Showing posts with label UPSC. Show all posts
Showing posts with label UPSC. Show all posts

Sunday, 18 January 2015

UPSC POLITICAL SCIENCE QUIZ

राजनैतिक शब्दावली **
----------------------------
1. धर्म निरपेक्ष
►-जहां धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता तथा सभी धर्मों को समान रूप से देखा जाता है ।
2. लोकतंत्र
►-सरकार को सारी शक्तियां जनता से प्राप्त होती हैं । शासकों का चुनाव जनता द्वारा किया जाता है । दूसरे रूप में कह सकते हैं कि लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए है ।
3. समाजवाद
►-ऐसी व्यवस्था जिसमें उत्पादन और वितरण का स्वामित्व राज्य के नियंत्रण में रहता है ।
4. गणराज्य
►-इसका मतलब यह है कि राज्य का अध्यक्ष एक निर्वाचित व्यक्ति है जो एक निश्चित अवधि के लिए पद ग्रहण करता है ।
5. अध्यादेश
►-जब संसद का अधिवेशन नहीं चल रहा हो और किसी विशेष उद्देश्य के लिए कानून की आवश्यकता हो, तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है । इस अध्यादेश का प्रभाव संसद द्वारा निर्मित कानून जैसा ही होगा ।
6. प्रश्नकाल
►-जब संसद की कार्यवाही शुरू होती है...उसके शुरू के पहला घंटा सामान्यत: प्रश्नकाल कहलाता है ।Sankalp current affair
current affairs in hindi
http://mysankalpbankexam.blogspot.in/
7. शून्य काल
►-संसद के दोनों सदनों में प्रश्न काल के ठीक बाद के समय को शून्य काल कहा जाता है । शून्य काल का लोकसभा या राज्यसभा की प्रक्रिया तथा संचालन नियम में कोई उल्लेख नहीं है ।
8. सदन का स्थगन
►-स्थगन द्वारा सदन के कामकाज को विनिर्दिष्ट समय के लिए स्थगित कर दिया जाता है ।
9. अनुपूरक प्रश्न
►-सदन में किसी सदस्य द्वारा अध्यक्ष की अनुमति से किसी विषय पर दिए गए जवाब का स्पष्टीकरण के लिए अनुपूरक प्रश्न पूछने की अनुमति प्रदान करता है ।
10. विघटन
►-केवल लोकसभा का ही विघटन हो सकता है । इससे लोकसभा भंग हो जाती है ।
11. तारांकित प्रश्न
►-जिन सवालों का जवाब सदस्य तुरंत सदन में चाहता है उसे तारांकित प्रश्न कहा जाता है ।
12. अतारांकित प्रश्न
►-जिन प्रश्नों का उत्तर सदस्य लिखित में चाहता है, उन्हें अतारांकित प्रश्न कहा जाता है ।
13. स्थगन प्रस्ताव
►-स्थगन प्रस्ताव किसी लोक महत्व के मामले पर पेश किया जाता है । जब ये स्वीकार कर लिया जाता है तब लोक महत्व के कार्य के लिए सदन का नियमित कार्य रोक दिया जाता है । इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए न्यूनतम 50 सदस्यों की स्वीकृति जरूरी है ।
14. धन विधेयक
►-संसद में राजस्व एकत्र करने या अन्य प्रकार के धन के संबंधित विधेयक को धन विधेयक कहा जाता है । धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जाता है । धन विधेयक को पुन:विचार के लिए राष्ट्रपति लौटा नहीं सकता ।
15. विनियोग विधेयक
►-विनियोग विधेयक में भारत की संचित निधि पर भारित व्यय की पूर्ति के लिए धन तथा सरकार के खर्च के लिए अनुदान की मांग शामिल होती है । भारत में संचित निधि में से कोई भी धन विनियोग विधेयक के अधीन ही निकाला जा सकता है ।
16. अविश्वास प्रस्ताव
►-यह प्रस्ताव लोकसभा या विधानसभा में विपक्षी दलों द्वारा लाया जाता है । दरअसल ये प्रस्ताव सत्तारूढ पार्टी या गठबंधन के बहुतमत की परीक्षा होती है...। अगर ये प्रस्ताव पारित हो जाता है तो मंत्रिपरिषद् को इस्तीफा देना पड़ता है । सरकार गिर जाती है ।
17. पदेन
►-पद धारण करने के कारण ।
18. निषेधाधिकार
►-मुख्य कार्यपालिका द्वारा सोच-विचार के बाद किसी विधायी अधिनियम पर अपनी अस्वीकृति । ऐसा करने से अधिनियम कानून का रुप नहीं ले पाता ।
19. निंदा प्रस्ताव
►-सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करने के लिए संसद के किसी भी सदन में निंदा प्रस्ताव लाया जा सकता है ।
20. गुलेटिन
►-वह संसदीय प्रक्रिया जिसमें सभी मांगों को जो नियत तिथि तक नहीं निपटाई गई हो बिना चर्चा के ही मतदान के लिए रखा जाता है ।
21. काकस (Caucus)
►-किसी राजनीतिक दल अथवा गुट के प्रमुख सदस्यों की बैठक को काकस कहते हैं । इन प्रमुख सदस्यों द्वारा तय की गई नीतियों से ही पूरा दल संचालित होता है ।
22. सचेतक
►-राजनीतिक दल में अनुशासन बनाए रखने के लिए सचेतक की नियुक्ति हर दल द्वारा की जाती है ।
23. निर्वाचन मंडल
►-विशेष मतदान के मकसद से गठित निर्वाचकों का विशेष समूह । जैसे- राष्ट्रपति के चुनाव के लिए संसद या विधानसभाओं से निर्वाचित सदस्य निर्वाचक मंडल का गठन करते है ।
24. न्यायिक समीक्षा
►-विधायिका का बनाया गया कानून संविधान के मुताबिक है या नहीं, इसकी न्यापालिका जांच करती है, इसे ही न्यायिक समीक्षा कहा जाता है ।
25. प्रभुसत्ता संपन्न
►-जहां देश आंतरिक और बाह्य मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र हो और किसी बाह्य शक्ति पर निर्भर न हो ।नोट - पाठको अगर आपको इस Page की जानकारी अच्छी लगी तो इस जानकारी को Like, Comment और Share

Thursday, 6 November 2014

इराक संघर्ष तथा भारत पर प्रभाव

इराक संघर्ष तथा भारत पर प्रभाव

हाल ही में इराक में उत्पन्न हुवा संघर्ष IR तथा करंट इशू के संदर्भ में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा एवं साक्षात्कार हेतु महत्वपूर्ण मुद्दा है।
इसे निम्न प्रकार से समझ सकते है-
1.क्या है विवाद
2.ISIS क्या है 
3.अन्य पडोसी देशों का रुख
3.अमेरिका का रुख
4.भारत पर प्रभाव

1.क्या है विवाद-

इराक मूलत: शिया मुसलमानों के बाहुल्य वाला एक देश है। इस पर सदाम हुसैन के समय सुन्नियों का शासन रहा था। इराक में अमेरिकी हस्तक्षेप के पश्चात तथा सदाम हुसैन के शासन के अंत के पश्चात शिया समर्थित सरकार का गठन हुवा हैं। अमेरिकी सेना के घर वापसी के पश्चात से सुन्नियों पुन: अपना अधिकार प्राप्त करने की कोशिश में है तथा इसका ही परिणाम वर्तमान संघर्ष है।

2.ISIS क्या है--

Islamic state of iraq and syria ,यह सुन्नी मुसलमानों का एक संगठन है।जो की इराक पर पुन : सुन्नियों के अधिकार को लेकर संघर्ष कर रहा है। यह एक प्रकार से अलकायदा का ही नया सवरूप है। इसका प्रभाव इराक और सीरिया दोनों देशों में हैं।यह शरियत कानून को लागू करना चाहता है।

3.अन्य पडोसी देशों का रुख -

ईरान ,इराक तथा सीरिया शिया बाहुल्य वाले देश है। इनमें ईरान की स्थिति सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यदि ईरान भविष्य में परमाणु बम बनाने की क्षमता हासिल करता है तो उससे न केवल अमेरिका वरन आस पड़ोस के सुन्नी बाहुल्य वाले देशों को भी खतरा उत्पन्न हो जायेगा। सुन्नी बाहुल्य वाले देश एक मजबूत शिया बाहुल्य वाले देश का स्वीकार नहीं कर सकते ।यही कारण है की सऊदी अरब जैसे देश ISIS को वित्तीय रूप से मदद पहुंचा रहे है ताकि इराक, ईरान तथा सीरिया के रूप में एक मजबूत शिया बाहुल्य वाला गठजोड़ न बन जाये।

4.अमेरिका का रुख-

वर्तमान इराक संघर्ष ने अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों को अजीब दुविधा की स्थिति में डाल दिया।
ISIS को अरब देश सपोर्ट कर रहे है जो कि अमेरिका के भूतपूर्व सहयोगी रहे है।
ईरान इस मुद्दे पर अमेरिका का सहयोग करने की बात कर रहा है जो कि अमेरिका का कट्टर विरोधी रहा है।
अमेरिका ने यद्दपि दूर तक मार करने वाले अपने विमान वाहक पोत इराक की तरफ भेजे है तथा विरोधियों पर हवाई हमले की भी योजना बना सकता है। परन्तु वह अपनी थल सेना का सीधी तॊर पर प्रयोग करने में हिचकिचा रहा है।
अमेरिका का स्वार्थ उन तेल क्षेत्रों तक सीमित है जो कि विरोधियों के कब्जे में आ गए।

5.भारत पर प्रभाव-

*भारत अपनी आवश्यकता का अधिकांश तेल इराक से आयत करता। संघर्ष से तेल की कीमतें बढ जाने से भारत का आयात ऒर अधिक मंहगा हो सकता है।
*देश के चालू खाता घाटे में बढोतरी हो सकती है।
*अनेक भारतीय इराक समेत खाड़ी देश में काम करते है उन्हें रोजगार सम्बन्धी संकट का सामना करना पड़ सकता है।
*विदेशों से आने वाली राशि पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है जिससे चालू खाता घाटा बड सकता है।
*अगर भारत सुन्नियों का समर्थन करता है तो ऐसी ही स्थिति कश्मीर में दोहराई जा सकती है।
*अगर भारत अमेरिका ऒर ईरान की संभावित हमले को समर्थन करता है तो ऐसी कारवाही की मांग भारत के अशांत एरिया में भी की जा सकती है।
*इस घटना का प्रभाव देश के आन्तरिक हालत पर भी पड सकता है। भारत में शिया ऒर सुन्नी दोनों बहुतायत में है जिसमे सुन्नियों की संख्या अधिक हैं।दोंनो में संघर्ष हो सकता है जिससे देश में law and order की समस्या उत्पन्न हो सकती है तथा साम्प्रदायिक सॊहर्द भी प्रभावित हो सकता है।
*भारत के सम्बन्द अरब देशों, इराक ,ईरान एवं अमेरिका सभी से अच्छे है अत:किसी एक का समर्थन अन्य की कीमत पर नहीं किया जा सकता।
*इराक में यदि चरम पंथी बढते है तो इसका प्रभाव अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान पर पड सकता है ।एक अशांत पडोसी हमारे लिए खतरे का विषय बन सकता है।

प्रश्न – जी.एम.फसलें (जेनिटिकल मोडिफाय) पिछले समय से भारत में काफी विवाद में रही हैं। इस विषय पर एक तर्कसंगत लेख प्रस्तुत करें।

प्रश्न – जी.एम.फसलें (जेनिटिकल मोडिफाय) पिछले समय से भारत में काफी विवाद में रही हैं। इस विषय पर एक तर्कसंगत लेख प्रस्तुत करें।
उत्तर:--
मूलतः जी.एम. फसलें कृषि केे ऐसे उन्नत बीजों पर आधारित फसलें हैं, जिनमें बीजों के नैसर्गिक चरित्र को बदलकर उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ा दी जाती है। इससे कृषि का उत्पादन बढ़ता है। लेकिन दूसरी ओर जैविक सुरक्षा को आधार बनाकर इसका काफी विरोध भी हो रहा है।
देश में अभी केवल कपास के जी.एम.बीज इस्तेमाल करके खेती करने की अनुमति दी गई है। वर्तमान में 93 प्रतिशत क्षेत्र में जी.एम. तकनीक पर आधारित बी टी कॉटन की खेती हो रही है। निसंदेह रूप से इसके कारण कपास का प्रति हेक्टर उत्पादन 362 किलोग्राम से बढ़कर 510 किलोग्राम हो गया है।
वर्तमान में विवाद के केन्द्र में बी टी बैंगन की खेती है। उच्च न्यायालय के द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति ने अगले दस वर्षों के लिए जी.एम. फसलों के परीक्षण पर रोक लगाने की सिफारिश की थी। चूँकि कोर्ट ने इस पर कोई निर्देश नहीं दिया, इसलिए जहाँ कुछ राज्यों ने अपने यहाँ इसके फील्ड ट्रायल पर रोक लगा दी है, वहीं महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने इसकी अनुमति दे दी है।

विरोध के कारण :--------

वस्तुतः जी.एम. फसलों के प्रश्न पर कृषि वैज्ञानिक भी बट गए हैं। बी.टी. बैंगन के मुद्दे पर यह तथ्य सामने आया है कि बैंगन की कुछ प्रिय किस्म के जीन में बिना अनुमति के बदलाव किया गया।

इस बिन्दु पर भी जी.एम. फसलों का विरोध हो रहा है कि इन फसलों केे विकास में अमेरीका तथा अन्य देशों की बड़ी कम्पनियाँ अनुसंधान कर रही हैं। इसके कारण आशंका जताई जा रही है कि इन फसलों को अपनाने से देश की पूरी कृषि कुछ कम्पनियों के अधीन चली जाएगी। इससे देश की खाद्य सुरक्षा परतंत्र हो जाएगी।
वर्तमान में भारतीय कृषि क्षेत्र बीजों के मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र है। लेकिन जी.एम. फसलों की खेती में हर बारकम्पनियों से ही बीज खरीदने की मजबूरी होती है, क्योंकि खेतों की फसल बीजों की रूप में काम नहीं आती है।
विरोध के पीछे तर्क यह भी है कि इससे हमारे देश के फसलों की जैव विविधता नष्ट हो जाएगी। उत्पादित फसलों का स्वाद भी परिवर्तित हो जाएगा।
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि जी.एम. फसल स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त नहीं होती।
इससे नई तरह के कीटाणुओं के जन्म लेने की आशंका होती है, जिनका पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
इससे हमारी पारम्परिक बीजों की प्रणाली खत्म हो जाएगी।
चूँकि इस तकनीकी में विदेशी कम्पनियां लगी हुई हैं, इसलिए देश की वैज्ञानिक प्रतिभा को विकसित होने का अवसर नहीं मिलेगा।
समर्थन के कारण:-----

इसके विपरीत जी.एम.फसलों की वकालत करने वाला भी एक बड़ा वर्ग है, जिसमें वैज्ञानिक, कुछ कृषक संगठन तथा सरकारी तंत्र के लोग भी शामिल हैं।
इनका सबसे बड़ा तर्क यह है कि देश में बढ़ती हुई आबादी की खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करने के लिए जी.एम. फसलों को अपनाना ही एकमात्र विकल्प है।
कृषि क्षेत्र के विकास को तेज करके ही किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सकता है और ऐसा जी.एम. फसलों के माध्यम से ही सम्भव है।
इसके समर्थकों का यह भी मानना है कि चूंकि इन फसलों में कीटनाशक दवाइयों का कम इस्तेमाल होता है इसलिए खेती की लागत कम होगी।
साथ ही इन कीटनाशकों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान से भी बचाया जा सकेगा।
जी.एम. तकनीक ऐसे फसलों को तैयार करती है जिसमें बदलती हुई जलवायु का विशेष दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। इन फसलों पर बीमारियां भी कम लगती हैं। ऐसी फसलों का भी विकास किया जा सकता है, जो सूखे और बाढ़ के प्रभाव से सुरक्षित रहे।
ऐसी स्थिति में जी.एम. फसलें एक ऐसे देश के लिए वरदान सिद्ध हो सकती हैं, जिस देश की लगभग 55 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर हो।
निष्कर्ष :----
दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं और दोनों के तर्क अपनी-अपनी जगह पर सही होने के बावजूद उनकी कुछ सीमाएं भी हैं। यह तो निश्चित है कि बढ़ती हुई आबादी की खाद्यान्न आवश्यकताओं की अनदेखी किसी भी कीमत पर नहीं की जा सकती। कृषि योग्य भूमि का रकबा बढ़ाया नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक्र-कृषि ही एकमात्र उपाय बचता है। अतः जी.एम. फसलों की उपयोगिता को सीधे-सीधे नकारा नहीं जा सकता। किन्तु बजाए इसके कि इसे वर्तमान स्वरूप में ही ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जाए, उपयुक्त होगा कि घरेलू स्तर पर इसकी कुछ मर्यादाएं निर्धारित की जाएं और इसके बाद इसे प्रोत्साहित किया जाए। इस तरह की मर्यादाओं में निम्न बिन्दुओं को ध्यान में रखा जाना जरूरी जान पड़ता है-

इसके लाभ और हानि को अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से समझा जाए।
मोनसेंटो और सिनजेंटा जैसी कम्पनियां अपने देश में ही विकसित की जाए।
कम्पनियों के कामकाज के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाए।
जी.एम. पर अनुसंधान के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार किए जाएं।
पर्यावरण एवं स्वास्थ्य की सुरक्षा पर कोई समझौता न किया जाए, तथा
देश की जैव-विविधता को सुनिश्चित किया जाए।

समावेशी विकास की राह में ये बाधाएं हैं खास :-

समावेशी विकास की राह में ये बाधाएं हैं खास :-
शंकर आचार्य
अगर देश का निर्बाध विकास सुनिश्चित करना है तो कुछसमस्याओं पर खासतौर पर ध्यान देकर उनका हल तलाशने की कोशिश करनी होगी।विस्तार से बता रहे हैं शंकर आचार्य
वर्तमान में आर्थिक विषयों पर हो रही तमाम चर्चा बाहरी वित्त पर पड़ रहे दबाव और अर्थव्यवस्था को 5 फीसदी की धीमी विकास दर से उबारने पर केंद्रित है। जैसा कि मैंने पिछले दिनों लिखा भी था, यह काम आसान नहीं है। अब हमें इन तात्कालिक लक्ष्यों से परे मध्यम अवधि के दौरान तेज उच्च और समावेशी विकास दर हासिल करने के बारे में सोचना होगा। बहरहाल अगर मौजूदा बाधाओं पर नजर डाली जाए तो परिदृश्य बहुत बेहतर नहीं नजर आता। इसे प्रबंधनीय स्तर पर बनाए रखने के लिए मैं चार प्रमुख बाधाओं पर अपना ध्यान केंद्रित करूंगा।
रोजगार विरोधी कानून
अप्रत्याशित रूप से प्रतिबंधात्मक श्रम कानूनों (इंदिरा गांधी द्वारा छोड़ी गई सबसे नुकसानदेह गरीब विरोधी विरासत में से एक) में थोड़ी ढील देने के लिए कैबिनेट मसौदा तैयार किए जाने के 20 वर्ष बाद अब तक उस दिशा में जरा भी तरक्की नहीं हो सकी है। जाहिर है इसके परिणाम मोटे तौर पर नकारात्मक ही बने रहे हैं। आजादी के 65 साल बाद देश के 50 करोड़ श्रमिकों में से 90 फीसदी से अधिक असंगठित क्षेत्र के रोजगार के जरिये अपना जीवन बिता रहे हैं। उन्हें रोजगार की सुरक्षा भी प्राप्त नहीं है और उनकी आय भी बेहद कम है। औद्योगिक क्षेत्र के नियोक्ताओं ने तमाम वजहों से नए नियमित कर्मचारियों को भर्ती नहीं किया और उन्होंने श्रम आधरित क्षेत्रों मसलन कपड़ा, वस्त्र, चमड़ा उद्योग, खिलौनों और इलेक्ट्रॉनिक्स आदि क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर परिचालन से परहेज किया जबकि ये क्षेत्र सन 1970 के दशक से ही पूर्वी एशियाई देशों में रोजगार आधारित औद्योगीकरण का सफल जरिया बने हुए थे।
आश्चर्य नहीं कि औपचारिक क्षेत्र में रोजगार में ठहराव आ गया। हाल के वर्षों में यानी वर्ष 2004-05 से 2009-10 के दौरान भी रोजगार बहुत धीमी गति से विकसित हुआ। इस बारे में पर्याप्त आंकड़े मौजूद हैं और कुल रोजगार में कृषि की हिस्सेदारी अस्वाभाविक रूप से ऊंची यानी करीब 50 फीसदी बनी रही, जबकि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी में जमकर कमी आई और वह 15 फीसदी रह गई। युवा आबादी के चलते जिस जननांकीय लाभान्श की बढ़चढ़ कर बात की जाती है वह हमारी खराब श्रम नीतियों के कारण बेकार साबित हो रहा है और बहुत जल्दी वह रोजगार की असुरक्षा, बेरोजगारी और अल्परोजगारी की समस्या में बदल सकता है।
बड़े और मझोले उद्यमों में श्रमिकों को प्रोत्साहन न मिलने ने भी विनिर्माण क्षेत्र के विकास को बुरी तरह प्रभावित किया है। क्षेत्र का जीडीपी में योगदान कई सालों से 15-16 फीसदी पर ठिठका हुआ है। जबकि चीन समेत अन्य एशियाई मुल्कों में यह 30 फीसदी से ज्यादा है। निश्चित तौर अन्य कारक भी इसकी वजह रहे हैं लेकिन श्रम कानूनों से कम।
लुभावनी कल्याण योजनाएं
मोटे तौर पर देखा जाए तो तेज और व्यापक विकास की राह में दूसरा बड़ा रोड़ा है लोकप्रिय राजकोषीय नीतियां और प्रतिस्पर्धी अदूरदर्शी राजनीति। ऐसी राजनीति हर जगह और हर स्तर पर देखने को मिल रही है। इसके दो पहलू हैं: पहला, खराब तरीके से तैयार की गई कल्याण योजनाओं की अपरिपक्व लॉन्चिंग। मसलन काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार आदि। दूसरा, भारी सब्सिडी का माहौल। संप्रग सरकार के कार्यकाल वाले नौ सालों में कल्याण योजनाओं को खूब बढ़ावा दिया गया। जबकि इन उपायों को किफायती और खामी रहित बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया। इसका सीधा मतलब यह है कि विभिन्न योजनाओं में लीकेज, भ्रष्टïाचार और ऐसी अन्य गतिविधियां बनी रहेंगी। इसका नतीजा है राजकोषीय घाटे में इजाफा, बढ़ती महंगाई का जोखिम, भारी भरकम बाहरी घाटा और उच्च ऋण दर तथा कर्ज।
सब्सिडी का लंबा इतिहास रहा है और यह अब भी प्रमुख क्षेत्रों की आर्थिक व्यवहार्यता पर असर डाल रही है। बिजली सब्सिडी (खासकर किसानों की) बिजली क्षेत्र की खस्ता हालत के लिए जिम्मेदार है। इसकी वजह से ही पश्चिमी और उत्तरी भारत में भू-जल स्तर भी खूब गिरा है क्योंकि मुफ्त बिजली होने के चलते लोग खूब पानी निकालते हैं। इसने जल संकट को भी जन्म दिया है। खाद्यान्न सब्सिडी ने कृषि अर्थव्यवस्था में विसंगतियां पैदा की हैं और गैर खाद्य फसलों का विकास रोक दिया है। यूरिया उर्वरक पर बढ़ती सब्सिडी ने मिट्टïी की उर्वर क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारी भरकम डीजल सब्सिडी ने ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है।
शासन-प्रशासन की कमजोरी
शासन और प्रशासन भी बड़ा विषय हैं क्योंकि ये हमारे आर्थिक और सामाजिक जीवन के हर पहलू को प्रभावित करते है

नेपाल को एक अरब डॉलर का क़र्ज़: मोदी

नेपाल को एक अरब डॉलर का क़र्ज़: मोदी


भारत नेपाल को एक अरब डॉलर यानी क़रीब 10 हज़ार करोड़ नेपाली रुपए का रियायती क़र्ज़ देगा. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल की संसद में इसकी घोषणा की.

इस रकम का इस्तेमाल नेपाल अपनी प्राथमिकता के अनुसार कर सकेगा.

नेपाल की संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि नेपाल के साथ भारत के रिश्ते अटूट हैं और भारत पड़ोसी का धर्म निभाने के लिए प्रतिबद्ध है.

इससे पहले मोदी ने नेपाल की संसद में अपना संबोधन नेपाली भाषा में शुरू किया.

कारोबार
मोदी ने दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्ते मज़बूत करने पर ज़ोर दिया. उनका कहना था कि नेपाल को हिट की ज़रूरत है. हिट यानी एचआईटी यानी हाइवेज़, इन्फॉर्मेशन वेज़ और ट्रांसवेज़.

मोदी ने अपने भाषण में नेपाल से बिजली ख़रीदने की इच्छा भी जताई.

उन्होंने कहा, "भारत को बिजली बेचकर नेपाल विकसित देशों में जगह बना सकता है."

उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल के लिए ट्रांसमिशन लाइन दोगुना की जाएगी.

मोदी ने कहा कि नेपाल हर्बल दवाओं का बड़ा निर्यातक बन सकता है और भारत इसमें मदद करने को तैयार है.

'युद्ध से बुद्ध की ओर'

मोदी ने अपने भाषण में कई बार उन सांस्कृतिक प्रतीकों का ज़िक्र किया, जो भारत और नेपाल दोनों के लिए साझा हैं.

मोदी ने नेपाल में शांति प्रक्रिया की तारीफ़ करते हुए कहा, "बुलेट को छोड़कर बैलेट की तरफ बढ़ने के लिए... युद्ध से बुद्ध की तरफ़ जाने के लिए नेपाल को बधाई."

उन्होंने भारतीय सेना के लिए काम करने वाले नेपाली सैनिकों की बहादुरी का भी ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, "मैं उन गोरखा सैनिकों को सलाम करता हूं जिन्होंने भारत के लिए शहादत दी."

मोदी ने कहा कि भारत नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देना चाहता.

नरेंद्र मोदी नेपाली संसद को संबोधित करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री
हैं.
बीबीसी से साभार ।

भारत जापान समझौते

भारत जापान समझौते 
******************************
IAS तथा RAS परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए।

1.जापान ने भारत को बुलेट ट्रेन सहित कई क्षेत्रों में भरपूर मदद देने की घोषणा की। 

2.दोनों देशों के बीच रक्षा आदान-प्रदान, स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा, महिला विकास और राजमार्गों को लेकर कुल पांच समझौते हुए हैं।

3.भारत में 35 अरब डॉलर का निवेश करेगा जापान:

*भारत और जापान ने अपने संबंधों को सामरिक वैश्विक भागीदारीसे बढ़ा कर विशेष सामरिक वैश्विक भागीदारी के स्तर पर ले जाने की घोषणा की और जापान ने अगले पांच वर्षों में भारत में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश करने की घोषणा की।

* यह राशि नए स्मार्ट शहरों के विकास, गंगा और अन्य नदियों की सफाई, कृषि, जल सुरक्षा, परिवहन और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल की जाएगी।

4.लेकिन दोनों देश के बीच असैन्य परमाणु समझौतानहीं हो पाया। असैन्य परमाणु समझौते पर भारत और जापान के बीच समझ बढ़ी है। दोनों नेताओं ने अपने अधिकारियों को बातचीत पूरी करने का निर्देश दिया ताकि रणनीतिक सहयोग मजबूत करने के लिए इस समझौते पर जल्दी हस्ताक्षर हो सकें।

5.छह कंपनियों से प्रतिबंध हटा:

जापान ने 6 प्रमुख भारतीय कंपनियों से प्रतिबंध हटा लिया है।जिससे रक्षा और सैन्य क्षेत्र में दि्वपक्षीय सहयोग बढ़ने की संभावना है। जिन कंपनियों से प्रतिबंध हटाया गया है वे कंपनियां जापान की कंपनियों से मिलकर काम करेंगी और तकनीक का एक दूसरे को हस्तांतरण भी करेंगी। हालांकि जापान ने अभी 4 कंपनियों पर प्रतिबंध जारी रखा है।

योजना आयोग

योजना आयोग खत्म होने के बाद जरूरी है कि उसकी जगह एक सक्षम और प्रभावी संस्था ले। नए संस्थान का संभावित नाम और उसकी रूपरेखा सुझा रहे हैं शंकर आचार्य

संबंधित खबरें
नए योजना आयोग पर मोदी ने मांगी राय
योजना आयोग के अंत से होगी नई शुरुआत?
नई संस्था की राह योजना आयोग से कितनी अलग?
चीनी नक्शे कदम पर योजना आयोग?
बने नया संस्थान तो रखें ढांचे और नीतियों का ध्यान
नए संस्थान पर विशेषज्ञों का मंथन
प्रधानमंत्री ने पिछले महीने लाल किले के प्राचीर से जब योजना आयोग को खत्म करने की घोषणा की तब से तमाम टीकाकार इसकी जगह लेने वाले नए संस्थान की संभावित रूपरेखा पर चर्चा करने में व्यस्त हो गए। ऐसे में मैं भी अपने विचार व्यक्त करना जरूरी समझता हूं। मेरा पूरा ध्यान नई संस्था पर होगा, न कि योजना आयोग पर। उसके बारे में तो मैं केवल यही कहना चाहूंगा कि मैं इस व्यापक विचार से सहमत हूं कि वित्तीय संसाधन आवंटन, परियोजनाओं के आकलन और प्रोत्साहन तथा राष्ट्रीय विकास परिषद के सचिवालय के रूप में आयोग की भूमिका को अब अन्य संस्थानों के हवाले कर दिया जाना चाहिए। यह काम विभिन्न मंत्रालयों तथा वित्त आयोग को सौंपा जा सकता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि नए संस्थान की क्या भूमिका होगी? इसमें कर्मचारियों की नियुक्ति कैसे की जाएगी? इसे किस तरह अधिकार संपन्न बनाया जाएगा? इसे किस नाम से पुकारा जाएगा आदि।

कामकाज

इस सिलसिले में अब तक जो भी बातचीत हुई है उसका लब्बोलुआब यही रहा है कि नई संस्था एक तरह का सरकारी थिंकटैंक हो। इस राय से मेरी असहमति यह है कि हमारे देश में सरकारी संस्थानों की प्रवृत्ति थिंकटैंक को खारिज करने की रही है। यहां उनको व्यावहारिक रूप से उपयोगी नहीं माना जाता है। मेरा मानना है कि यहां सरकार का इरादा नीति आधारित संस्थान बनाने का अधिक है जो सरकार को देश के आर्थिक और सामाजिक विकास को लेकर जरूरी सलाह मशविरा दे सके। निश्चित तौर पर ऐसे मशविरे की गहरी छानबीन भी करनी होगी। उसका शोध आधारित विश्लेषण करना होगा। इसमें रचनात्मक सोच जाहिर होनी चाहिए। नए संस्थान से यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह राष्ट्रीय विकास के सभी बड़े मसलों पर तत्काल अपनी राय देना आरंभ कर देगा। सवाल यह उठता है कि उसे आखिर कहां से शुरुआत करनी चाहिए? मेरा सुझाव है कि पहले उसे निम्रलिखित चार पांच प्राथमिकता वाले विषयों के विश्लेषण और इन पर सुझाव देना शुरू करना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का विश्लेषण: हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जो तेजी से बदल रही है। यहां आर्थिक शक्ति, कारोबार, तकनीक और पूंजी का प्रवाह प्राय: बेहद सहज होता है। भारत की विकास संबंधी संभावनाओं, नीतियों और बाधाओं को लेकर इसके गहरे निहितार्थ हैं। इसके बावजूद मौजूदा सरकार का कोई विभाग इनके आकलन के लिए तैयार नहीं है। नया संस्थान इसके लिए बेहतर जगह हो सकता है।

रोजगार और श्रम बाजार: हर वर्ष देश की श्रम शक्ति में शामिल होने वाली एक करोड़ से अधिक की युवा आबादी के लिए रोजगार तैयार कर पाना देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। समावेशन का सबसे बेहतर तरीका है श्रम आधारित आर्थिक विकास करना। नए संस्थान को रोजगार आधारित विकास के मार्ग की बड़ी बाधाओं पर पहले ध्यान देना होगा और फिर उनसे निपटने की नीति तैयार करनी होगी।

ऊर्जा और पर्यावरण: जैसा कि हमें रोज अखबारों से पता चलता है, भारत के सामने पर्यावरण और उसके संरक्षण के क्षेत्र में ऊर्जा उत्पादन, कीमत निर्धारण, मांग प्रबंधन, कोयला, जलविद्युत, तेल एवं गैस, नाभिकीय ऊर्जा, बिजली और सौर ऊर्जा एवं अपारंपरिक माध्यमों को लेकर तमाम दिक्कतें हैं। इन तमाम मुद्दों पर सतत और स्तरीय विश्लेषण की आवश्यकता है ताकि देश के विकास के लिए बेहतर नीतियां तैयार की जा सकें।

परिवहन एवं संचार: इसी तरह, परिवहन और संचार क्षेत्र का विकास भी कई क्षेत्रों मसलन, रेल, सड़क, बंदरगाह, जहाजरानी, हवाई परिवहन, दूरसंचार आदि में बंटा हुआ है। इसके लिए अलग अलग मंत्रालय जवाबदेह हैं। यहां भी माध्यम और लंबी अवधि का सोच आवश्यक है क्योंकि उसकी मदद से ही सही ढंग की नीतियां और तेज नियामकीय और नीतिगत ढांचा तैयार किया जा सकेगा। ऊर्जा और पर्यावरण के मामले में तत्काल विश्लेषण करने और ध्यान देने की आवश्यक है। नए संस्थान को यह मुहैया कराना चाहिए।

जल, स्वच्छता और जन स्वास्थ्य: पानी की कमी और उसका कुप्रबंधन ग्रामीण और शहरी विकास दोनों के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। पानी कई चीजों से जुड़ा हुआ है। इसमें सफाई और नाली आदि की व्यवस्था भी शामिल है। अब इन पर गंभीरता से ध्यान दिया जा रहा है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि ये जनस्वास्थ्य से बहुत करीबी से जुड़े हुए हैं। एक बार फिर इन समस्याओं की परस्पर विरोधी क्षेत्रों से जुड़ी छवि दिक्कत की वजह बनेग

भारतीय अर्थव्यवस्था- स्थिति और चुनोतियाँ

भारतीय अर्थव्यवस्था- स्थिति और चुनोतियाँ
भारत में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्ण बहुमत वाली केंद्र सरकार बनने के बाद देश में ही नहीं बल्कि विश्व भर में एक उम्मीद की लहर दौड़ती दिखाई दे रही है.

लोग आस लगाए हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में पिछले कई वर्षों से लगातार बढ़ती महंगाई और दयनीय आर्थिक स्थिति को जल्दी ही दुरुस्त करने के लिए ठोस कदम उठाएंगे.

विदेशी निवेशक, जो पिछली केंद्र सरकार के एक दशक लंबे शासन के अंतिम दिनों तक भी अपूर्ण रह गई अनगिनत परियोजनाओं और व्यापक होते भ्रष्टाचार की वजह से निराश बैठे थे, अब उत्साहित हैं कि भारत के औद्योगिक विकास में तेज़ी आएगी.

निश्चित रूप से केंद्र सरकार में इतने लंबे अरसे के बाद एक बड़ा बदलाव होने से यह उत्साह स्वाभाविक है, लेकिन क्या सिर्फ़ प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल बदल जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल कमज़ोरियाँ और अक्षमताएँ इतनी जल्दी दूर की जा सकती हैं?

भारतीय अर्थव्यवस्था की असलियत और संभावित बाधाओं पर एक रिपोर्ट

विश्व बैंक जैसे कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने आगाह किया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है और आने वाले वर्षों में इस नई सरकार को अत्यधिक सतर्क और विषम परिस्थितियों के लिए तैयार रहना होगा. देखिए, आँकड़े क्या कहते हैं:

भारत बनाम चीन

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की हाल ही की रिपोर्ट दर्शाती है कि राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था आँकने के कई मापदंडों में भारत गंभीर रूप से पिछड़ा हुआ है.

रिपोर्ट यहाँ तक कहती है कि भारत की अर्थव्यवस्था आपातकालीन दौर से गुज़र रही है. इस रिपोर्ट ने 144 देशों की आर्थिक स्थिति और भविष्य में उनकी विकास दरों की संभावनाओं को आँका है.

भारत इन देशों में 71वें स्थान पर है, जो इसी रिपोर्ट के पिछले संस्करण से 11 स्थान नीचे चला गया है.

यही नहीं, पिछले 6 वर्षों से भारत लगातार इन मापदंडों में फिसलता जा रहा है.

एशिया के दो सबसे विकासशील देशों– चीन और भारत के आर्थिक विकास को अक्सर एक स्पर्धा की तरह देखा जाता है.

2007 में भारत चीन से सिर्फ़ 14 स्थान पीछे था और अब यह फासला 43 स्थानों का हो गया है. दो दशक पहले भारत का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद चीन से अधिक था, लेकिन अब चीन भारत से चार गुना अधिक धनी देश है. कौन से कारण हैं जो भारत को लगातार पीछे धकेल रहे हैं?

अच्छी विकास दर ज़रूरी

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार एक देश की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक एक अच्छी विकास दर बनाए रखने के लिए तीन चरणों से गुज़रना पड़ता है.

पहला, मूल आधारिक संरचना, यानी स्वास्थ्य और शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं. इनके साथ ही वृहत आर्थिक स्थिति – महंगाई, राजकोषीय घाटा और आयात-निर्यात तंत्र, आदि को भी सुदृढ़ रहना चाहिए.

इन दोनों मापदंडों में भारत की स्थिति दयनीय है. इसको बदलने के लिए सरकारी व निजी संगठनों की सक्रियता, आपसी तालमेल और नौकरशाही तंत्र का सक्रिय होना आवश्यक है.

इस बुनियादी संरचना के कमज़ोर होने से कोई भी अर्थव्यवस्था देर-सवेर ज़रूर लड़खड़ा जाएगी.

भारत की कुख्यात लालफ़ीताशाही और राजनीतिक खींचातानियों को देखकर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था की नींव ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है.

कृषि में तकनीक बढ़े

उदाहरण के लिए, वर्ल्ड बैंक के आकलन के अनुसार भारत में कोई भी परियोजना या व्यापार शुरू करने के लिए औसतन 12 औपचारिकताएं और एक महीने का समय लगता है.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 144 देशों की रैंकिंग में इस मापदंड में भारत तकरीबन सभी देशों से पीछे है.

एक और बड़ी खामी यह है कि भारत की विशाल जनसंख्या के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में कर्मियों की संख्या में बहुत असमानताएँ हैं.

लगभग हर कृषि-प्रधान देश धीरे-धीरे अन्य उद्योगों और उत्पादन-प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर अग्रशील होता है.

यह प्रक्रिया बढ़ती जनसंख्या और तकनीकी विकास की देन है. भारत की पहली समस्या यह है कि वह खेती पर निर्भर देश की 54 प्रतिशत जनता को पिछले कई दशकों से पर्याप्त संरचनात्मक सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाया.

यही वजह है कि देश की आधी से ज़्यादा आबादी का सकल घरेलू उत्पाद में सिर्फ़ 14 फीसदी योगदान है.

दूसरी तरफ, कम आय से परेशान और नए उद्यमों की ओर आकर्षित युवाओं को पर्याप्त शिक्षा और प्रशिक्षण मुहैया नहीं हो पा रहा है, इस कारण नए उद्योगों को सक्षम इंजीनियर, मैकेनिक, आदि नहीं मिलते.

बुनियादी सुविधाओं की कमी

बिजली, पानी, और औद्योगिक ऊर्जा जैसी बुनियादी चीज़ें भारत में वैसे भी विकट समस्याएँ हैं और नई परियोजनाओं को शुरू करने में बड़ी बाधा बनती हैं.

भारत के पास काम करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन उनको खपाने और उनका लाभ उठाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.

नतीजतन श्रम-सक्षमता के आंकड़े में भारत 144 देशों में 121वें स्थान पर है. यह विसंगति देश में आय असमानता और अमीर-गरीब के बीच लगातार चौड़ी होती खाई का भी कारण है.

नरेंद्र मोदी से आशाएं हैं कि वे ‘अच्छे दिनों’ को जल्दी ही ले आएंगे. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने प्रदेश में विकास की दिशा में बहुत कार्य किए, किन्तु पूरे देश की अर्थव्यवस्था के ढांचे को बदलना इतना आसान नहीं होगा.

सिर्फ़ नई योजनाएं बनाना काफी नहीं, उनको लागू करने के लिए इन मूल समस्याओं पर ध्यान देना ज़्यादा ज़रूरी है.

निवेशकों में उत्साह

केंद्र में सरकार बदलने के बाद निवेशकों के उत्साह के कुछ संकेत दिखाई देने लगे हैं.

शेयर बाज़ार का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स नई ऊंचाइयों को छू रहा है, लेकिन यह याद रखना होगा कि विदेशी निवेश, जो इस बढ़ोत्तरी का एक बड़ा कारण है, अमरीका और यूरोप के विकसित देशों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है.

अभी उन देशों की मौद्रिक नीति नरम है और ब्याज दरें बहुत कम, जिस कारण निवेशकों और उपभोक्ताओं दोनों को पैसा आसानी से उपलब्ध है.

जैसे-जैसे विश्व इस लंबी आर्थिक मंदी के दौर से उबरेगा, विकसित देशों में ब्याज दरें बढ़ेंगी. उस समय निवेशक निश्चय ही भारत की मूल कमजोरियों पर ज़्यादा ध्यान देंगे.

सतही तौर पर भारत अपने निजी आर्थिक संकट से निकलता लगता है, लेकिन देश की विकास क्षमता और स्थिरता की असली परीक्षा अभी बाकी है

(राष्ट्रपति शी चिनफिंग)

(राष्ट्रपति शी चिनफिंग)
मैंने 17 साल पहले भी प्राचीन व रहस्यमय भारत की यात्र की थी। उस वक्त भारत आर्थिक सुधारों की नीति को आगे बढ़ा रहा था और आर्थिक विकास के क्षेत्र में नई उम्मीद दिख रही थी। भारत का प्रमुख समृद्ध वाणिज्यिक शहर मुंबई, सिलिकॉन वैली बेंगलूर और बॉलीवुड की फिल्में व योग विश्व भर को प्रभावित करते रहे हैं। भारतीय जनता को अपने भविष्य के प्रति बहुत सारी उम्मीदें हैं। पुरानी सभ्यता में पुन: युवा शक्ति का जोश दिखने लगा है। 17 साल बाद फिर एक बार मैं इस सुंदर भूमि पर कदम रखूंगा। आज का भारत एक उल्लेखनीय नवोदित बाजार और बड़ा विकासशील देश बन चुका है। यह एशिया का तीसरा बड़ा आर्थिक समुदाय, विश्व का दूसरा बड़ा सॉफ्टवेयर पॉवर और कृषि उत्पादों का निर्यातक देश भी है। भारत संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और ब्रिक्स आदि संगठनों का भी सदस्य है। भारत की कहानी लोगों की जुबान पर गूंजती रहती है। भारत में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद विकास व आर्थिक सुधारों का रुझान तेज हुआ है। आज अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत में मौके तलाश रहा है।

नई सदी में प्रवेश करने के बाद चीन-भारत संबंधों का व्यापक विकास हुआ है। दोनों देशों ने शांति व समृद्धि की दिशा में रणनीतिक सहयोग आधारित साङोदारी संबंध स्थापित किए हैं। चीन भारत का सबसे बड़ा बिजनेस भागीदार बन चुका है। द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2000 में तीन अरब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अब लगभग 70 अरब अमेरिकी डॉलर पर पहुंच चुका है। पिछले साल दोनों देशों के 8 लाख 20 हजार नागरिकों ने एक-दूसरे के यहां दौरा या पर्यटन किया। जलवायु परिवर्तन, खाद्यान्न सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा जैसे वैश्विक समस्याओं पर दोनों देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग है। इसके साथ ही द्विपक्षीय संबंधों तथा विकासशील देशों के समान हितों की रक्षा के लिए कारगर पहल हुई है। दोनों देशों के बीच सीमा वार्ता को लेकर भी सक्रिय प्रगति हुई है। दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्र में अमन-चैन स्थापित करने की पूरी कोशिश की है। चीन-भारत संबंध 21वीं सदी में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सक्रिय द्विपक्षीय संबंधों में से एक बन चुका है। चीन और भारत के बीच अच्छे रिश्ते जरूरी हैं। हम एक-दूसरे पर भरोसे के सिद्धांत को अपनाकर रणनीतिक संपर्क को निरंतर मजबूत करने के साथ-साथ परस्पर विश्वास को और प्रगाढ़ करने के प्रति संकल्पबद्ध हैं। इसके साथ ही हम मतभेदों का निपटारा करने के लिए संकल्पबद्ध हैं।

वर्तमान में चीन और भारत सुधार व विकास के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। चीनी जनता अपने राष्ट्र के महान पुनरुत्थान के चीनी सपने को साकार करने के लिए कठिन मेहनत कर रही है। चीन सुधार को सर्वागीण रूप से अपना रहा है और आगे बढ़ रहा है। वहीं चीनी विशेषता वाली समाजवादी प्रणाली में सुधार व विकास करने, देश की प्रशासनिक व्यवस्था के आधुनिकीकरण के काम को आगे बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया है। चीन ने 15 क्षेत्रों में 330 से अधिक सुधार के कदम उठाए हैं। हमारी सरकार अब इन नीतियों को आगे बढ़ा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत की नई सरकार ने नौकरशाही को दुरुस्त करने और देश के आधारभूत ढांचे में सुधार के लिए 10 प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं। भारत एकजुट, शक्तिशाली व आधुनिक देश के तौर पर अपने महान राष्ट्र का निर्माण करने में लगा हुआ है।

चीन व भारत के राष्ट्रीय पुनरुत्थान का सपना एक-दूसरे से मिलता-जुलता है। हमें शक्तिशाली व समृद्ध देश के सपने को साकार करने की कोशिश करनी चाहिए। विभिन्न श्रेष्ठताओं वाले नवोदित बाजारवादी देश के तौर पर हमें विकास के लिए और अधिक साङोदारी की जरूरत है। हमें एक-दूसरे की खूबियों से सीख कर अपनी कमियों को दूर करते हुए आगे विकास करना चाहिए। नियादी संरचनाओं के निर्माण और प्रसंस्करण उद्योग के क्षेत्र में चीन के पास अधिक व्यापक अनुभव है। इन क्षेत्रों में चीन भारत के विकास में बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। भारत में सूचना व दवा उद्योग बहुत विकसित है। हम भारतीय कारोबारियों का चीन के बाजार में निवेश करने के लिए स्वागत करते हैं। विश्व का कारखाना और विश्व का दफ्तर यदि एक साथ आते हैं तो हम दुनिया में सर्वाधिक प्रतिस्पर्धी उत्पादन केंद्र बन सकते हैं और सबसे आकर्षक उपभोक्ता बाजार तैयार कर सकते हैं। चीन और भारत को एशियाई अर्थव्यवस्था के दो इंजन होने के कारण आर्थिक विकास में परस्पर साङोदारी बढ़ानी चाहिए। मुङो विश्वास है कि चीनी ऊर्जा और भारतीय बुद्धिमत्ता का मिलन हो जाए तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। एशियाई अर्थव्यवस्था के अनवरत विकास को आगे बढ़ाने के लिए हम बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक कॉरिडोर के निर्माण को आगे बढ़ाएंगे, जबकि सिल्क रोड आर्थिक जोन और 21वीं शताब्दी में समुद्री सिल्क रोड के आान पर भी चर्चा करेंगे। वैश्विक बहुध्रुवीकरण की प्रक्रिया में दो बड़ी और महत्वपूर्ण शक्तियां होने के कारण हमें रणनीतिक सहयोग वाली वैश्विक साङोदारी करनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का मानना है कि चीन व भारत दो शरीर और एक भावना हैं। मैं इससे सहमत हूं। हालांकि चीनी ड्रैगन और भारतीय हाथी की भिन्न-भिन्न विशेषताएं हैं, फिर भी दोनों देश शांति, निष्पक्षता और न्याय के पक्षधर हैं।

हमें पंचशील सिद्धांत का प्रसार करके अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को और अधिक निष्पक्ष व सही दिशा में विकसित करने की कोशिश जारी रखनी चाहिए। वहीं युग के विकास और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की समान मांग को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को बेहतर ढंग से हल करने की आवश्यकता है चीनी नेता देंग ने कहा था, एशिया की सदी का सपना चीन-भारत और अन्य पड़ोसी देशों के विकास के बाद ही साकार हो सकेगा। हम इस युग प्रदत्त जिम्मेदारी को निभाते हुए चीन-भारत मैत्री की प्रेरणाशक्ति बनने को तैयार हैं। भारत यात्र के दौरान शांति व समृद्धि की दिशा में उन्मुख चीन-भारत रणनीतिक सहयोग आधारित साङोदारी संबंधों में नई प्रेरणा शक्ति डालने के लिए मैं भारतीय नेताओं के साथ दोनों देशों के बीच रिश्तों पर गहन आदान-प्रदान की प्रतीक्षा में हूं। मुङो विश्वास है कि अगर चीन व भारत एकजुट होकर सहयोग करते रहे तो एक समृद्ध व पुनर्जीवित एशिया की सदी अवश्य ही जल्द साकार होगी।

भारत और चीन के रिश्ते

भारत और चीन के रिश्ते ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. आजादी के बाद 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारे से स्टैपल वीज़ा पर उपजे विवाद तक.

इस बीच दोनों मुल्कों की एक जंग हुई और बातचीत की मेज पर अक्साई चीन समेत अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे भी आते रहे.

लद्दाख में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबरों से लेकर दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन का सवाल अखबारों की सुर्खियां बटोरता रहा है.

लेकिन अब नई सरकार विदेश नीति के मोर्चे पर सक्रिय दिख रही है और पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को पटरी पर लाने की पहल ज़मीन पर देखी जा सकती है.

इन्हीं कोशिशों की ताजा कड़ी है शी जिनपिंग का भारत दौरा.

और मोदी और शी जिनपिंग की दोस्ती रूमानी हो, इसके लिए सात बाहरी कारणों को समझना जरूरी है.

जापान से मुकाबला और अहमदाबाद

जापान की सौ कंपनियों ने भारत में निवेश करने की योजना बना रखी है. उनमें से 50 ने इस दिशा में कदम भी बढ़ा दिए हैं.

जापान के कारोबारी संगठन 'जेट्रो' ने अहमदाबाद में पिछले साल अपना दफ्तर खोला है.

यह जापान की चीन से प्रतिस्पर्द्धा है जिसकी वजह से शी जिनपिंग ने भारत दौरे की शुरुआत के लिए अहमदाबाद को चुना है न कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से किसी लगाव की वजह से.

जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने मुंबई को अहमदाबाद से जोड़ने वाले रेल लिंक के लिए बुलेट ट्रेन देने पर सहमति भी दी है.

भारत पर आबे के असर को चुनौती

चीन ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वह इस मुद्दे पर किस हद तक जा सकता है.

चीन के एक मंत्री ने हाल ही में भारत को एक नाभिकीय संयंत्र बनाने में मदद की पेशकश की थी.

इस पेशकश के पीछे विचार जापान के तरफ से आने वाले ऐसे किसी प्रस्ताव को बेअसर करना था.

चीन भी भारत को 100 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता देना चाहता है.

यह रकम हाल ही में जापान दौरे पर मोदी को आबे की ओर से मिली पेशकश की तकरीबन तीन गुनी है.पाकिस्तान में अस्थिर सरकार

चीन की सीमा में अतिक्रमण करने वाले इस्लामी चरमपंथियों से निपटने का सवाल हो या फिर भारत पर दबाव बनाने की जरूरत हो, इन दो मुद्दों पर चीन हमेशा से पाकिस्तान पर निर्भर रहा है.

लेकिन हाल के समय में पाकिस्तान की अहमियत चीन की नज़र में कम हुई है.

नवाज़ शरीफ की सरकार विपक्ष के विरोध की वजह से अस्थिर नजर आ रही है.

नवाज़ शरीफ चरमपंथियों पर थोड़ा असर रखते हैं जो उन पर लगाम रखने के लिए जरूरी है.

हिंद महासागर से जुड़ने की चीन की चाह

श्रीलंका और मालदीव में चीन की मौजूदगी भारत पर दबाव डाल रही है. दोनों ही देशों ने चीन के मैरीटाइम सिल्क रूट में शामिल होने पर सहमति दी है. भारत इससे सहमत नहीं है.

माले एयरपोर्ट की कमान चीन के हाथ में है. मालदीव शंघाई कॉरपोरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन में शामिल होना चाहता है जिसमें भारत और पाकिस्तान एक प्रेक्षक की भूमिका में हैं न कि सदस्य की हैसियत से.

माले ने सार्क में चीन को अपनी भूमिका बढ़ाने में मदद देने पर सहमति दी है. बदले में चीन ने मालदीव के आंतरिक मामलों में दखल न देने का वादा किया है, जाहिर है इसका सरोकार भारत से है.

श्रीलंका और मालदीव, दोनों ही हिंद महासागर में चीन को रास्ता देने के सवाल पर संजीदा हैं.

वियतनाम के साथ भारत का सौदा, चीन की चिंता

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की हाल की हनोई यात्रा में चौंका देने वाला समझौता हुआ है.

भारत 'साउथ चाइना सी' में तेल खनन के लिए वियतनामी कंपनी के साथ उतरेगा.

ऐसे ही एक सौदे का चीन ने ज़बरदस्त विरोध किया था और दो साल पहले वियतनाम ने अपने पांव वापस खींच लिए.

चीन और वियतनाम दोनों ही समुद्र के एक हिस्से पर दावा करते हैं. इस नए समझौते ने चीन पर ज़बरदस्त दबाव डाला है और इस विवाद में वियतनाम का पक्ष मजबूत कर दिया है.

यह पहली बार है कि भारत ने चीन से निपटने के लिए किसी और देश का इस्तेमाल किया है.

पर्यावरण और डब्ल्यूटीओ के सवाल पर पश्चिमी देशों का दबाव

पर्यावरण में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय कारोबारी मुद्दों पर भारत और चीन ने एक साथ काम करके बड़ी कामयाबी के साथ पश्चिमी देशों को किनारे कर दिया था.

उनके साथ आने से विकासशील देशों की आवाज़ भी बुलंद हुई.

विश्व व्यापार संगठन में भारत को उस वक्त एक बड़ा झटका लगा जब उसने एक प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया लेकिन इस मुद्दे पर चीन ने उसका साथ नहीं दिया.

लेकिन इन मुद्दों पर अलग प्राथमिकताओं वाले पश्चिमी देशों से निपटने के लिए दोनों ही देशों को एक दूसरे की जरूरत है.

ब्रिक्स और एससीओ

ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के संगठन 'ब्रिक्स' में चीन एक नेता के तौर पर उभरा है.

उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों को अमरीकी प्रभाव से दूर रखने और अपना असर बढ़ाने के मद्देनज़र ब्रिक्स चीन की जरूरतों पर खरा उतरता है.

पांच देशों के क्लब के अघोषित नेता की अपनी हैसियत बरकार रखने और ब्रिक्स बैंक की योजना को कामयाब करने के लिए शी जिनपिंग को मोदी की मदद की जरूरत होगी

मैक इन इंडिया : एक मुल्यांकन

मैक इन इंडिया : एक मुल्यांकन 

IAS तथा RAS परीक्षा हेतु

अ )क्या है मैक इन इंडिया 
ब )आवश्यकता क्यों
स ) प्रमुख बिंदु 
द ) लाभ 
य )चीन से भिन्नता 
र ) बाधाएँ
व ) निष्कर्ष

अ )क्या है मैक इन इंडिया

यह भारत को विनिर्माण में अग्रणी बनाने का एक संकल्प है।इस प्रोग्राम की शुरुवात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में की गयी। इस अवसर पर
30 देशों के उद्योगपतियों ने भाग लिया।

ब )आवश्यकता क्यों

वैश्विक विनिर्माण में भारत की भगीदारी मात्र 2.1 %है जबकि चीन की 22.4% ।इसलिए इस और ध्यान दिया जाना चाहिए।

भारत के GDP में विनिर्माण का हिस्सा मात्र 15% है जबकि चीन काजहाँ 33 % वहीँ इंडोनेशिया ,पाकिस्तान, बांग्लादेश सरीके मुल्क भी हमसे आगे है जिनका योगदान क्रमश: 26%,19% एवं 19% है।
(स्रोत -UNO की वेबसाइट )

तथ्यों से जाहिर है कि इस सेक्टर को अभी तक उपेक्षित ही माना गया है।

स ) प्रमुख बिंदु

इसका लोगो दहाड़ता हुवा शेर है।

अब उधोग हेतु लाइसेंस पाना आसान होगा।

सरकार भारत में निवेशकों की सुगमता के लिए सभी प्रयास करेगी। इसमें व्यावसायिक इकाइयों की पूछताछ आदि का 72 घंटे में जवाब देने के लिए एक प्रकोष्ठ का गठन भी शामिल है। यह सभी नियामकीय प्रक्रियाओं की निगरानी भी करेगा और उन्हें सरल बनाएगा। इसके साथ अनुपालन के बोझ को भी कम किया जाएगा।

एक आधिकारिक बयान में कहा गया है, ‘सरकार एक नया रास्ता बनाने को प्रतिबद्ध है जिसमें कारोबारी इकाइयों को लाल कालीन पर स्वागत जैसा अनुभव देने का विचार है। विदेशी निवेशकों को नियामकीय व नीतिगत मुद्दों पर दिशानिर्देशन के लिए ‘भारत में निवेश’ प्रमुख संदर्भ बिंदु के रूप में काम करेगा। और उन्हें नियामकीय मंजूरियां दिलाने में मदद करेगा।’

केंद्र सरकार ने ऐसे 25 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें भारत दुनिया में अग्रणी स्थिति हासिल करने की क्षमता रखता है। इस अवसर पर एक सामान्य परिचय पुस्तिका के अलावा उपरोक्त महत्पूर्ण चिह्नित क्षेत्रों के बारे में अलग-अलग ब्रोशर भी जारी किये गए। जिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों के अलग-अलग ब्रोशर जारी किए जाएंगे उनमें वाहन, रसायन, आईटी, फार्मा, परिधान, बंदरगाह, विमानन, चमड़ा, पर्यटन एवं आतिथ्य, वेलनेस व रेलवे शामिल हैं।

विदेशी निवेशकों के भारत आगमन या प्रस्थान पर निवेशक सुविधा सेल उनकी मदद करेगा। यह मुख्य रूप से हरित व आधुनिक विनिर्माण पर केंद्रित होगा। इन कंपनियों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने में मदद की जाएगी।

यह अभियान राष्ट्रीय के अलावा राज्यस्तर व देश के बाहर मिशनों में भी पेश किया जाएगा।

यह चयनित देश में विभिन्न क्षेत्रों की शीर्ष कंपनियों को लक्ष्य करेगा।

इसके अलावा यह चुनिंदा घरेलू कंपनियों की भी पहचान करेगा जो नवोन्मेषण और नई प्रौद्योगिकी में अग्रणी हैं जिससे उन्हें वैश्विक स्तर पर चैंपियन के रूप में स्थापित किया जा सके।

द )लाभ

विनिर्माण सेक्टर से ही बेरोजगारी की समस्या को दूर किया जा सकता है।

भारत के व्यापर भुगतान के संतुलन हेतु भी विनिर्माण सेक्टर में तेजी आवश्यक है

भारत काफी मात्रा में तेल का आयात करता है लेकिन निर्यात करने हेतु मदें बहुत कम है

इससे हमारे निर्यात क्षेत्र में वॄद्धि होगी।

सर्विस सेक्टर का उपभोग केवल स्थानीय स्तर पर ही किया जा सकता है उसका निर्यात नहीं किया जा सकता। जैसे कोई धोबी केवल स्थानीय स्तर पर ही अपनी सेवा दे सकता है।

सोफ्टवेयर क्षेत्र में निर्यात संभव है लेकिन सेवा क्षेत्र में इसका योगदान मात्र 5-6% ही है।परन्तु यदि हम सामान या वस्तुएं बनायें जैसे ऑटोमोबाइल, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक, टेक्सटाइल आदि ।इनका निर्यात सम्भव है।

इससे हमें विदेशी मुद्रा भी मिलेगी।जिससे हमारा फोरेक्स रिज़र्व भी बढेगा।

इसमें किसी भी प्रकार प्रकार की सब्सिडी की बात नहीं बल्कि यह अपील है कि आप भारतीय है या विदेशी आप अपना सामान चाहे जहाँ बेचे लेकिन निर्माण भारत में ही करें।

इससे ओधोगिक कल्चर का विकास होगा।

य) चीन से भिन्नता

मैक इन इंडिया प्रोग्राम के अगले ही दिन चीन ने मेड इन चाइना प्रोग्राम की शुरुवात कर यह संकेत देने की कोशिश की विनिर्माण क्षेत्र में वह अपना दबदबा बनाये रखना चाहेगा।परन्तु दोनों में काफी हद तक असमानता है।

हमारा विनिर्माण मॉडल चीन से भिन्न होगा। चीन ने तो हर इंडस्ट्री को विशेष सब्सिडी दे कर बुला लिया

वहां सब कुछ द्विपक्षीय होता है ,नीति नहीं होती।

परन्तु हमारा उदेश्य किसी विशेष इंडस्ट्री को वरीयता देने का नहीं बल्कि सभी के लिए सामान रूप से बहेतर शासन उपलब्ध करवाना है।

चीन की तुलना में हम एक लोकतंत्र है ।यहाँ श्रमिक कानूनों का विशेष महत्व है।

र ) बाधाएँ

हमारे पास सपष्ट रणनीति और योजना का अभाव है।

पूर्व में कहा गया कि योजना आयोग को समाप्त किया जायेगा लेकिन उसकी जगह नयी सरंचना क्या होगी अभी तक अस्पष्ट है।

हमारी आर्थिक संरचना अत्यधिक जटिल है सबसे ज्यादा 50% रोजगार देने वाला सेक्टर कृषि है जिसमें मात्र 4% निवेश आ रहा है।जबकि बड़े उधोगों में 80% निवेश आ रहा है जो कि मात्र 6% लोगों को रोजगार दे रहे है।

1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण के नाम पर लघु और मध्यम उधोगों को जो संरक्षण मिलता है उसे समाप्त कर दिया गया।

यदि हम बिना भारतीय कंपनियों को विशेष सब्सिडी देते हुवे मार्केट खोल देंगे तो इससे तो नुकसान ही होगा। उदाहरण के तौर पर भारतीय कम्पनी भेल किसी भी सुरत में जर्मनी कम्पनी सिमंस का मुकाबला नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास उच्च टेक्नोलॉजी और संसाधन है।

भारत में बदनाम कठोर नौकरशाही और लाल फीताशाही इसमें महत्वपूर्ण अडंगा है।

सुशासन हेतु पर व्यापक परिवर्तनों की आवश्यकता है।

व ) निष्कर्ष

व्यपार करने की सहूलियत आर्थिक आजादी के लिए अभी वैश्विक सूचकांकों में भारत अभी काफी पीछे है इसके लिए कठोर कदम उठाने होंगे। हमारा सर्विस सेक्टर उतना रोजगार निर्माण नहीं कर सकता जो कि विनिर्माण क्षेत्र द्वारा किया जा सकता है।परन्तु प्रशासनिक मशीनरी की उलझी प्रक्रियाओं से इसे निकलना होगा। छोटे उधोगों के विकास की अन्य सबसे बड़ी समस्या वित्त की कमी है इस ओर भी ध्यान देना होगा।

अंत में हमें यह नहीं भुलाना चाहिए कि "मैक इन इंडिया " प्रोगाम के उद्यघाटन अवसर पर बाटें गए
ब्रोशर पर मेड इन चाइना लिखा था

न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका :उपजा विवाद एवं कोलिजियम व्यवस्था की प्रासंगिकता।

न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका :उपजा विवाद एवं कोलिजियम व्यवस्था की प्रासंगिकता।
***********************************
न्याय पालिका बनाम कार्यपालिका के मध्य विवाद एक चर्चित विषय बन गया है।इस विषय को हम निम्न प्रकार से देख सकते है-

1.हाल ही में चर्चित क्यों
2.क्या है कोलिजियम व्यवस्था।
3.क्या थी पूर्व व्यवस्था
4.लाभ
5.क्या है समस्या
6.क्या प्रयास किये गए
7.सुझाव

1.हाल ही में चर्चित क्यों

हाल में पीटीआई के अध्यक्ष काटजू द्वारा मद्रास कोर्ट के पूर्व जज पर लगाये गए आरोप ,गोपाल सुब्रमण स्वामी को सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के जज पद पर न चुने जाना तथा चीफ जस्टिस द्वारा इसकी कठोर आलोचना के मध्यनजर न्याय पालिका बनाम कार्यपालिका के मध्य विवाद महत्वपूर्ण विषय बन गया है।

2.क्या है कोलिजियम व्यवस्था।

*कोलिजयम व्यवस्था के अनुसार SC तथा HC के जज का के नाम की सिफारिश SC के पैनल द्वारा ही की जायेगी।

*सरकार अगर किसी जज की प्रस्तावित नियुक्ति की फाइल वापस सुप्रीम कोर्ट कोलिजियम को भेज दे तो कोलिजियम सरकार को पुननर्विचार की अपील भेज सकता है और ऐसा होने पर सरकार उस सिफारिश को मानने पर बाध्य हो जाती है।

2.क्या थी पूर्व व्यवस्था -

*1993 से पूर्व नियुक्ति सम्बन्धित प्रक्रिया मंत्री समूह के पास थी जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 वरिष्ठ जजों के कोलिजियम को सोंपा गया।

3.लाभ-

*इससे प्रमुख लाभ यह है कि न्यायपालिका में राजनितिक हस्तक्षेप कम होगा।

*न्याय पालिका का राजनीतिकरण कम होगा।

*न्यायिक निर्णयों में पारदर्शिता आएगी।

4.समस्या -

*हाल ही उपजे विवाद से यह स्पष्ट हो गया कि यह प्रक्रिया भी राजनीतिक दबाब से परे नहीं है।

*कोलिजियम में यदपि जजों का पैनल होता है परन्तु यहाँ होता वही है जो चीफ जस्टिस चाहते है।

*यह व्यवस्था सविंधान से भी उपर हो गयी ।

*लॉ कमीशन तथा पार्लियामेंटरी स्टैंडिंग समिति ने भी इस सिस्टम को दोषपूर्ण बताया।

* ऐसे दागदार नामों की भी सिफरोश कर दी जाती है जिसे पुन लोटाया गया।

*न्यायपालिका में शिकायत ऒर उसके निपटारे की पारदर्शी तन्त्र का आभाव प्रमुख समस्या है।

*अदालत के पास कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का पॉवर भी प्रमुख बाधा के रूप में कार्य करता है।

5.क्या प्रयास किये गए -

*गत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट एवं उच्च न्यायलयों में जजों की नियुक्ति के लिए 'judicial appointment commission bill' तैयार किया था।

*इसके लिए सविधान संसोधन की आवश्यकता थी यह विधेयक राज्यसभा में दिसम्बर 2013 में पास हो गया ।

*इसे स्टैंडिंग समिति को सोंपा गया।

*यह 120 वां साविधान संसोधन विधेयक था ।

*परन्तु 15 वीं लोक सभा के भंग होने पर विधेयक तो लेप्स है तथा कमीशन का गठन राज्यसभा में लंबित है।

6.सुझाव-

*रास्ट्रीय न्यायिक आयोग की व्यवस्था की जाये।

*नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी हो।

*रिक्त पद भरे जाय।

*राजनेतिक धकल बंद हो।

*आन्तरिक शुद्विकरण के प्रयास हो।

ई-गवर्नमेंट: चुनौतियां एवं अवसर

ई-गवर्नमेंट: चुनौतियां एवं अवसर

Source: रोजगार समाचार

1.इलेक्ट्रॉनिक गवर्नमेंट (ई-गवर्न) का अर्थ 
2.ई गवर्नमेंट से लाभ
3.सरकार के प्रयास
4.चुनोतियाँ
5.सुझाव

1.इलेक्ट्रॉनिक गवर्नमेंट (ई-गवर्न) का अर्थ-
नागरिकों (जी2 सी.), व्यवसायियों (जी2बी.), कर्मचारियों (जी2ई.) और सरकारों (जी2जी.) को सरकारी सूचना एवं सेवाएं देने के लिए संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करना।

2.ई गवर्नमेंट से लाभ

* संगठनात्मक परिप्रेक्ष्य से
ई-गवर्नमेंट का अत्यधिक स्पष्ट लाभ है - वर्तमान व्यवस्था या प्रणाली की दक्षता में सुधार लाना, ताकि यह धन एवं समय बचा सके। उदाहरण के लिए, एक बोझिल दस्तावेजी प्रणाली से हट कर यदि किसी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली पर कार्य किया जाए तो यह प्रणाली जनशक्ति की आवश्यकता को कम कर सकती है और कार्य-परिचालन लागत भी घट सकती है।

*नागरिक परिप्रेक्ष्य से
देखा जाए तो ई-गवर्नमेंट का एक अत्यधिक महत्वपूर्ण लाभ (मानव चालित प्रणालियों की तुलना में) यह है कि नागरिकों को सरकारी सेवाएं ”कहीं भी और किसी भी समय“ उपलब्ध हो सकती हैं।
नागरिकों के लिए ई-गवर्नमेंट के अन्य लाभों में निम्नलिखित शामिल हैं:- बहुभाषी सूचना सारांश, डिसेबल्ड-फ्रेंडली नेवीगेशन, सारांश तक पहुंच एवं सरकार से जुड़ी सूचना, सेवाओं तथा योजनाओं में नवीनतम परिवर्तनों की नियमित जानकारी।

*इसके अतिरिक्त, (ई-गवर्न) सेवाएं मुद्रित कागजों की आवश्यकता को भी कम करेंगी; इसलिए, ये एक हरे-भरे ग्रह तथा धारणीय पारिस्थितिक प्रणाली में योगदान देती हैं।
*इंटरनेट का उपयोग देखो और अनुभव करो की दृष्टि से सूचना को आसानी से ढूंढा जा सकता है।
*खराब गवर्नेंस (जो निरंकुशता, भ्रष्टाचार, पारदर्शिता का साख की कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न करती हैं) को कई विकासशील देशों का एक बड़ा मुद्दा माना जाता है।
*(ई-गवर्न) का प्रभावी कार्यान्वयन, ई-गवर्नेंस को सक्षम बनाएगा, जिससे निरंकुशता तथा भ्रष्टाचार में कमी आने और सरकारी निर्णय लेने में नागरिकों के विनियोजन तथा सहभागिता के माध्यम से बेहतर पारदर्शिता एवं जिम्मेदारी की संभावना है।
*ई-गवर्नेंस को (ई-गवर्न) कार्यान्वयन का एक मूल वांछनीय परिणाम माना जा सकता है।

3.सरकार के प्रयास

हाल ही के दशकों में भारत ने आई.सी.टी. के क्षेत्र में बड़ी तीव्र गति से प्रगति की है। भारत सरकार ने भी स्वीकार किया है कि पिछले कुछ वर्षों में सरकारी सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने में आई.सी.टी. ने एक अहम भूमिका निभाई है। भारतीय संदर्भ में ई-गवर्नेंस इस तथ्य के कारण भी महत्वपूर्ण है कि आई.सी.टी. के प्रभावी उपयोग ने, सरकारी सेवाओं को विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों तथा भौगोलिक स्थलों तक पहुंचने योग्य बनाया है और इसलिए एक अधिक सम्मिलित समाज का सृजन करने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया है। सरकारी प्रशासन में आई.सी.टी. सेवाओं के प्रभावी उपयोग से दक्षता में महत्वपूर्ण सुधार आया है, संचार लागत में कमी आई है और विभिन्न विभागों की कार्य-पद्धति में पारदर्शिता में वृद्धि हुई है।

ई-गवर्नेंस के विभिन्न सकारात्मक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने ”सभी सरकारी सेवाएं आम आदमी को उसके स्थान पर सुगम्य कराने, सभी आम सेवाएं डिलीवरी केन्द्र उपलब्ध कराने तथा आम आदमी की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वहन करने योग्य लागत पर ऐसी सेवाओं की दक्षता, पारदर्शिता एवं विश्वसनीयता सुनिश्चित करने“ के ध्येय से मई, 2006 में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (एन.ई.जी.पी.) का अनुमोदन किया।

4.चुनोतियाँ

भारतीय संदर्भ में ई-गवर्नेंस के सफल कार्यान्वयन की राह में अनेक मुद्दे तथा चुनौतियां सामने खड़ी हैं। इन मुद्दों को तीन मुख्य वर्गों में विभाजित कर सकते हैं:तकनीकी, आर्थिक एवं सामाजिक मुद्दे।

*तकनीकी मुद्दे
गोयनीयता, सुरक्षा एवं बहु-मॉडल परस्पर प्रभाव शामिल हैं।

*आर्थिक मुद्दे
मुख्य रूप से निवेश पर लाभ और लागत, सम्पोषणीयता पुनः उपयोगिता एवं सुवाध्यता सहित तकनीकी मुद्दों की सुरक्षा से संबंधित है।

*सामाजिक मुद्दे
(ई-गवर्न)के विकास तथा व्यापक अंगीकरण के संबंध में अत्यधिक महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, इनमें जागरूकता अभाव और किसी बड़े वर्ग द्वारा इलेक्ट्रॉनिक रूप में दी गई सरकारी सेवाओं का अंगीकरण एवं उपयोग शामिल हैं। ई-गवर्नमेंट सेवाओं को ग्रामीण समाज तक पहुंचाने में अन्य चुनौतियां हैं।

5. सुझाव

ऐसी चुनौतियों पर नियंत्रण करने के लिए स्थानीय आवश्यकताओं का मूल्यांकन करने और इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए (ई-गवर्न) समाधानों को प्रचलन में लाने, ग्रामीण एवं दूरस्थ इलाकों में रहने वाले जन समुदाय से सम्पर्क का प्रावधान करने, स्थानीय भाषाओं में वेब सार का विकास करने और एक मानव संसाधन ज्ञान बल का निर्माण करने की आवश्यकता है।

ऐसे मुद्दों तथा चुनौतियों पर काबू प्राप्त करने के लिए अनुसंधानकर्ताओं, प्रेक्टिसनरों तथा सरकारी एजेंसियों को, (ई-गवर्न) के व्यापक विकास तथा विस्तार में सहायक अवसरो का विकास करना आवश्यक है।

Wednesday, 11 June 2014

अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह

अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह

अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह, भारत का एक केन्द्र शासित प्रदेश है। ये बंगाल की खाड़ी के दक्षिण में हिन्द महासागर में स्थित है। अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह लगभग 572 छोटे बड़े द्वीपों से मिलकर बना है जिनमें से सिर्फ कुछ ही द्वीपों पर लोग रहते हैं। यहाँ की राजधानी पोर्ट ब्लेयर है। २६ दिसंबर २००४ को सुनामी लहरों के कहर से इस द्वीप पर ६००० से ज्यादा लोग मारे गये।

अण्डमान शब्द मलय भाषा के शब्द हांदुमन से आया है जो हिन्दु देवता हनुमान के नाम का परिवर्तित रुप है। निकोबार शब्द भी इसी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है नग्न लोगों की भूमि।

सेलुलर जेल - अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत के स्वतंत्रता सैनानियों पर किए गए अत्याचारों की मूक गवाह इस जेल की नींव 1897 में रखी गई थी।

अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह

अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह

अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह, भारत का एक केन्द्र शासित प्रदेश है। ये बंगाल की खाड़ी के दक्षिण में हिन्द महासागर में स्थित है। अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह लगभग 572 छोटे बड़े द्वीपों से मिलकर बना है जिनमें से सिर्फ कुछ ही द्वीपों पर लोग रहते हैं। यहाँ की राजधानी पोर्ट ब्लेयर है। २६ दिसंबर २००४ को सुनामी लहरों के कहर से इस द्वीप पर ६००० से ज्यादा लोग मारे गये।

अण्डमान शब्द मलय भाषा के शब्द हांदुमन से आया है जो हिन्दु देवता हनुमान के नाम का परिवर्तित रुप है। निकोबार शब्द भी इसी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है नग्न लोगों की भूमि।

सेलुलर जेल - अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत के स्वतंत्रता सैनानियों पर किए गए अत्याचारों की मूक गवाह इस जेल की नींव 1897 में रखी गई थी।

अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह

अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह

अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह, भारत का एक केन्द्र शासित प्रदेश है। ये बंगाल की खाड़ी के दक्षिण में हिन्द महासागर में स्थित है। अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह लगभग 572 छोटे बड़े द्वीपों से मिलकर बना है जिनमें से सिर्फ कुछ ही द्वीपों पर लोग रहते हैं। यहाँ की राजधानी पोर्ट ब्लेयर है। २६ दिसंबर २००४ को सुनामी लहरों के कहर से इस द्वीप पर ६००० से ज्यादा लोग मारे गये।

अण्डमान शब्द मलय भाषा के शब्द हांदुमन से आया है जो हिन्दु देवता हनुमान के नाम का परिवर्तित रुप है। निकोबार शब्द भी इसी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है नग्न लोगों की भूमि।

सेलुलर जेल - अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत के स्वतंत्रता सैनानियों पर किए गए अत्याचारों की मूक गवाह इस जेल की नींव 1897 में रखी गई थी।

मंगल (Mars):

मंगल (Mars):

मंगल के वायुमंडल में 95 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड, 3 प्रतिशत नाइट्रोजन, 2 प्रतिशत ऑर्गन गैस पाई जाती हैं। मिट्टी में आयरन ऑक्साइड होने की वजह से यह ग्रह लाल रंग का दिखाई देता है।मंगल का एक दिन 24 घण्टे 37 मिनट के बराबर होता है। यह पृथ्वी के एक दिन के लगभग बराबर है। किंतु इसका एक वर्ष लगभग 686 दिनों का होता है। मंगल अत्यन्त ठंडा ग्रह है जिसका औसत तापमान -90ष् से -230ष् तक होता है। मंगल का वायुमंडल अत्यन्त विरल है। मंगल पर अक्सर धूल भरी आंधियाँ चलती हैं। मंगल ग्रह का सबसे विस्मयकारी तथ्य है कि यहाँ कभी महासागर स्थित थे और यहां का वायुमंडल काफी घना था। इस वायुमंडल की उपस्थिति का कारण ज्वालामुखियों से निकलने वाली गैसें रही होंगी। इस वायुमण्डल के कारण इसकी सतह पर जल उपस्थित रहा होगा। अंतरिक्षयान 'पाथफाइंडरÓ द्वारा भेजे गए चित्रों से ज्ञात हुआ है कि करोड़ों वर्ष पूर्व मंगल पर जल अत्याधिक मात्रा में पाया जाता था। नासा के 'मार्स ग्लोबल सर्वेयरÓ ने मंगल की विषुवत रेखा के निकट प्राचीन पनतापीय प्रणालव के स्पष्टï प्रमाण प्रस्तुत किए हैं।

Friday, 19 July 2013

SIMPLE GK

Q.Cuba is in ?
(A) Pacific ocean 
(B) Red sea 
(C) Black sea 
(D) Atlantic ocean
ANS-D

Q.Which planet of the solar system spins on its axis at the fastest rate ?
(A) Saturn
(B) Jupiter
(C) Mercury
(D) Earth
ANS-B

Q.The seasonal contrasts are maximum in ?
(A) High latitudes
(B) Mid latitudes
(C) Low latitudes
(D) Sub tropics
ANS-B

Q.Australia was discovered by ?
(A) Columbus
(B) James Smith
(C) Vasco Da Gama
(D) James CoOK
ANS-D

Wednesday, 3 July 2013

HISTORY QUIZ

Q.What is the correct chronological order in which the following appeared in India?
I. Gold coins. 2. Punch-marked silver coins.
3. Iron plough. 4. Urban culture.
Select the correct answer using the codes given:
ANS-3421
Q2.The medieval Indian writer who refers to the discovery of America is
ANS-Abul Fazl
Q3.Assertion (A) : Muhammad bin Tughlaq left Delhi, and, for two years lived in a camp called Swarga-dwari.
Reason (R) : At that time, Delhi was ravaged by a form of plague and many people died.
ANS-Both A and R are true and R is the correct explanation of A

Q4.With reference to medieval Indian rulers, which one of the following statements is correct?
ANS-Firoz Tughlaq set up a separate department of slaves
Q5.Mate" Lilt I with List II and select the correct answer asing the codes given below the lilts:
List I List II
A. Surendranath Bannerjee 1. Hind Swaraj
B. M. K. Gandhi                  2. The Indian Struggle
C. Subhash Chandra            3. Autobiographical
Bose                                         Writings
D. LajpatRai                       4. A Nation in Making
ANS-4123

Q6.Which one of the following is an important historical novel written during the latter half of the nineteenth century ?
ANS- Durgesh Nandini
Q7.The educated middle class in India?
ANS-remained neutral to the revolt of 1857
Q8.What is the correct sequence of the following events?
1. Tilak's Home Rule League.
2. Komagatamaru Inqident.
3. Mahatama gandhi’s arrival in india.
Select the correct answer using the codes given below the lists:   
ANS-231

Q9.Which one of the following pairs is not correctly matched?
ANS-Vernacular Press Act -Curzon

10.Which one of the following revolts was made famous by Bankim Chandra Chatterjee in hisnoval Anand Math?
ANS- Sanyasi rebellion
Q11.The educated middle class in India?
ANS- remained neutral to the revolt of 1857
12.Who among the following organized the famous Chittagong armoury raid?
ANS-Surya Sen
13.With which one of the following mountain tribes did the British first come into contact with after the grant of Diwani in the year 1765?
ANS-Khasis
14.During the Indian Freedom Struggle, who among the following proposed that Swaraj should be defined as complete independence free from all foreign control?
ANS-Maulana Hasrat Mohani
15.Who among the following Europeans were the last to come to preindependence India as traders?
ANS-French