा राज्यस्तर व देश के बाहर मिशनों में भी पेश किया जाएगा।

यह चयनित देश में विभिन्न क्षेत्रों की शीर्ष कंपनियों को लक्ष्य करेगा।

इसके अलावा यह चुनिंदा घरेलू कंपनियों की भी पहचान करेगा जो नवोन्मेषण और नई प्रौद्योगिकी में अग्रणी हैं जिससे उन्हें वैश्विक स्तर पर चैंपियन के रूप में स्थापित किया जा सके।

द )लाभ

विनिर्माण सेक्टर से ही बेरोजगारी की समस्या को दूर किया जा सकता है।

भारत के व्यापर भुगतान के संतुलन हेतु भी विनिर्माण सेक्टर में तेजी आवश्यक है

भारत काफी मात्रा में तेल का आयात करता है लेकिन निर्यात करने हेतु मदें बहुत कम है

इससे हमारे निर्यात क्षेत्र में वॄद्धि होगी।

सर्विस सेक्टर का उपभोग केवल स्थानीय स्तर पर ही किया जा सकता है उसका निर्यात नहीं किया जा सकता। जैसे कोई धोबी केवल स्थानीय स्तर पर ही अपनी सेवा दे सकता है।

सोफ्टवेयर क्षेत्र में निर्यात संभव है लेकिन सेवा क्षेत्र में इसका योगदान मात्र 5-6% ही है।परन्तु यदि हम सामान या वस्तुएं बनायें जैसे ऑटोमोबाइल, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक, टेक्सटाइल आदि ।इनका निर्यात सम्भव है।

इससे हमें विदेशी मुद्रा भी मिलेगी।जिससे हमारा फोरेक्स रिज़र्व भी बढेगा।

इसमें किसी भी प्रकार प्रकार की सब्सिडी की बात नहीं बल्कि यह अपील है कि आप भारतीय है या विदेशी आप अपना सामान चाहे जहाँ बेचे लेकिन निर्माण भारत में ही करें।

इससे ओधोगिक कल्चर का विकास होगा।

य) चीन से भिन्नता

मैक इन इंडिया प्रोग्राम के अगले ही दिन चीन ने मेड इन चाइना प्रोग्राम की शुरुवात कर यह संकेत देने की कोशिश की विनिर्माण क्षेत्र में वह अपना दबदबा बनाये रखना चाहेगा।परन्तु दोनों में काफी हद तक असमानता है।

हमारा विनिर्माण मॉडल चीन से भिन्न होगा। चीन ने तो हर इंडस्ट्री को विशेष सब्सिडी दे कर बुला लिया

वहां सब कुछ द्विपक्षीय होता है ,नीति नहीं होती।

परन्तु हमारा उदेश्य किसी विशेष इंडस्ट्री को वरीयता देने का नहीं बल्कि सभी के लिए सामान रूप से बहेतर शासन उपलब्ध करवाना है।

चीन की तुलना में हम एक लोकतंत्र है ।यहाँ श्रमिक कानूनों का विशेष महत्व है।

र ) बाधाएँ

हमारे पास सपष्ट रणनीति और योजना का अभाव है।

पूर्व में कहा गया कि योजना आयोग को समाप्त किया जायेगा लेकिन उसकी जगह नयी सरंचना क्या होगी अभी तक अस्पष्ट है।

हमारी आर्थिक संरचना अत्यधिक जटिल है सबसे ज्यादा 50% रोजगार देने वाला सेक्टर कृषि है जिसमें मात्र 4% निवेश आ रहा है।जबकि बड़े उधोगों में 80% निवेश आ रहा है जो कि मात्र 6% लोगों को रोजगार दे रहे है।

1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण के नाम पर लघु और मध्यम उधोगों को जो संरक्षण मिलता है उसे समाप्त कर दिया गया।

यदि हम बिना भारतीय कंपनियों को विशेष सब्सिडी देते हुवे मार्केट खोल देंगे तो इससे तो नुकसान ही होगा। उदाहरण के तौर पर भारतीय कम्पनी भेल किसी भी सुरत में जर्मनी कम्पनी सिमंस का मुकाबला नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास उच्च टेक्नोलॉजी और संसाधन है।

भारत में बदनाम कठोर नौकरशाही और लाल फीताशाही इसमें महत्वपूर्ण अडंगा है।

सुशासन हेतु पर व्यापक परिवर्तनों की आवश्यकता है।

व ) निष्कर्ष

व्यपार करने की सहूलियत आर्थिक आजादी के लिए अभी वैश्विक सूचकांकों में भारत अभी काफी पीछे है इसके लिए कठोर कदम उठाने होंगे। हमारा सर्विस सेक्टर उतना रोजगार निर्माण नहीं कर सकता जो कि विनिर्माण क्षेत्र द्वारा किया जा सकता है।परन्तु प्रशासनिक मशीनरी की उलझी प्रक्रियाओं से इसे निकलना होगा। छोटे उधोगों के विकास की अन्य सबसे बड़ी समस्या वित्त की कमी है इस ओर भी ध्यान देना होगा।

अंत में हमें यह नहीं भुलाना चाहिए कि "मैक इन इंडिया " प्रोगाम के उद्यघाटन अवसर पर बाटें गए
ब्रोशर पर मेड इन चाइना लिखा था

न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका :उपजा विवाद एवं कोलिजियम व्यवस्था की प्रासंगिकता।

न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका :उपजा विवाद एवं कोलिजियम व्यवस्था की प्रासंगिकता।
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न्याय पालिका बनाम कार्यपालिका के मध्य विवाद एक चर्चित विषय बन गया है।इस विषय को हम निम्न प्रकार से देख सकते है-

1.हाल ही में चर्चित क्यों
2.क्या है कोलिजियम व्यवस्था।
3.क्या थी पूर्व व्यवस्था
4.लाभ
5.क्या है समस्या
6.क्या प्रयास किये गए
7.सुझाव

1.हाल ही में चर्चित क्यों

हाल में पीटीआई के अध्यक्ष काटजू द्वारा मद्रास कोर्ट के पूर्व जज पर लगाये गए आरोप ,गोपाल सुब्रमण स्वामी को सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के जज पद पर न चुने जाना तथा चीफ जस्टिस द्वारा इसकी कठोर आलोचना के मध्यनजर न्याय पालिका बनाम कार्यपालिका के मध्य विवाद महत्वपूर्ण विषय बन गया है।

2.क्या है कोलिजियम व्यवस्था।

*कोलिजयम व्यवस्था के अनुसार SC तथा HC के जज का के नाम की सिफारिश SC के पैनल द्वारा ही की जायेगी।

*सरकार अगर किसी जज की प्रस्तावित नियुक्ति की फाइल वापस सुप्रीम कोर्ट कोलिजियम को भेज दे तो कोलिजियम सरकार को पुननर्विचार की अपील भेज सकता है और ऐसा होने पर सरकार उस सिफारिश को मानने पर बाध्य हो जाती है।

2.क्या थी पूर्व व्यवस्था -

*1993 से पूर्व नियुक्ति सम्बन्धित प्रक्रिया मंत्री समूह के पास थी जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 वरिष्ठ जजों के कोलिजियम को सोंपा गया।

3.लाभ-

*इससे प्रमुख लाभ यह है कि न्यायपालिका में राजनितिक हस्तक्षेप कम होगा।

*न्याय पालिका का राजनीतिकरण कम होगा।

*न्यायिक निर्णयों में पारदर्शिता आएगी।

4.समस्या -

*हाल ही उपजे विवाद से यह स्पष्ट हो गया कि यह प्रक्रिया भी राजनीतिक दबाब से परे नहीं है।

*कोलिजियम में यदपि जजों का पैनल होता है परन्तु यहाँ होता वही है जो चीफ जस्टिस चाहते है।

*यह व्यवस्था सविंधान से भी उपर हो गयी ।

*लॉ कमीशन तथा पार्लियामेंटरी स्टैंडिंग समिति ने भी इस सिस्टम को दोषपूर्ण बताया।

* ऐसे दागदार नामों की भी सिफरोश कर दी जाती है जिसे पुन लोटाया गया।

*न्यायपालिका में शिकायत ऒर उसके निपटारे की पारदर्शी तन्त्र का आभाव प्रमुख समस्या है।

*अदालत के पास कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का पॉवर भी प्रमुख बाधा के रूप में कार्य करता है।

5.क्या प्रयास किये गए -

*गत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट एवं उच्च न्यायलयों में जजों की नियुक्ति के लिए 'judicial appointment commission bill' तैयार किया था।

*इसके लिए सविधान संसोधन की आवश्यकता थी यह विधेयक राज्यसभा में दिसम्बर 2013 में पास हो गया ।

*इसे स्टैंडिंग समिति को सोंपा गया।

*यह 120 वां साविधान संसोधन विधेयक था ।

*परन्तु 15 वीं लोक सभा के भंग होने पर विधेयक तो लेप्स है तथा कमीशन का गठन राज्यसभा में लंबित है।

6.सुझाव-

*रास्ट्रीय न्यायिक आयोग की व्यवस्था की जाये।

*नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी हो।

*रिक्त पद भरे जाय।

*राजनेतिक धकल बंद हो।

*आन्तरिक शुद्विकरण के प्रयास हो।

ई-गवर्नमेंट: चुनौतियां एवं अवसर

ई-गवर्नमेंट: चुनौतियां एवं अवसर

Source: रोजगार समाचार

1.इलेक्ट्रॉनिक गवर्नमेंट (ई-गवर्न) का अर्थ 
2.ई गवर्नमेंट से लाभ
3.सरकार के प्रयास
4.चुनोतियाँ
5.सुझाव

1.इलेक्ट्रॉनिक गवर्नमेंट (ई-गवर्न) का अर्थ-
नागरिकों (जी2 सी.), व्यवसायियों (जी2बी.), कर्मचारियों (जी2ई.) और सरकारों (जी2जी.) को सरकारी सूचना एवं सेवाएं देने के लिए संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करना।

2.ई गवर्नमेंट से लाभ

* संगठनात्मक परिप्रेक्ष्य से
ई-गवर्नमेंट का अत्यधिक स्पष्ट लाभ है - वर्तमान व्यवस्था या प्रणाली की दक्षता में सुधार लाना, ताकि यह धन एवं समय बचा सके। उदाहरण के लिए, एक बोझिल दस्तावेजी प्रणाली से हट कर यदि किसी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली पर कार्य किया जाए तो यह प्रणाली जनशक्ति की आवश्यकता को कम कर सकती है और कार्य-परिचालन लागत भी घट सकती है।

*नागरिक परिप्रेक्ष्य से
देखा जाए तो ई-गवर्नमेंट का एक अत्यधिक महत्वपूर्ण लाभ (मानव चालित प्रणालियों की तुलना में) यह है कि नागरिकों को सरकारी सेवाएं ”कहीं भी और किसी भी समय“ उपलब्ध हो सकती हैं।
नागरिकों के लिए ई-गवर्नमेंट के अन्य लाभों में निम्नलिखित शामिल हैं:- बहुभाषी सूचना सारांश, डिसेबल्ड-फ्रेंडली नेवीगेशन, सारांश तक पहुंच एवं सरकार से जुड़ी सूचना, सेवाओं तथा योजनाओं में नवीनतम परिवर्तनों की नियमित जानकारी।

*इसके अतिरिक्त, (ई-गवर्न) सेवाएं मुद्रित कागजों की आवश्यकता को भी कम करेंगी; इसलिए, ये एक हरे-भरे ग्रह तथा धारणीय पारिस्थितिक प्रणाली में योगदान देती हैं।
*इंटरनेट का उपयोग देखो और अनुभव करो की दृष्टि से सूचना को आसानी से ढूंढा जा सकता है।
*खराब गवर्नेंस (जो निरंकुशता, भ्रष्टाचार, पारदर्शिता का साख की कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न करती हैं) को कई विकासशील देशों का एक बड़ा मुद्दा माना जाता है।
*(ई-गवर्न) का प्रभावी कार्यान्वयन, ई-गवर्नेंस को सक्षम बनाएगा, जिससे निरंकुशता तथा भ्रष्टाचार में कमी आने और सरकारी निर्णय लेने में नागरिकों के विनियोजन तथा सहभागिता के माध्यम से बेहतर पारदर्शिता एवं जिम्मेदारी की संभावना है।
*ई-गवर्नेंस को (ई-गवर्न) कार्यान्वयन का एक मूल वांछनीय परिणाम माना जा सकता है।

3.सरकार के प्रयास

हाल ही के दशकों में भारत ने आई.सी.टी. के क्षेत्र में बड़ी तीव्र गति से प्रगति की है। भारत सरकार ने भी स्वीकार किया है कि पिछले कुछ वर्षों में सरकारी सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने में आई.सी.टी. ने एक अहम भूमिका निभाई है। भारतीय संदर्भ में ई-गवर्नेंस इस तथ्य के कारण भी महत्वपूर्ण है कि आई.सी.टी. के प्रभावी उपयोग ने, सरकारी सेवाओं को विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों तथा भौगोलिक स्थलों तक पहुंचने योग्य बनाया है और इसलिए एक अधिक सम्मिलित समाज का सृजन करने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया है। सरकारी प्रशासन में आई.सी.टी. सेवाओं के प्रभावी उपयोग से दक्षता में महत्वपूर्ण सुधार आया है, संचार लागत में कमी आई है और विभिन्न विभागों की कार्य-पद्धति में पारदर्शिता में वृद्धि हुई है।

ई-गवर्नेंस के विभिन्न सकारात्मक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने ”सभी सरकारी सेवाएं आम आदमी को उसके स्थान पर सुगम्य कराने, सभी आम सेवाएं डिलीवरी केन्द्र उपलब्ध कराने तथा आम आदमी की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वहन करने योग्य लागत पर ऐसी सेवाओं की दक्षता, पारदर्शिता एवं विश्वसनीयता सुनिश्चित करने“ के ध्येय से मई, 2006 में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (एन.ई.जी.पी.) का अनुमोदन किया।

4.चुनोतियाँ

भारतीय संदर्भ में ई-गवर्नेंस के सफल कार्यान्वयन की राह में अनेक मुद्दे तथा चुनौतियां सामने खड़ी हैं। इन मुद्दों को तीन मुख्य वर्गों में विभाजित कर सकते हैं:तकनीकी, आर्थिक एवं सामाजिक मुद्दे।

*तकनीकी मुद्दे
गोयनीयता, सुरक्षा एवं बहु-मॉडल परस्पर प्रभाव शामिल हैं।

*आर्थिक मुद्दे
मुख्य रूप से निवेश पर लाभ और लागत, सम्पोषणीयता पुनः उपयोगिता एवं सुवाध्यता सहित तकनीकी मुद्दों की सुरक्षा से संबंधित है।

*सामाजिक मुद्दे
(ई-गवर्न)के विकास तथा व्यापक अंगीकरण के संबंध में अत्यधिक महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, इनमें जागरूकता अभाव और किसी बड़े वर्ग द्वारा इलेक्ट्रॉनिक रूप में दी गई सरकारी सेवाओं का अंगीकरण एवं उपयोग शामिल हैं। ई-गवर्नमेंट सेवाओं को ग्रामीण समाज तक पहुंचाने में अन्य चुनौतियां हैं।

5. सुझाव

ऐसी चुनौतियों पर नियंत्रण करने के लिए स्थानीय आवश्यकताओं का मूल्यांकन करने और इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए (ई-गवर्न) समाधानों को प्रचलन में लाने, ग्रामीण एवं दूरस्थ इलाकों में रहने वाले जन समुदाय से सम्पर्क का प्रावधान करने, स्थानीय भाषाओं में वेब सार का विकास करने और एक मानव संसाधन ज्ञान बल का निर्माण करने की आवश्यकता है।

ऐसे मुद्दों तथा चुनौतियों पर काबू प्राप्त करने के लिए अनुसंधानकर्ताओं, प्रेक्टिसनरों तथा सरकारी एजेंसियों को, (ई-गवर्न) के व्यापक विकास तथा विस्तार में सहायक अवसरो का विकास करना आवश्यक है।

दक्षिणी चीन सागर - भू राजनैतिक संघर्ष क्षेत्

दक्षिणी चीन सागर - भू राजनैतिक संघर्ष क्षेत्र

Geo Political conflict zone

विस्तृत प्रशांत महासागर का एक हिस्सा दक्षिण चीन सागर है, जो करीब 36 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और यह ‘अलीबाबा की गुफाओं’ की तरह ही है। न जाने कितना सारा तेल और गैस भंडार इसके भीतर छिपे हुए हैं, इस पर अभी कयास ही लग रहा है और इसलिए भी यह ‘विवाद का विषय’ बना हुआ है कि वहां कुछ है भी या नहीं। इसके भविष्य को न देखें, तब भी इसका वर्तमान बताता है कि इस पूरे समुद्री इलाके से दुनिया का एक तिहाई पोत-परिवहन होता है। इसका एक वर्तमान तथ्य यह भी है कि चीन इसके बड़े हिस्से पर अपनी संप्रभुता का दावा करता है। इसकी वजह से ही यह इलाका आजकल सुर्खियों में रहता है।

विवाद इस सागर का ही नहीं, इसके द्वीप समूहों को लेकर भी है। दक्षिण चीन सागर में चीन के अलावा, तीन बड़े ‘प्लेयर’ हैं- जापान, वियतनाम और फिलीपींस। इस विवाद को और बड़ा करके देखें, तो इसमें मलयेशिया और ब्रूनेई के दावे भी जुड़ते हैं। सबके अपने-अपने दावे और इन पर अधिकार के अपने-अपने तर्क हैं। अब अगर चीन अपना दावा सबसे आगे रखता है, तो इसका अर्थ क्या निकाला जाए? इसे ‘संप्रभुता’ के उसके दावे के अर्थ में समझना होगा। एशिया में आज क्षेत्रीय संप्रभुता के मुद्दे बड़े ही कट्टर तरीके से उठाए जाते हैं। जहां भी क्षेत्रीय विवाद के मुद्दे उठते हैं, वहां काफी कड़ा रवैया अपनाया जाता है। 30 सितंबर को अमेरिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का दक्षिण चीन सागर का संयुक्त बयान आया, इस पर चीन ने भी अपना पक्ष रखा है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि दक्षिण चीन सागर में चीन की स्थिति मजबूत है और वह इस पर अपना अधिकार जताने के लिए हर तरीका अपनाता आया है। पहला तरीका कूटनीतिक है। अक्सर यह दिखा है कि दक्षिण चीन सागर के मसले पर जिन देशों के साथ चीन का विवाद है, उन सभी छोटे-छोटे देशों से चीन अलग-अलग बातचीत करता है, उनके साथ अलग-अलग समझौते करता है । वैसे भी बड़ी अर्थवयवस्था से रिश्ते बनाने में परहेज किसे होता है? बहरहाल, चीन की इस कोशिश को ऐसे देखा जाना चाहिए कि वह नहीं चाहता कि ये देश दक्षिण चीन सागर के मसले पर उसका एकजुट होकर विरोध करें या कोई गठबंधन खड़ा कर लें।

इस इलाके में चीन दूसरा तरीका अपनी सैन्य शक्ति से जाहिर करता है। एक अनुमान के मुताबिक, चीन अपने रक्षा बजट में हर साल दस फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी कर रहा है। उसका रक्षा बजट दुनिया में दूसरे स्थान पर है और यह एक संकेत है कि देश का लक्ष्य अपनी मजबूत सैन्य उपस्थिति को दर्ज कराना है। इसका असर प्रशांत महासागरीय क्षेत्र पर साफ रूप से दिख रहा है। तभी तो इस सागर क्षेत्र को लेकर भले कुछ देशों के साथ चीन के विवाद हों, पर तनाव के हालात नहीं हैं। तीसरा तरीका इतिहास है। दक्षिण चीन सागर को लेकर पिछले दो-तीन वर्षों में चीन की तरफ से इतना इतिहास परोसा गया है और उसे प्रचारित किया गया है कि ऐसा लगता है कि यह हिस्सा चीन का ही है। हालांकि चीन के अलावा, अन्य दावेदार देशों ने भी कमोबेश यही काम किया है। विश्व समुदाय में यह धारणा भी बनी है कि चीन संप्रभुता के मामले में एक अधिक संजीदा राष्ट्र है। इसका एक उदाहरण हांगकांग मामले में भी सामने आता है। वाशिंगटन के बयान पर चीन ने यह आपत्ति जताई थी कि यह उसका अंदरूनी मामला है। ऐसे समय में, जब एशिया की भू-राजनीति बदल रही है (अमेरिका का जोर एशिया पिवट पर है और जापान अपनी रक्षा नीति में बदलाव ला रहा है), तब चीन इसी धारणा का इस्तेमाल अपने पक्ष में करना चाहेगा।

इन सबके अलावा, दक्षिण चीन सागर के मसले पर ऊर्जा-स्रोत भी एक मुद्दा है। लेकिन यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं कि इसे ध्यान में रखकर चीन कोई विवाद उठाए। इस क्षेत्र से तेल निकाला जाए, इसी में सबकी भलाई है। दुनिया को आज अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत है और चीन यही चाहेगा कि इस काम में वह अन्य देशों का लाभ उठाए। होर्मुज से मलक्का की सी लेन स्ट्रैटजी चीन की देन है। तेल दोहन को लेकर इस क्षेत्र में चीन कई संधियां कर चुका है, जिसमें साझा अन्वेषण पर जोर है।

प्रश्न यह है कि फिर चीन के साथ भारत के विवाद क्या हैं? सीमा विवाद तो है ही। लेकिन जाहिर है कि तेल खनन को लेकर वियतनाम के साथ भारत के हुए ताजा समझौते इसकी जड़ में नहीं हैं। वियतनाम ने जो पिछला कॉन्ट्रैक्ट हमें दिया था, उससे कोई फायदा नहीं हुआ। यह साफ है कि दक्षिण चीन सागर में भारत की भी दिलचस्पी है, क्योंकि वह वहां अपनी मौजूदगी दिखाना और किसी एक शक्ति का दबदबा बनने से रोकना चाहता है। फिर उसे तेल की जरूरत है ही। इस बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे पर गए थे। उससे पहले वह जापान दौरे पर गए थे। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो जापान एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्था। हालांकि, चीन के मुकाबले भारत कम बड़ी शक्ति है, लेकिन प्रधानमंत्री के ताजा दौरे से चीन पर किसी तरह का दबाव बना हो, तो उस बारे में विशेष कुछ कहा नहीं जा सकता।

इसलिए चीन की ताजा प्रतिक्रिया को उसके स्वाभाविक रवैये से अधिक जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए और यह भी समझना होगा कि दक्षिण चीन सागर दरअसल एक विवादित क्षेत्र है, जहां अब तक कूटनीतिक समझ नहीं बन पाई है। इसलिए समय-समय पर इसे लेकर वातावरण में गरमी पैदा हो जाती हैं।
Photo: दक्षिणी चीन सागर  - भू राजनैतिक संघर्ष क्षेत्र

Geo Political conflict zone

विस्तृत प्रशांत महासागर का एक हिस्सा दक्षिण चीन सागर है, जो करीब 36 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और यह ‘अलीबाबा की  गुफाओं’ की तरह ही है। न जाने कितना सारा तेल और गैस भंडार इसके भीतर छिपे हुए हैं, इस पर अभी कयास ही लग रहा है और इसलिए भी यह ‘विवाद का विषय’ बना हुआ है कि वहां कुछ है भी या नहीं। इसके भविष्य को न देखें, तब भी इसका वर्तमान बताता है कि इस पूरे समुद्री इलाके से दुनिया का एक तिहाई पोत-परिवहन होता है। इसका एक वर्तमान तथ्य यह भी है कि चीन इसके बड़े हिस्से पर अपनी संप्रभुता का दावा करता है। इसकी वजह से ही यह इलाका आजकल सुर्खियों में रहता है।

विवाद इस सागर का ही नहीं, इसके द्वीप समूहों को लेकर भी है। दक्षिण चीन सागर में चीन के अलावा, तीन बड़े ‘प्लेयर’ हैं- जापान, वियतनाम और फिलीपींस। इस विवाद को और बड़ा करके देखें, तो इसमें मलयेशिया और ब्रूनेई के दावे भी जुड़ते हैं। सबके अपने-अपने दावे और इन पर अधिकार के अपने-अपने तर्क हैं। अब अगर चीन अपना दावा सबसे आगे रखता है, तो इसका अर्थ क्या निकाला जाए? इसे ‘संप्रभुता’ के उसके दावे के अर्थ में समझना होगा। एशिया में आज क्षेत्रीय संप्रभुता के मुद्दे बड़े ही कट्टर तरीके से उठाए जाते हैं। जहां भी क्षेत्रीय विवाद के मुद्दे उठते हैं, वहां काफी कड़ा रवैया अपनाया जाता है। 30 सितंबर को अमेरिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का दक्षिण  चीन सागर का संयुक्त बयान आया, इस पर चीन ने भी अपना पक्ष रखा है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि दक्षिण चीन सागर में चीन की स्थिति मजबूत है और वह इस पर अपना अधिकार जताने के लिए हर तरीका अपनाता आया है। पहला तरीका कूटनीतिक है। अक्सर यह दिखा है कि दक्षिण चीन सागर के मसले पर जिन देशों के साथ चीन का विवाद है, उन सभी छोटे-छोटे देशों से चीन अलग-अलग बातचीत करता है, उनके साथ अलग-अलग समझौते करता है । वैसे भी बड़ी अर्थवयवस्था से रिश्ते बनाने में परहेज किसे होता है? बहरहाल, चीन की इस कोशिश को ऐसे देखा जाना चाहिए कि वह नहीं चाहता कि ये देश दक्षिण चीन सागर के मसले पर उसका एकजुट होकर विरोध करें या कोई गठबंधन खड़ा कर लें।

इस इलाके में चीन दूसरा तरीका अपनी सैन्य शक्ति से जाहिर करता है। एक अनुमान के मुताबिक, चीन अपने रक्षा बजट में हर साल दस फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी कर रहा है। उसका रक्षा बजट दुनिया में दूसरे स्थान पर है और यह एक संकेत है कि देश का लक्ष्य अपनी मजबूत सैन्य उपस्थिति को दर्ज कराना है। इसका असर प्रशांत महासागरीय क्षेत्र पर साफ रूप से दिख रहा है। तभी तो इस सागर क्षेत्र को लेकर भले कुछ देशों के साथ चीन के विवाद हों, पर तनाव के हालात नहीं हैं। तीसरा तरीका इतिहास है। दक्षिण चीन सागर को लेकर पिछले दो-तीन वर्षों में चीन की तरफ से इतना इतिहास परोसा गया है और उसे प्रचारित किया गया है कि ऐसा लगता है कि यह हिस्सा चीन का ही है। हालांकि चीन के अलावा, अन्य दावेदार देशों ने भी कमोबेश यही काम किया है। विश्व समुदाय में यह धारणा भी बनी है कि चीन संप्रभुता के मामले में एक अधिक संजीदा राष्ट्र है। इसका एक उदाहरण हांगकांग मामले में भी सामने आता है। वाशिंगटन के बयान पर चीन ने यह आपत्ति जताई थी कि यह उसका अंदरूनी मामला है। ऐसे समय में, जब एशिया की भू-राजनीति बदल रही है (अमेरिका का जोर एशिया पिवट पर है और जापान अपनी रक्षा नीति में बदलाव ला रहा है), तब चीन इसी धारणा का इस्तेमाल अपने पक्ष में करना चाहेगा।

इन सबके अलावा, दक्षिण चीन सागर के मसले पर ऊर्जा-स्रोत भी एक मुद्दा है। लेकिन यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं कि इसे ध्यान में रखकर चीन कोई विवाद उठाए। इस क्षेत्र से तेल निकाला जाए, इसी में सबकी भलाई है। दुनिया को आज अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत है और चीन यही चाहेगा कि इस काम में वह अन्य देशों का लाभ उठाए। होर्मुज से मलक्का की सी लेन स्ट्रैटजी चीन की देन है। तेल दोहन को लेकर इस क्षेत्र में चीन कई संधियां कर चुका है, जिसमें साझा अन्वेषण पर जोर है।

प्रश्न यह है कि फिर चीन के साथ भारत के विवाद क्या हैं? सीमा विवाद तो है ही। लेकिन जाहिर है कि तेल खनन को लेकर वियतनाम के साथ भारत के हुए ताजा समझौते इसकी जड़ में नहीं हैं। वियतनाम ने जो पिछला कॉन्ट्रैक्ट हमें दिया था, उससे कोई फायदा नहीं हुआ। यह साफ है कि दक्षिण चीन सागर में भारत की भी दिलचस्पी है, क्योंकि वह वहां अपनी मौजूदगी दिखाना और किसी एक शक्ति का दबदबा बनने से रोकना चाहता है। फिर उसे तेल की जरूरत है ही। इस बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे पर गए थे। उससे पहले वह जापान दौरे पर गए थे। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो जापान एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्था। हालांकि, चीन के मुकाबले भारत कम बड़ी शक्ति है, लेकिन प्रधानमंत्री के ताजा दौरे से चीन पर किसी तरह का दबाव बना हो, तो उस बारे में विशेष कुछ कहा नहीं जा सकता।

इसलिए चीन की ताजा प्रतिक्रिया को उसके स्वाभाविक रवैये से अधिक जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए और यह भी समझना होगा कि दक्षिण चीन सागर दरअसल एक विवादित क्षेत्र है, जहां अब तक कूटनीतिक समझ नहीं बन पाई है। इसलिए समय-समय पर इसे लेकर वातावरण में गरमी पैदा हो जाती हैं।

इबोला संक्रमण की कार्यप्रणाली

इबोला संक्रमण की कार्यप्रणाली
RAS MAINS PAPER 2
यहाँ से प्रश्न बन सकता है
इबोला को WHO एड्स के बाद दूसरी बड़ी चुनौती घोषित कर चूका है ।

पश्चिम अफ़्रीकी देशों गिनी, सियेरा लियोन और नाइजीरिया में इबोला वायरस के संक्रमण के अब तक क़रीब 930 लोगों की मौत हो चुकी है. लाइबेरिया ने इस बीमारी के चलते आपातकाल घोषित कर दिया है.
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इबोला एक क़िस्म की वायरल बीमारी है. इसके लक्षण हैं अचानक बुख़ार, कमज़ोरी, मांसपेशियों में दर्द और गले में ख़राश.
ये लक्षण बीमारी की शुरुआत भर होते हैं. इसका अगला चरण है उल्टी होना, डायरिया और कुछ मामलों में अंदरूनी और बाहरी रक्तस्राव.
मनुष्यों में इसका संक्रमण संक्रमित जानवरों, जैसे, चिंपैंजी, चमगादड़ और हिरण आदि के सीधे संपर्क में आने से होता है.
संक्रमण

एक दूसरे के बीच इसका संक्रमण संक्रमित रक्त, द्रव या अंगों के मार्फ़त होता है. यहां तक कि इबोला के शिकार व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी ख़तरे से ख़ाली नहीं होता. शव को छूने से भी इसका संक्रमण हो सकता है.
बिना सावधानी के इलाज करने वाले चिकित्सकों को भी इससे संक्रमित होने का भारी ख़तरा रहता है.
संक्रमण के चरम तक पहुंचने में दो दिन से लेकर तीन सप्ताह तक का वक़्त लग सकता है और इसकी पहचान और भी मुश्किल है.
इससे संक्रमित व्यक्ति के ठीक हो जाने के सात सप्ताह तक संक्रमण का ख़तरा बना रहता है.
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़, उष्णकटिबंधीय बरसाती जंगलों वाले मध्य और पश्चिम अफ़्रीका के दूरदराज़ गांवों में यह बीमारी फैली. पूर्वी अफ़्रीका की ओर कांगो, युगांडा और सूडान में भी इसका प्रसार हो रहा है.

Photo: इबोला संक्रमण की कार्यप्रणाली
RAS MAINS PAPER 2 
यहाँ से प्रश्न बन सकता है
इबोला को WHO एड्स के बाद दूसरी बड़ी चुनौती घोषित कर चूका है ।

पश्चिम अफ़्रीकी देशों गिनी, सियेरा लियोन और नाइजीरिया में इबोला वायरस के संक्रमण के अब तक क़रीब 930 लोगों की मौत हो चुकी है. लाइबेरिया ने इस बीमारी के चलते आपातकाल घोषित कर दिया है.
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इबोला एक क़िस्म की वायरल बीमारी है. इसके लक्षण हैं अचानक बुख़ार, कमज़ोरी, मांसपेशियों में दर्द और गले में ख़राश.
ये लक्षण बीमारी की शुरुआत भर होते हैं. इसका अगला चरण है उल्टी होना, डायरिया और कुछ मामलों में अंदरूनी और बाहरी रक्तस्राव.
मनुष्यों में इसका संक्रमण संक्रमित जानवरों, जैसे, चिंपैंजी, चमगादड़ और हिरण आदि के सीधे संपर्क में आने से होता है.
संक्रमण

एक दूसरे के बीच इसका संक्रमण संक्रमित रक्त, द्रव या अंगों के मार्फ़त होता है. यहां तक कि इबोला के शिकार व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी ख़तरे से ख़ाली नहीं होता. शव को छूने से भी इसका संक्रमण हो सकता है.
बिना सावधानी के इलाज करने वाले चिकित्सकों को भी इससे संक्रमित होने का भारी ख़तरा रहता है.
संक्रमण के चरम तक पहुंचने में दो दिन से लेकर तीन सप्ताह तक का वक़्त लग सकता है और इसकी पहचान और भी मुश्किल है.
इससे संक्रमित व्यक्ति के ठीक हो जाने के सात सप्ताह तक संक्रमण का ख़तरा बना रहता है.
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़, उष्णकटिबंधीय बरसाती जंगलों वाले मध्य और पश्चिम अफ़्रीका के दूरदराज़ गांवों में यह बीमारी फैली. पूर्वी अफ़्रीका की ओर कांगो, युगांडा और सूडान में भी इसका प्रसार हो रहा है.

अफगानिस्तान में भारतीय राजनय की परीक्षा

अफगानिस्तान में भारतीय राजनय की परीक्षा 

लंबी राजनीतिक अस्थिरता के बाद पिछले दिनों अफगानिस्तान में अशरफ गनी ने सत्ता तो संभाल ली लेकिन वह देश को स्वतंत्रतापूर्वक संचालित नहीं कर पाएंगे, इसलिए उनकी राह बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण होगी.
उन्हें सत्ता की साझेदारी अपने प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला के साथ करनी है.
चूंकि दुनिया में सत्ता-साझेदारी का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है, इसलिए इस आशंका से इनकार नहीं कि अफगानिस्तान की कमजोर केंद्रीय व्यवस्था का फायदा तालिबान व पाकिस्तान उठाएंगे. सवाल है कि क्या इससे भारत के लिए प्रतिकूल स्थिति निर्मित नहीं होगी? ऐसे में भारतीय राजनय को किस प्रकार के कदम उठाने की जरूरत होगी?
अफगानिस्तान में दूसरे दौर के चुनाव के बाद भी दोनों में से कोई अपने प्रतिद्वंद्वी को विजेता नहीं मान रहा था. इससे राजनीतिक प्रक्रिया के धराशायी होने का खतरा उत्पन्न हो गया था. ऐसे में दोनों के बीच समझौता करा ‘राष्ट्रीय एकता सरकार’ बनाने का रास्ता बचा था. फिर भी तब तक सरकार नहीं बनी जब तक अमेरिका की तरफ से धमकी नहीं दी गई कि अगर राजनीतिक गतिरोध खत्म नहीं हुआ तो आर्थिक मदद नहीं मिलेगी.
मतलब समझौता अफगानिस्तान को शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि मजबूरी में हुआ है. ऐसे में नई सरकार से अफगानिस्तान के शांतिपूर्ण विकास की राह बनती नहीं दिखती, बल्कि दोनों एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धा में देश को पीछे ले जाने की कोशिश में दिखेंगे. इससे राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ेगी, केंद्रीय व्यवस्था कमजोर होगी, प्रशासनिक ढांचा कमजोर होगा और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा. ये स्थितियां अफगानिस्तान में असुरक्षा के हालात पैदा कर सकती हैं. लेकिन भारत के लिए एक सुरक्षित, शांतिपूर्ण और प्रगतिशील अफगानिस्तान की जरूरत है.
दरअसल, अफगानिस्तान इस समय संक्रमण के दौर से से गुजर रहा है. लोकतांत्रिक सत्ता के हस्तांतरण के बावजूद स्थिति बहुत स्पष्ट नजर नहीं आ रही है. हालांकि राष्ट्रपति अशरफ गनी ने बहुप्रतीक्षित सुरक्षा समझौते को मंजूरी दे दी है जिससे साल के आखिर में नाटो सेना की वापसी के बाद भी अमेरिकी सैनिकों को देश में रुकने की अनुमति होगी.
इस समझौते के तहत 2014 के बाद 12 हजार विदेशी सैन्य कर्मियों के रुकने की उम्मीद है जो अफगान सुरक्षाबलों को प्रशिक्षित करने और तालिबान के खिलाफ लड़ाई में सहयोग करेंगे. सवाल है कि 2001 से लेकर 2014 तक अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना के रहते अफगानिस्तान की सही अथरे में सुरक्षा नहीं हो पाई, तो 12 हजार अमेरिकी सैनिक क्या कर पाएंगे? इसे देखते हुए ही पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने भारत से सैन्य मदद की इच्छा जताई थी.
वैसे अफगानिस्तान के संक्रमण काल और पुनर्निर्माण के बीच उभरती चुनौतियों को लेकर भारत भी चिंतित है और उसकी मदद करना चाहता है. अफगानिस्तान के सुरक्षित भविष्य को लेकर भारत ने पिछले एक दशक के भीतर अपना काफी कुछ दांव पर लगाया है. यही कारण है यूपीए सरकार के समय भारत ने करजई की मांग की पुष्टि किए बिना ही अफगानिस्तान की सुरक्षा में मदद का आश्वासन दे दिया था. भारत की नई सरकार भी अफगानिस्तान के साथ खड़े होने तथा समुचित जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार है.
पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को मजबूत बनाने संबंधी रणनीति के तहत पिछले दिनों विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की यात्रा के दौरान आश्वासन दिया गया था कि भारत अफगानिस्तान को स्थिरता व सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी मदद देगा.
इन संबंधों को नई दिशा देने और निर्णायक स्थिति तक ले जाने में भारत को ध्यान रखना होगा कि अफगानिस्तान से अमेरिकी अगुवाई वाली करीब सवा लाख सैन्यकर्मियों की फौज इस वर्ष हट जाएगी और उसके बाद यहां तालिबान और अल कायदा से जुड़े तत्वों के फिर सिर उठाने का खतरा बढ़ेगा. यह खतरा अफगानिस्तान ही नहीं बल्कि संपूर्ण दक्षिण एशिया के समक्ष संकट पैदा करेगा. जिस तरह इराक और सीरिया आधारित आतंकवादी समूह आईएसआईएस का इन संगठनों से जुड़ाव बढ़ रहा है और अल कायदा ने दक्षिण एशिया में पांव पसारने का संकेत दिया है, उससे लगता है कि इस क्षेत्र में भारत के भी हित सुरक्षित नहीं रह गए हैं.
दूसरी तरफ पाक प्रायोजित आतंकवाद को पाकिस्तानी सेना जिस तरह ताकत दे रही है, उससे लगता है पाकिस्तान एक बार पुन: अफगानिस्तान को अपनी महत्वाकांक्षा का मैदान बनाने का प्रयास करेगा. चूंकि आईएसआईएस-अल कायदा पुनर्सयोजन की प्रक्रिया चल रही है, इसलिए संभव है कि दक्षिण एशिया में इसका प्रभाव तेजी से बढ़े. तीसरा पक्ष यह भी है कि पाकिस्तानी सेना और आईएसआई इस पुनर्सयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए और फिर इसका प्रयोग भारत के खिलाफ करने का प्रयास करे. ऐसे में भारत को प्रगतिशील अफगानिस्तान के निर्माण में विशेष भूमिका निभानी होगी.
गौरतलब है, भारत अफगानिस्तान को केवल सुरक्षा के लिए ही मदद नहीं दे रहा है बल्कि आधारभूत मदद भी उपलब्ध करा रहा है जिससे अफगानिस्तान की ‘रूट डायनॉमिक्स’ बदल सकती है. उल्लेखनीय है कि भारत ने कंधार में देश के पहले ‘अफगान नेशनल एग्रीकल्चरल साइंस एंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी’ की स्थापना की है. भारत ने वहां दो अरब डालर से भी ज्यादा के निवेश किए हैं जिसके तहत वहां न केवल 220 किमी लंबी सड़क बनाई है बल्कि बिजली ट्रांसमिशन लाइन और सलमा बांध भी बनाया है. इसके अतिरिक्त भारत ने अफगानिस्तान संसद भवन का निर्माण भी किया है.
बहरहाल, अफगानिस्तान में भारत ने अब तक जिस राजनय का परिचय दिया है, उसमें भावनात्मक व मानवीय पक्ष को अधिक तरजीह दी गई है. ये कदम भारतीय राजनय का आदर्शात्मक पक्ष व्यक्त करते हैं. लेकिन ये पक्ष अफगानिस्तान के आर्थिक विकास में सीधा योगदान नहीं देते. वहां रोजगार में सीधी वृद्धि नहीं करते, वहां के प्रौद्योगिकी विकास को नहीं बढ़ाते या दूसरे शब्दों में कहें तो अफगानों की स्वामीभक्ति को भारत के पक्ष में करने का प्रत्यक्ष प्रयास नहीं करते, जबकि चीनी मदद इसके ठीक विपरीत प्रकृति वाली रही है.
हालांकि अब भारत ने अफगान नेशनल आर्मी (एएनए) की मजबूती के लिए हथियारों और साजो-सामान के बदले रूस को पैसे का भुगतान करने का निर्णय कर लिया है. ऐसे में भारत पर आरोप तो लगेगा कि वह एशिया में तनाव बढ़ाने वाला कदम उठा रहा है, लेकिन पाकिस्तानी ताकत को काउंटर करने और उसके कुटिल इरादों पर नियंत्रण के लिए यह कदम जरूरी होगा. फिलहाल अफगानिस्तान की नई सरकार को आंतरिक संघर्ष से पार पाना है ताकि तालिबान, आईएस-अलकायदा और आईएसआई उसका फायदा न उठा सकें. भारत को इसे लेकर सावधान रहने की जरूरत होगी.

काला धन क्या है पूरा मामला पुष्प रंजन का लेख

काला धन क्या है पूरा मामला
पुष्प रंजन का लेख

काले धन के साथ कई सारी त्रासद कथाएं जुड़ चुकी हैं। जर्मनी और फ्रांस दो ऐसे देश हैं, जिनके पास इसका जवाब नहीं कि उन्हें इसका लाइसेंस कैसे मिल गया कि काले धन से संबंधित चोरी की सीडी खऱीदें, और फि र उसे दुनिया की सरकारों को बेचें। अपने यहां अब तक किसी दल ने यह सवाल नहीं उठाया है कि क्या भारत सरकार चोरी का माल खऱीदने के लिए अधिकृत है? आधा सच बोलने वाले वित्त मंत्री अरूण जेटली, संप्रग के दौर के मंत्री के काले खाते की बात कर रहे हैं, लेकिन एनडीए के शासन में विदेश में कितना काला धन गया, यह सवाल वेताल की तरह डाल पर लटका हुआ है। 'ब्लैक मनी बमÓ में आधी-अधूरी सूचनाओं की रस्सी काफी लंबी लपेटी जा चुकी है।
बस्तर जि़ले के जगदलपुर का क्षेत्रफ ल 60 वर्गमील है। ठीक इसी के बराबर ऑस्ट्रिया और स्विट्जऱलैंड के बीच बसा एक देश है, लिश्टेन्स्टाइन। लिश्टेन्सटाइन को लेकर अपने यहां भ्रांति है कि यह देश स्विट्जऱलैंड, या जर्मनी का हिस्सा है। वैटिकन सिटी और मोनाको के बाद मुझे तीसरा ऐसा मुल्क मिला था, जहां एक दिन में पूरे देश की परिक्रमा की जा सकती है। दुनिया में ऐसे सत्रह देश हैं, जिनके क्षेत्रफल दो सौ वर्गमील से कम हैं। क्षेत्रफल में छोटे देशों की एक जैसी विशेषता यह है कि उनके यहां बैंकों का ज़बरदस्त कारोबार है, और काले धन खपाने के कारण ये 'टैक्स हीबेनÓ के नाम से कुख्यात हैं। लिश्टेन्स्टाइन का राज परिवार दुनिया के छठे सबसे अमीर शाही घराने में शुमार होता है। यहां की जनता का जीवन स्तर शानदार है। इसी लिश्टेन्स्टाइन के शासनाध्यक्ष प्रिंस एलोइस ने जर्मन सरकार पर चोरी का आरोप लगाया था।
लिश्टेन्स्टाइन के एलजीटी बैंक से एक सीडी की चोरी 2002 में हुई। बैंक की शिकायत पर हेनरिश कीबर नामक कर्मी, 2003 में पकड़ा गया। कीबर जमानत पर छूटा, और जर्मनी के बोखम नामक शहर में भूमिगत हो गया। 2006 में जर्मन खुफि या 'बीएनडीÓ ने ने उस सीडी के बदले कीबर को 42 लाख यूरो का पेमेंट किया था। इस सीडी में कोई 1400 लोगों के 'अकाउंट डिटेल्सÓ थे, जिनमें जर्मनों की संख्या 600 के आसपास थी। इस सीडी को भारत, ब्रिटेन, अमेरिका और बाक़ी देशों को बेचने के लिए जर्मनी 2007 में सक्रिय हुआ। 24 फ रवरी 2008 को ब्रिटेन ने 100 लोगों के बैंक डाटा पाने के लिए एक लाख पौंड जर्मनी को दिये। इस सीडी के लिए अमेरिका, आस्ट्रेलिया, फ ्रांस समेत यूरोप के दसियों देशों ने जर्मनी को करोड़ों यूरो दिये।
लिश्टेन्स्टाइन के प्रिंस एलोइस 14 से 20 नवंबर 2010 को भारत आये, उन्होंने यहां कृषि बीज व्यापार को विस्तार देने के अलावा सरकार से बैंक से संबंधित सूचनाओं को साझा करने पर सहमति दी। 28 मार्च 2013 को लिश्टेन्स्टाइन और भारत के बीच 'कराधान सूचना आदान-प्रदान समझौताÓ (टीआईइए) स्विट्जऱलैंड की राजधानी बर्न में हुआ। प्रिंस एलोइस एक बार फिर अक्टूबर 2013 में भारत आये। मुख्य विषय काले धन से संबंधित सूचनाएं थीं, जिन्हें सार्वजनिक न करना मनमोहन सरकार की मज़बूरी थी।
डाटा चोरी की खऱीद-बिक्री फ ्रांस ने भी की। 2007 में 'एचएसबीसी' बैंक की जिनेवा शाखा में हर्वे फेल्सियानी नामक एक सिस्टम इंजीनियर के बारे में पता चला वह ग़ायब है। फेल्सियानी पांच सीडी के साथ स्पेन में भूमिगत था, और वहीं से यूरोप, इजऱाइल की सरकारों से बैंक डाटा बेचने के लिए संपर्क साध रहा था। फेल्सियानी को मोसाद के जासूसों ने अगवा करने की कोशिश की थी। जेम्स बांड की फि ल्मों की तरह फेल्सियानी का भागना-छिपना जारी रहा। अंतत: जनवरी 2009 में हर्वे फेल्सियानी फ्रांसीसी खुफिया 'डीसीआरआईÓ के हत्थे चढ़ा। फ्रांस ने तीन चरणों की सुरक्षा देते हुए, उसे ऐसे ठिकाने पर भूमिगत कर दिया, जहां उस तक पहुंचना सबके लिए आसान नहीं था। इसके बाद शुरू हुआ सूचनाओं का सौदा। हर्वे फेल्सियानी की उन पांच सीडी में लगभग एक लाख तीस हज़ार खातेदारों का ब्योरा था, जिसे पाने के लिए दुनिया भर की सरकारें, उनकी खुफि या एजेंसियां सक्रिय हो गईं थीं। भारत को काले धन के बारे में दो अलग-अलग सूचनाओं के लिए जर्मनी और फ्र ांस की सरकारों को कितने करोड़ यूरो देने पड़े, इसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। संभव है बैंक सीडी की दलाली में कई लोगों ने अपने हाथ साफ किए हों।
ख़ैर, भारत और लिश्टेन्सटाइन के टैक्स इंफॉर्मेशन एक्सचेंज एग्रीमेंट(टीआईइए) में स्पष्ट लिखा गया है कि जांच और नाम की गोपनीयता बनी रहनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के हवाले से जिन 18 खातेदारों के नामों का खुलासा किया गया, उन सभी के अकाउंट्स लिश्टेंस्टाइन के एलजीटी बैंक में हैं, जिनमें से एक की मौत हो चुकी है। इन 18 खातेदारों के नामों को देखकर लगता है कि उनमें से अधिकांश लोगों के संबंध गुजरात से हैं, और ट्रस्ट चलाते हैं। सीबीआई, अपने बयान पर कायम रही कि स्विट्जऱलैंड के बैंकों में भारतीयों के 500 अरब डॉलर (लगभग 24.5 लाख करोड़ रुपये) काला धन जमा है। लेकिन स्विस नेशनल बैंक के अधिकारी बताते हैं कि भारतीयों के मात्र 14 हज़ार करोड रुपये ़(2.03 अरब स्विस फ ्रांक) स्विस बैंकों में जमा हैं। इस पर भरोसा न करने का कोई कारण नहीं नजऱ आता। क्या साढ़े चौबीस लाख करोड,़ और चौदह हज़ार करोड़ रुपये के बीच कोई मेल है? तो क्या सीबीआई, आयकर और रेवेन्यू इंटेलीजेंस के अधिकारी आल्प्स की वादियों में अल्पाइन के पत्ते गिनने जाते थे? यूरोप वाले इस पर हंसते हैं कि काले धन को लेकर भारतीय मीडिया में इतना भौकाल पैदा किया गया कि हर ओर भ्रम का वातावरण है। संपूर्ण सच नहीं बोलने वाले वित्त मंत्री अरूण जेटली पर कैसे भरोसा करें कि वह काले धन पर राजनीति नहीं कर रहे हैं? पूरा सच यह है कि एनडीए के राज में काला धन लिश्टेन्सटाइन और स्विट्जऱलैंड के बैंकों में ही नहीं, मारिशस से लेकर मोनाको तक, दुनिया के तमाम 'टैक्स हेवनÓ में गया । तय मानिये कि काले धन के सभी 800 खातेदारों के नाम उछलते ही देश की राजनीति में एक बड़ा तूफ ान खड़ा होगा। राजनीतिक दल एक-दूसरे के कपड़े फाड़ेंगे, और उन्हें चंदा देने वाले अदृश्य हाथ धमकाएंगे। प्रश्न यह है कि यदि किसी भारतीय ने अपने पूरे ब्योरे के साथ स्विस बैंकों में खाता खोला हुआ है, और भारत सरकार को कर अदा नहीं किया है, तो क्या उस धन को जब्त कर भारत लाया जा सकता है?
इस समय दुनिया भर में 70 से अधिक देश हैं, जो काले धन जमा करते हैं, जिन्हें 'टैक्स हेवनÓ कहा जाता है। इन्हें स्विट्जऱलैंड के उस अध्यादेश से प्रेरणा मिली थी, जिसके आधार पर ब्लैक मनी जमा करने वाले 20 प्रतिशत तक कर देकर, अपना काला धन सफेद कर सकते थे। स्विट्जऱलैंड ने प्रस्ताव भेजा था कि जर्मनी 50 अरब यूरो, और ब्रिटेन सात अरब पौंड लेकर काले धन को सफेद करने की अनुमति अपने नागरिकों को दे दे। स्विस बैंक 'यूबीएसÓ ने 52 हज़ार अमेरिकियों के काले धन को सफेद करने के लिए 78 अरब डॉलर देना स्वीकार कर लिया है। काले धन को सफेद करने की इस कार्रवाई को 'रूबिक डीलÓ कहा गया है। मोदी सरकार पर भारतीय उद्योग जगत का दबाव है कि काले धन की वापसी से बेहतर है कि स्विस बैंकों के भारतीय खाताधारकों पर जुर्माना लगाया जाए। जब अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी की ताकतवर सरकारें 'रूबिक डीलÓ के लिए राजी हैं, तो भारत के आगे क्या विकल्प हो सकता है?
भारत सरकार काले धन वालों को पकडऩे के लिए डबल टैक्सेशन एव्याएड एग्रीमेंट (डीटीएए) को भी एक कारगर हथियार मानती है। 88 देशों से भारत सरकार ने 'डीटीएएÓ समझौते किये हैं, जिनमें से एक स्विट्जऱलैंड भी है। 'डीटीएएÓ समझौते के तहत यदि किसी स्विस नागरिक का शेयर भारत की कंपनियों को ट्रांसफर होता है, तो उससे होने वाले पूंजी लाभ (कैपिटल गेन) पर भारत सरकार कर लगा सकती है। यही कराधान व्यवस्था स्विट्जऱलैंड में भारतीय निवेशकों के साथ लागू होती । ऐसे में क्या स्विट्जऱलैंड इसकी अनुमति देगा कि भारतीय खाताधारकों के पैसे भारत सरकार सरकार वापिस ले ले? यदि ऐसा हुआ तो स्विस बैंकिंग व्यवस्था बर्बाद हो जाएगी, और पूरी दुनिया के खातेदारों का उस पर से भरोसा उठ जाएगा। 'डीटीएएÓ में यह भी संकल्प किया गया है कि खाताधारकों के नाम सार्वजनिक नहीं किये जाएंगे। इसके बरक्स वित्तमंत्री अरूण जेटली यह बयान देते हैं कि अदालत में नाम जाते ही यह सार्वजनिक हो जाएगा। क्या यह 'डीटीएएÓ समझौते के विरूद्ध नहीं है? राजनीति की बदनाम गली में आठ सौ काले धनपतियों के नाम अवश्य गूंजेंगे, पर देश में काला धन आ जाएगा, ऐसा शायद ही संभव है!