मैक इन इंडिया : एक मुल्यांकन
IAS तथा RAS परीक्षा हेतु
अ )क्या है मैक इन इंडिया
ब )आवश्यकता क्यों
स ) प्रमुख बिंदु
द ) लाभ
य )चीन से भिन्नता
र ) बाधाएँ
व ) निष्कर्ष
अ )क्या है मैक इन इंडिया
यह भारत को विनिर्माण में अग्रणी बनाने का एक संकल्प है।इस प्रोग्राम की शुरुवात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में की गयी। इस अवसर पर
30 देशों के उद्योगपतियों ने भाग लिया।
ब )आवश्यकता क्यों
वैश्विक विनिर्माण में भारत की भगीदारी मात्र 2.1 %है जबकि चीन की 22.4% ।इसलिए इस और ध्यान दिया जाना चाहिए।
भारत के GDP में विनिर्माण का हिस्सा मात्र 15% है जबकि चीन काजहाँ 33 % वहीँ इंडोनेशिया ,पाकिस्तान, बांग्लादेश सरीके मुल्क भी हमसे आगे है जिनका योगदान क्रमश: 26%,19% एवं 19% है।
(स्रोत -UNO की वेबसाइट )
तथ्यों से जाहिर है कि इस सेक्टर को अभी तक उपेक्षित ही माना गया है।
स ) प्रमुख बिंदु
इसका लोगो दहाड़ता हुवा शेर है।
अब उधोग हेतु लाइसेंस पाना आसान होगा।
सरकार भारत में निवेशकों की सुगमता के लिए सभी प्रयास करेगी। इसमें व्यावसायिक इकाइयों की पूछताछ आदि का 72 घंटे में जवाब देने के लिए एक प्रकोष्ठ का गठन भी शामिल है। यह सभी नियामकीय प्रक्रियाओं की निगरानी भी करेगा और उन्हें सरल बनाएगा। इसके साथ अनुपालन के बोझ को भी कम किया जाएगा।
एक आधिकारिक बयान में कहा गया है, ‘सरकार एक नया रास्ता बनाने को प्रतिबद्ध है जिसमें कारोबारी इकाइयों को लाल कालीन पर स्वागत जैसा अनुभव देने का विचार है। विदेशी निवेशकों को नियामकीय व नीतिगत मुद्दों पर दिशानिर्देशन के लिए ‘भारत में निवेश’ प्रमुख संदर्भ बिंदु के रूप में काम करेगा। और उन्हें नियामकीय मंजूरियां दिलाने में मदद करेगा।’
केंद्र सरकार ने ऐसे 25 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें भारत दुनिया में अग्रणी स्थिति हासिल करने की क्षमता रखता है। इस अवसर पर एक सामान्य परिचय पुस्तिका के अलावा उपरोक्त महत्पूर्ण चिह्नित क्षेत्रों के बारे में अलग-अलग ब्रोशर भी जारी किये गए। जिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों के अलग-अलग ब्रोशर जारी किए जाएंगे उनमें वाहन, रसायन, आईटी, फार्मा, परिधान, बंदरगाह, विमानन, चमड़ा, पर्यटन एवं आतिथ्य, वेलनेस व रेलवे शामिल हैं।
विदेशी निवेशकों के भारत आगमन या प्रस्थान पर निवेशक सुविधा सेल उनकी मदद करेगा। यह मुख्य रूप से हरित व आधुनिक विनिर्माण पर केंद्रित होगा। इन कंपनियों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने में मदद की जाएगी।
यह अभियान राष्ट्रीय के अलावा राज्यस्तर व देश के बाहर मिशनों में भी पेश किया जाएगा।
यह चयनित देश में विभिन्न क्षेत्रों की शीर्ष कंपनियों को लक्ष्य करेगा।
इसके अलावा यह चुनिंदा घरेलू कंपनियों की भी पहचान करेगा जो नवोन्मेषण और नई प्रौद्योगिकी में अग्रणी हैं जिससे उन्हें वैश्विक स्तर पर चैंपियन के रूप में स्थापित किया जा सके।
द )लाभ
विनिर्माण सेक्टर से ही बेरोजगारी की समस्या को दूर किया जा सकता है।
भारत के व्यापर भुगतान के संतुलन हेतु भी विनिर्माण सेक्टर में तेजी आवश्यक है
भारत काफी मात्रा में तेल का आयात करता है लेकिन निर्यात करने हेतु मदें बहुत कम है
इससे हमारे निर्यात क्षेत्र में वॄद्धि होगी।
सर्विस सेक्टर का उपभोग केवल स्थानीय स्तर पर ही किया जा सकता है उसका निर्यात नहीं किया जा सकता। जैसे कोई धोबी केवल स्थानीय स्तर पर ही अपनी सेवा दे सकता है।
सोफ्टवेयर क्षेत्र में निर्यात संभव है लेकिन सेवा क्षेत्र में इसका योगदान मात्र 5-6% ही है।परन्तु यदि हम सामान या वस्तुएं बनायें जैसे ऑटोमोबाइल, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक, टेक्सटाइल आदि ।इनका निर्यात सम्भव है।
इससे हमें विदेशी मुद्रा भी मिलेगी।जिससे हमारा फोरेक्स रिज़र्व भी बढेगा।
इसमें किसी भी प्रकार प्रकार की सब्सिडी की बात नहीं बल्कि यह अपील है कि आप भारतीय है या विदेशी आप अपना सामान चाहे जहाँ बेचे लेकिन निर्माण भारत में ही करें।
इससे ओधोगिक कल्चर का विकास होगा।
य) चीन से भिन्नता
मैक इन इंडिया प्रोग्राम के अगले ही दिन चीन ने मेड इन चाइना प्रोग्राम की शुरुवात कर यह संकेत देने की कोशिश की विनिर्माण क्षेत्र में वह अपना दबदबा बनाये रखना चाहेगा।परन्तु दोनों में काफी हद तक असमानता है।
हमारा विनिर्माण मॉडल चीन से भिन्न होगा। चीन ने तो हर इंडस्ट्री को विशेष सब्सिडी दे कर बुला लिया
वहां सब कुछ द्विपक्षीय होता है ,नीति नहीं होती।
परन्तु हमारा उदेश्य किसी विशेष इंडस्ट्री को वरीयता देने का नहीं बल्कि सभी के लिए सामान रूप से बहेतर शासन उपलब्ध करवाना है।
चीन की तुलना में हम एक लोकतंत्र है ।यहाँ श्रमिक कानूनों का विशेष महत्व है।
र ) बाधाएँ
हमारे पास सपष्ट रणनीति और योजना का अभाव है।
पूर्व में कहा गया कि योजना आयोग को समाप्त किया जायेगा लेकिन उसकी जगह नयी सरंचना क्या होगी अभी तक अस्पष्ट है।
हमारी आर्थिक संरचना अत्यधिक जटिल है सबसे ज्यादा 50% रोजगार देने वाला सेक्टर कृषि है जिसमें मात्र 4% निवेश आ रहा है।जबकि बड़े उधोगों में 80% निवेश आ रहा है जो कि मात्र 6% लोगों को रोजगार दे रहे है।
1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण के नाम पर लघु और मध्यम उधोगों को जो संरक्षण मिलता है उसे समाप्त कर दिया गया।
यदि हम बिना भारतीय कंपनियों को विशेष सब्सिडी देते हुवे मार्केट खोल देंगे तो इससे तो नुकसान ही होगा। उदाहरण के तौर पर भारतीय कम्पनी भेल किसी भी सुरत में जर्मनी कम्पनी सिमंस का मुकाबला नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास उच्च टेक्नोलॉजी और संसाधन है।
भारत में बदनाम कठोर नौकरशाही और लाल फीताशाही इसमें महत्वपूर्ण अडंगा है।
सुशासन हेतु पर व्यापक परिवर्तनों की आवश्यकता है।
व ) निष्कर्ष
व्यपार करने की सहूलियत आर्थिक आजादी के लिए अभी वैश्विक सूचकांकों में भारत अभी काफी पीछे है इसके लिए कठोर कदम उठाने होंगे। हमारा सर्विस सेक्टर उतना रोजगार निर्माण नहीं कर सकता जो कि विनिर्माण क्षेत्र द्वारा किया जा सकता है।परन्तु प्रशासनिक मशीनरी की उलझी प्रक्रियाओं से इसे निकलना होगा। छोटे उधोगों के विकास की अन्य सबसे बड़ी समस्या वित्त की कमी है इस ओर भी ध्यान देना होगा।
अंत में हमें यह नहीं भुलाना चाहिए कि "मैक इन इंडिया " प्रोगाम के उद्यघाटन अवसर पर बाटें गए
ब्रोशर पर मेड इन चाइना लिखा था
IAS तथा RAS परीक्षा हेतु
अ )क्या है मैक इन इंडिया
ब )आवश्यकता क्यों
स ) प्रमुख बिंदु
द ) लाभ
य )चीन से भिन्नता
र ) बाधाएँ
व ) निष्कर्ष
अ )क्या है मैक इन इंडिया
यह भारत को विनिर्माण में अग्रणी बनाने का एक संकल्प है।इस प्रोग्राम की शुरुवात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में की गयी। इस अवसर पर
30 देशों के उद्योगपतियों ने भाग लिया।
ब )आवश्यकता क्यों
वैश्विक विनिर्माण में भारत की भगीदारी मात्र 2.1 %है जबकि चीन की 22.4% ।इसलिए इस और ध्यान दिया जाना चाहिए।
भारत के GDP में विनिर्माण का हिस्सा मात्र 15% है जबकि चीन काजहाँ 33 % वहीँ इंडोनेशिया ,पाकिस्तान, बांग्लादेश सरीके मुल्क भी हमसे आगे है जिनका योगदान क्रमश: 26%,19% एवं 19% है।
(स्रोत -UNO की वेबसाइट )
तथ्यों से जाहिर है कि इस सेक्टर को अभी तक उपेक्षित ही माना गया है।
स ) प्रमुख बिंदु
इसका लोगो दहाड़ता हुवा शेर है।
अब उधोग हेतु लाइसेंस पाना आसान होगा।
सरकार भारत में निवेशकों की सुगमता के लिए सभी प्रयास करेगी। इसमें व्यावसायिक इकाइयों की पूछताछ आदि का 72 घंटे में जवाब देने के लिए एक प्रकोष्ठ का गठन भी शामिल है। यह सभी नियामकीय प्रक्रियाओं की निगरानी भी करेगा और उन्हें सरल बनाएगा। इसके साथ अनुपालन के बोझ को भी कम किया जाएगा।
एक आधिकारिक बयान में कहा गया है, ‘सरकार एक नया रास्ता बनाने को प्रतिबद्ध है जिसमें कारोबारी इकाइयों को लाल कालीन पर स्वागत जैसा अनुभव देने का विचार है। विदेशी निवेशकों को नियामकीय व नीतिगत मुद्दों पर दिशानिर्देशन के लिए ‘भारत में निवेश’ प्रमुख संदर्भ बिंदु के रूप में काम करेगा। और उन्हें नियामकीय मंजूरियां दिलाने में मदद करेगा।’
केंद्र सरकार ने ऐसे 25 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें भारत दुनिया में अग्रणी स्थिति हासिल करने की क्षमता रखता है। इस अवसर पर एक सामान्य परिचय पुस्तिका के अलावा उपरोक्त महत्पूर्ण चिह्नित क्षेत्रों के बारे में अलग-अलग ब्रोशर भी जारी किये गए। जिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों के अलग-अलग ब्रोशर जारी किए जाएंगे उनमें वाहन, रसायन, आईटी, फार्मा, परिधान, बंदरगाह, विमानन, चमड़ा, पर्यटन एवं आतिथ्य, वेलनेस व रेलवे शामिल हैं।
विदेशी निवेशकों के भारत आगमन या प्रस्थान पर निवेशक सुविधा सेल उनकी मदद करेगा। यह मुख्य रूप से हरित व आधुनिक विनिर्माण पर केंद्रित होगा। इन कंपनियों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने में मदद की जाएगी।
यह अभियान राष्ट्रीय के अलावा राज्यस्तर व देश के बाहर मिशनों में भी पेश किया जाएगा।
यह चयनित देश में विभिन्न क्षेत्रों की शीर्ष कंपनियों को लक्ष्य करेगा।
इसके अलावा यह चुनिंदा घरेलू कंपनियों की भी पहचान करेगा जो नवोन्मेषण और नई प्रौद्योगिकी में अग्रणी हैं जिससे उन्हें वैश्विक स्तर पर चैंपियन के रूप में स्थापित किया जा सके।
द )लाभ
विनिर्माण सेक्टर से ही बेरोजगारी की समस्या को दूर किया जा सकता है।
भारत के व्यापर भुगतान के संतुलन हेतु भी विनिर्माण सेक्टर में तेजी आवश्यक है
भारत काफी मात्रा में तेल का आयात करता है लेकिन निर्यात करने हेतु मदें बहुत कम है
इससे हमारे निर्यात क्षेत्र में वॄद्धि होगी।
सर्विस सेक्टर का उपभोग केवल स्थानीय स्तर पर ही किया जा सकता है उसका निर्यात नहीं किया जा सकता। जैसे कोई धोबी केवल स्थानीय स्तर पर ही अपनी सेवा दे सकता है।
सोफ्टवेयर क्षेत्र में निर्यात संभव है लेकिन सेवा क्षेत्र में इसका योगदान मात्र 5-6% ही है।परन्तु यदि हम सामान या वस्तुएं बनायें जैसे ऑटोमोबाइल, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक, टेक्सटाइल आदि ।इनका निर्यात सम्भव है।
इससे हमें विदेशी मुद्रा भी मिलेगी।जिससे हमारा फोरेक्स रिज़र्व भी बढेगा।
इसमें किसी भी प्रकार प्रकार की सब्सिडी की बात नहीं बल्कि यह अपील है कि आप भारतीय है या विदेशी आप अपना सामान चाहे जहाँ बेचे लेकिन निर्माण भारत में ही करें।
इससे ओधोगिक कल्चर का विकास होगा।
य) चीन से भिन्नता
मैक इन इंडिया प्रोग्राम के अगले ही दिन चीन ने मेड इन चाइना प्रोग्राम की शुरुवात कर यह संकेत देने की कोशिश की विनिर्माण क्षेत्र में वह अपना दबदबा बनाये रखना चाहेगा।परन्तु दोनों में काफी हद तक असमानता है।
हमारा विनिर्माण मॉडल चीन से भिन्न होगा। चीन ने तो हर इंडस्ट्री को विशेष सब्सिडी दे कर बुला लिया
वहां सब कुछ द्विपक्षीय होता है ,नीति नहीं होती।
परन्तु हमारा उदेश्य किसी विशेष इंडस्ट्री को वरीयता देने का नहीं बल्कि सभी के लिए सामान रूप से बहेतर शासन उपलब्ध करवाना है।
चीन की तुलना में हम एक लोकतंत्र है ।यहाँ श्रमिक कानूनों का विशेष महत्व है।
र ) बाधाएँ
हमारे पास सपष्ट रणनीति और योजना का अभाव है।
पूर्व में कहा गया कि योजना आयोग को समाप्त किया जायेगा लेकिन उसकी जगह नयी सरंचना क्या होगी अभी तक अस्पष्ट है।
हमारी आर्थिक संरचना अत्यधिक जटिल है सबसे ज्यादा 50% रोजगार देने वाला सेक्टर कृषि है जिसमें मात्र 4% निवेश आ रहा है।जबकि बड़े उधोगों में 80% निवेश आ रहा है जो कि मात्र 6% लोगों को रोजगार दे रहे है।
1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण के नाम पर लघु और मध्यम उधोगों को जो संरक्षण मिलता है उसे समाप्त कर दिया गया।
यदि हम बिना भारतीय कंपनियों को विशेष सब्सिडी देते हुवे मार्केट खोल देंगे तो इससे तो नुकसान ही होगा। उदाहरण के तौर पर भारतीय कम्पनी भेल किसी भी सुरत में जर्मनी कम्पनी सिमंस का मुकाबला नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास उच्च टेक्नोलॉजी और संसाधन है।
भारत में बदनाम कठोर नौकरशाही और लाल फीताशाही इसमें महत्वपूर्ण अडंगा है।
सुशासन हेतु पर व्यापक परिवर्तनों की आवश्यकता है।
व ) निष्कर्ष
व्यपार करने की सहूलियत आर्थिक आजादी के लिए अभी वैश्विक सूचकांकों में भारत अभी काफी पीछे है इसके लिए कठोर कदम उठाने होंगे। हमारा सर्विस सेक्टर उतना रोजगार निर्माण नहीं कर सकता जो कि विनिर्माण क्षेत्र द्वारा किया जा सकता है।परन्तु प्रशासनिक मशीनरी की उलझी प्रक्रियाओं से इसे निकलना होगा। छोटे उधोगों के विकास की अन्य सबसे बड़ी समस्या वित्त की कमी है इस ओर भी ध्यान देना होगा।
अंत में हमें यह नहीं भुलाना चाहिए कि "मैक इन इंडिया " प्रोगाम के उद्यघाटन अवसर पर बाटें गए
ब्रोशर पर मेड इन चाइना लिखा था
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