आर्थिक शक्ति बिना कैसे सामरिक सुरक्षा!
(भारत चीन सम्बन्धो का तुलनात्मक विश्लेषण)
वैश्विक व्यवस्था और खासतौर से अर्थ-व्यवस्था का प्रभावशाली हिस्सा बनने के लिए भारत को अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और सामरिक रिश्तों को भी पुनर्परिभाषित करना होगा। जो देश आर्थिक रूप से सबल हैं, वे सामरिक रूप से भी मजबूत हैं। उनकी संस्कृति ही दुनिया के सिर पर चढ़कर बोलती है। संयुक्त राष्ट्र के गठन के समय अंग्रेजी और फ्रेंच दो भाषाओं को औपचारिक रूप से उसकी भाषाएं माना जाता था। 1948 में इसमें रूसी भाषा जुड़ी, इसके बाद स्पेनिश। सत्तर के दशक में चीनी भाषा शामिल हुई। उसके बाद अरबी को आधिकारिक भाषा बनाया गया। सत्तर के दशक में पेट्रोलियम की ताकत ने अरबी को नियंतण्र भाषा का दर्जा दिलाया था। सन 1977 में जब तत्कालीन विदेशमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था, तब से यह मांग की जा रही है कि हिंदी को भी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाना चाहिए। उसे आधिकारिक भाषा बनाने के लिए भारी खर्च की व्यवस्था करनी होगी इसलिए हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा नहीं बनाया जा सकता। यानी अपनी बात कहने का अधिकार उन्हें ज्यादा है जिनके पास सामथ्र्य है। इस लेख का विषय भाषा नहीं राजनय है। गौर करें, हाल में हमारी विदेश नीति में दृढ़ता के स्वर बढ़े हैं और उसके अंतर्विरोध भी सामने आए हैं। हम दुनिया में अपनी जगह बनाना चाहते हैं पर हमारे कुछ पड़ोसी अडंगा लगा रहे हैं। ऐसा क्यों? शब्दों की दृढ़ता का तभी मतलब है जब आप किसी को फायदा या नुकसान पहुंचाने की स्थिति में हों। देखना होगा कि नियंतण्र आर्थिक मंच पर भारत की भूमिका क्या है! इस महीने ब्रिसबेन में हो रहे जी-20 के शिखर सम्मेलन में देश के नए नेतृत्व के हौसलों की परीक्षा होगी। पर उसके पहले 10-11 नवम्बर को बीजिंग में एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग संगठन का शिखर सम्मेलन है। चीन ने भारत को इसमें भाग लेने का निमंतण्रदिया है, पर सच यह है कि कोशिशों के बावजूद हम इस महत्वपूर्ण फोरम के मेंबर नहीं हैं। प्रशांत महासागर की अर्थव्यवस्था में हमारी भूमिका नहीं है। इस महीने के अंत में काठमांडू में दक्षिण एशिया के देशों का शिखर सम्मेलन है। यहां हमारी भूमिका है। मोदी सरकार की विदेश नीति की एक परीक्षा यहां भी होगी। अब दूसरी दिशा में देखें। देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश का दौर आ रहा है। अगले चार-पांच सालों में हम एक हजार अरब डॉलर से ज्यादा की राशि अपने इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर खर्च करने वाले हैं। इसमें हमें अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप के देशों का सहयोग मिलेगा, क्योंकि इसमें उनका लाभ भी है। बाईस साल पहले जब भारत को आसियान देशों का सेक्टोरल डायलॉग पार्टनर बनाया गया, तब यह कोई विस्मयकारी बात नहीं थी। इसमें सिर्फ राजनीतिक कारणों से देरी हुई थी। भारत के महत्व को उस वक्त कम करके आंका गया था। इस घटना के तीन साल पहले 1989 में जब एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग संगठन (एपेक) बनाया जा रहा था, तब उसमें भारत को सदस्य बनाने की बात सोची भी नहीं गई। हमें अपने आर्थिक महत्व को बढ़ाना और दुनिया के सामने साबित करना होगा। चीन की पहल पर बन रहे एशिया इंफ्रास्ट्रक्चर बैंक में भारत भी एक साझीदार और पहला अध्यक्ष है। यह पहल आर्थिक-राजनय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। बहरहाल हाल में गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने जिस तरह चीनी धमकी का जवाब दिया है, उसका अंदाजनया है। ‘कड़कदार’ जवाब देने का भारत आदी नहीं रहा है। सीमा पर आधारभूत सुविधाओं को विकसित करने के बारे में उन्होंने जो कहा बातें पुरानी हैं, पर अंदाज नया है। इस अंदाज में भारत अब तक नहीं बोलता था। उन्होंने कहा, ‘हम ऐसी आधारभूत गतिविधियां चलाएंगे, जिन्हें पिछले 60 सालों में नहीं किया गया। चीनियों को मेरे बयान से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। वे मुझे मेरा काम करने से नहीं रोक सकते।’ अरु णाचल के जन-प्रतिनिधि के नाते उनका यह बयान सांकेतिक है। पिछले कुछ वर्षो से चीन की स्टैपल्ड वीजा नीति के कारण सामान्य भारतीय खुद को अपमानित महसूस करता रहा है और चाहता है कि चीन को उसी की भाषा में जवाब मिलना चाहिए। रिजिजू ने ऐसा ही किया। हाल में भारतीय मीडिया में दो-तीन ऐसी जानकारियां सामने आई हैं, जिन्हें लेकर बेचैनी है। सितम्बर में जिस वक्त चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए थे, कोलम्बो के बंदरगाह पर चीन की पनडुब्बी और हिंद महासागर क्षेत्र में उसके कुछ पोत विचरण कर रहे थे। चीन ने सफाई दी कि वह पनडुब्बी अदन की खाड़ी में समुद्री डाकुओं के खिलाफ अभियान चलाने जा रही थी। पर इधर खबर है कि पिछले हफ्ते भी चीन की पनडुब्बी श्रीलंका के सागर तट पर देखी गई। इस घटनाक्रम से दो निष्कर्ष निकलते हैं। एक, हिंद महासागर में चीन की सक्रियता बढ़ी है और दूसरे इस पहलकदमी को श्रीलंका, मालदीव व पाकिस्तान का परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन हासिल है। पड़ोसी देशों का यह अतिशय चीन-प्रेम क्यों? पाकिस्तान की बात समझ में आती है पर श्रीलंका और मालदीव का भारत से किस बात पर टकराव है? चीन का जोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर है। ज्यादातर विकासशील देशों को इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए पैसा और तकनीकी मदद चाहिए। चीन के पास दोनों चीजें हैं। भारत के पड़ोसी देशों को वह अंतरिक्ष तकनीक से जोड़ रहा है। यह काम हमने क्यों नहीं किया? शायद इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण एशियाई देशों के लिए एक उपग्रह तैयार करने की सलाह इसरो को दी है। भारत ऐसा कर सका तो यह मास्टर स्ट्रोक होगा। चीन और श्रीलंका के खुल्लम-खुल्ला भाईचारे के बरक्स भारत ने भी चीन के पड़ोस में रिश्ते बनाने शुरू कर दिए हैं1 दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज के समझौते पर मेरे बयान से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। वे मुझे मेरा काम करने से नहीं रोक सकते।’ अरु णाचल के जन-प्रतिनिधि के नाते उनका यह बयान सांकेतिक है। पिछले कुछ वर्षो से चीन की स्टैपल्ड वीजा नीति के कारण सामान्य भारतीय खुद को अपमानित महसूस करता रहा है और चाहता है कि चीन को उसी की भाषा में जवाब मिलना चाहिए। रिजिजू ने ऐसा ही किया। हाल में भारतीय मीडिया में दो-तीन ऐसी जानकारियां सामने आई हैं, जिन्हें लेकर बेचैनी है। सितम्बर में जिस वक्त चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए थे, कोलम्बो के बंदरगाह पर चीन की पनडुब्बी और हिंद महासागर क्षेत्र में उसके कुछ पोत विचरण कर रहे थे। चीन ने सफाई दी कि वह पनडुब्बी अदन की खाड़ी में समुद्री डाकुओं के खिलाफ अभियान चलाने जा रही थी। पर इधर खबर है कि पिछले हफ्ते भी चीन की पनडुब्बी श्रीलंका के सागर तट पर देखी गई। इस घटनाक्रम से दो निष्कर्ष निकलते हैं। एक, हिंद महासागर में चीन की सक्रियता बढ़ी है और दूसरे इस पहलकदमी को श्रीलंका, मालदीव व पाकिस्तान का परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन हासिल है। पड़ोसी देशों का यह अतिशय चीन-प्रेम क्यों? पाकिस्तान की बात समझ में आती है पर श्रीलंका और मालदीव का भारत से किस बात पर टकराव है? चीन का जोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर है। ज्यादातर विकासशील देशों को इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए पैसा और तकनीकी मदद चाहिए। चीन के पास दोनों चीजें हैं। भारत के पड़ोसी देशों को वह अंतरिक्ष तकनीक से जोड़ रहा है। यह काम हमने क्यों नहीं किया? शायद इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण एशियाई देशों के लिए एक उपग्रह तैयार करने की सलाह इसरो को दी है। भारत ऐसा कर सका तो यह मास्टर स्ट्रोक होगा। चीन और श्रीलंका के खुल्लम-खुल्ला भाईचारे के बरक्स भारत ने भी चीन के पड़ोस में रिश्ते बनाने शुरू कर दिए हैं1 दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज के समझौते पर दस्तखत करके भारत ने चीन को नाखुश करने वाला कदम उठाया है। भारत यात्रा के दौरान वियतनामी प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि चीन के विरोध के बावजूद उनका देश भारत को तेल खोज का काम दे रहा है। दोनों के बीच सामरिक सहयोग के समझौते के तहत वियतनाम को भारत नौसैनिक पोत देगा। शायद ब्रह्मोस मिसाइल का पहला निर्यात भी वियतनाम को होगा। दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में वियतनाम नई उभरती ताकत है। यहां सागर की सीमा को लेकर ब्रूनेई, चीन, ताइवान, मलयेशिया, फिलिपींस और वियतनाम के अपने-अपने दावे हैं। ऐसा विवाद भारत के साथ न श्रीलंका का है और न मालदीव का। फिर भी वे भारत की मुखालफत क्यों कर रहे हैं? स्वाभाविक है चीन अपनी आर्थिक शक्ति का फायदा उठा रहा है। एक समय श्रीलंका का सबसे बड़ा मददगार जापान था पर अब वह चीन से पीछे है। नवम्बर 2010 में हम्बनटोटा बन्दरगाह का उद्घाटन करते हुए राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे ने कहा था, चीन और भारत के नेतृत्व में तेजी से विकसित होते एशिया के साथ हमारा देश भी आगे बढ़ेगा। यह वक्तव्य शायद भारत को चिढ़ाने के लिए था। तकरीबन डेढ़ अरब डॉलर की राशि से विकसित बन्दरगाह श्रीलंका और चीन के मैत्री सम्बन्धों की कहानी है। चीन ने केवल हम्बनटोटा बंदरगाह बनाने में ही मदद नहीं दी, उसके नए बंदरगाह, हवाई अड्डों, सड़कों और रेलवे के निर्माण की योजनाएं भी बन रहीं हैं। कुछ साल पहले तक श्रीलंका में भारत में बनी रेलगाड़ियां चलती थीं, पर अब चीनी रेलगाड़ियाँ चल रहीं हैं। पाकिस्तान-ईरान सीमा पर चीन ने पाकिस्तान के लिए ग्वादर बंदरगाह बना उसका संचालन भी हाथ में ले लिया है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित क्षेत्र में चीन सड़क बना रहा है, जो उसके जिनिशयांग प्रांत को पाकिस्तान से जोड़ेगी। सड़क से चीन को अरब सागर तक जाने का जमीनी रास्ता मिल जाएगा। यह संयोग नहीं कि मालदीव के माले हवाई अड्डे का काम भारतीय कम्पनी जीएमआर से ले लिया गया। चीन के राष्ट्रपति सितम्बर में भारत आने के पहले मालदीव गए थे, जहां सरकार ने हवाई अड्डे के विस्तार का काम चीनी कम्पनी को सौंप दिया। इनके मूल में हालांकि चीन के आर्थिक विस्तार की मनोकामना है, पर आर्थिक विस्तार तभी संभव है जब सामरिक शक्ति सहारा दे। यह बात चीन पर जितनी लागू होती है, उतनी ही हम पर भी। केवल नैतिक शक्ति के बल पर सम्मान नहीं मिलता। उसका ठोस आधार होना चाहिए।
(भारत चीन सम्बन्धो का तुलनात्मक विश्लेषण)
वैश्विक व्यवस्था और खासतौर से अर्थ-व्यवस्था का प्रभावशाली हिस्सा बनने के लिए भारत को अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और सामरिक रिश्तों को भी पुनर्परिभाषित करना होगा। जो देश आर्थिक रूप से सबल हैं, वे सामरिक रूप से भी मजबूत हैं। उनकी संस्कृति ही दुनिया के सिर पर चढ़कर बोलती है। संयुक्त राष्ट्र के गठन के समय अंग्रेजी और फ्रेंच दो भाषाओं को औपचारिक रूप से उसकी भाषाएं माना जाता था। 1948 में इसमें रूसी भाषा जुड़ी, इसके बाद स्पेनिश। सत्तर के दशक में चीनी भाषा शामिल हुई। उसके बाद अरबी को आधिकारिक भाषा बनाया गया। सत्तर के दशक में पेट्रोलियम की ताकत ने अरबी को नियंतण्र भाषा का दर्जा दिलाया था। सन 1977 में जब तत्कालीन विदेशमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था, तब से यह मांग की जा रही है कि हिंदी को भी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाना चाहिए। उसे आधिकारिक भाषा बनाने के लिए भारी खर्च की व्यवस्था करनी होगी इसलिए हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा नहीं बनाया जा सकता। यानी अपनी बात कहने का अधिकार उन्हें ज्यादा है जिनके पास सामथ्र्य है। इस लेख का विषय भाषा नहीं राजनय है। गौर करें, हाल में हमारी विदेश नीति में दृढ़ता के स्वर बढ़े हैं और उसके अंतर्विरोध भी सामने आए हैं। हम दुनिया में अपनी जगह बनाना चाहते हैं पर हमारे कुछ पड़ोसी अडंगा लगा रहे हैं। ऐसा क्यों? शब्दों की दृढ़ता का तभी मतलब है जब आप किसी को फायदा या नुकसान पहुंचाने की स्थिति में हों। देखना होगा कि नियंतण्र आर्थिक मंच पर भारत की भूमिका क्या है! इस महीने ब्रिसबेन में हो रहे जी-20 के शिखर सम्मेलन में देश के नए नेतृत्व के हौसलों की परीक्षा होगी। पर उसके पहले 10-11 नवम्बर को बीजिंग में एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग संगठन का शिखर सम्मेलन है। चीन ने भारत को इसमें भाग लेने का निमंतण्रदिया है, पर सच यह है कि कोशिशों के बावजूद हम इस महत्वपूर्ण फोरम के मेंबर नहीं हैं। प्रशांत महासागर की अर्थव्यवस्था में हमारी भूमिका नहीं है। इस महीने के अंत में काठमांडू में दक्षिण एशिया के देशों का शिखर सम्मेलन है। यहां हमारी भूमिका है। मोदी सरकार की विदेश नीति की एक परीक्षा यहां भी होगी। अब दूसरी दिशा में देखें। देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश का दौर आ रहा है। अगले चार-पांच सालों में हम एक हजार अरब डॉलर से ज्यादा की राशि अपने इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर खर्च करने वाले हैं। इसमें हमें अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप के देशों का सहयोग मिलेगा, क्योंकि इसमें उनका लाभ भी है। बाईस साल पहले जब भारत को आसियान देशों का सेक्टोरल डायलॉग पार्टनर बनाया गया, तब यह कोई विस्मयकारी बात नहीं थी। इसमें सिर्फ राजनीतिक कारणों से देरी हुई थी। भारत के महत्व को उस वक्त कम करके आंका गया था। इस घटना के तीन साल पहले 1989 में जब एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग संगठन (एपेक) बनाया जा रहा था, तब उसमें भारत को सदस्य बनाने की बात सोची भी नहीं गई। हमें अपने आर्थिक महत्व को बढ़ाना और दुनिया के सामने साबित करना होगा। चीन की पहल पर बन रहे एशिया इंफ्रास्ट्रक्चर बैंक में भारत भी एक साझीदार और पहला अध्यक्ष है। यह पहल आर्थिक-राजनय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। बहरहाल हाल में गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने जिस तरह चीनी धमकी का जवाब दिया है, उसका अंदाजनया है। ‘कड़कदार’ जवाब देने का भारत आदी नहीं रहा है। सीमा पर आधारभूत सुविधाओं को विकसित करने के बारे में उन्होंने जो कहा बातें पुरानी हैं, पर अंदाज नया है। इस अंदाज में भारत अब तक नहीं बोलता था। उन्होंने कहा, ‘हम ऐसी आधारभूत गतिविधियां चलाएंगे, जिन्हें पिछले 60 सालों में नहीं किया गया। चीनियों को मेरे बयान से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। वे मुझे मेरा काम करने से नहीं रोक सकते।’ अरु णाचल के जन-प्रतिनिधि के नाते उनका यह बयान सांकेतिक है। पिछले कुछ वर्षो से चीन की स्टैपल्ड वीजा नीति के कारण सामान्य भारतीय खुद को अपमानित महसूस करता रहा है और चाहता है कि चीन को उसी की भाषा में जवाब मिलना चाहिए। रिजिजू ने ऐसा ही किया। हाल में भारतीय मीडिया में दो-तीन ऐसी जानकारियां सामने आई हैं, जिन्हें लेकर बेचैनी है। सितम्बर में जिस वक्त चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए थे, कोलम्बो के बंदरगाह पर चीन की पनडुब्बी और हिंद महासागर क्षेत्र में उसके कुछ पोत विचरण कर रहे थे। चीन ने सफाई दी कि वह पनडुब्बी अदन की खाड़ी में समुद्री डाकुओं के खिलाफ अभियान चलाने जा रही थी। पर इधर खबर है कि पिछले हफ्ते भी चीन की पनडुब्बी श्रीलंका के सागर तट पर देखी गई। इस घटनाक्रम से दो निष्कर्ष निकलते हैं। एक, हिंद महासागर में चीन की सक्रियता बढ़ी है और दूसरे इस पहलकदमी को श्रीलंका, मालदीव व पाकिस्तान का परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन हासिल है। पड़ोसी देशों का यह अतिशय चीन-प्रेम क्यों? पाकिस्तान की बात समझ में आती है पर श्रीलंका और मालदीव का भारत से किस बात पर टकराव है? चीन का जोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर है। ज्यादातर विकासशील देशों को इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए पैसा और तकनीकी मदद चाहिए। चीन के पास दोनों चीजें हैं। भारत के पड़ोसी देशों को वह अंतरिक्ष तकनीक से जोड़ रहा है। यह काम हमने क्यों नहीं किया? शायद इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण एशियाई देशों के लिए एक उपग्रह तैयार करने की सलाह इसरो को दी है। भारत ऐसा कर सका तो यह मास्टर स्ट्रोक होगा। चीन और श्रीलंका के खुल्लम-खुल्ला भाईचारे के बरक्स भारत ने भी चीन के पड़ोस में रिश्ते बनाने शुरू कर दिए हैं1 दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज के समझौते पर मेरे बयान से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। वे मुझे मेरा काम करने से नहीं रोक सकते।’ अरु णाचल के जन-प्रतिनिधि के नाते उनका यह बयान सांकेतिक है। पिछले कुछ वर्षो से चीन की स्टैपल्ड वीजा नीति के कारण सामान्य भारतीय खुद को अपमानित महसूस करता रहा है और चाहता है कि चीन को उसी की भाषा में जवाब मिलना चाहिए। रिजिजू ने ऐसा ही किया। हाल में भारतीय मीडिया में दो-तीन ऐसी जानकारियां सामने आई हैं, जिन्हें लेकर बेचैनी है। सितम्बर में जिस वक्त चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए थे, कोलम्बो के बंदरगाह पर चीन की पनडुब्बी और हिंद महासागर क्षेत्र में उसके कुछ पोत विचरण कर रहे थे। चीन ने सफाई दी कि वह पनडुब्बी अदन की खाड़ी में समुद्री डाकुओं के खिलाफ अभियान चलाने जा रही थी। पर इधर खबर है कि पिछले हफ्ते भी चीन की पनडुब्बी श्रीलंका के सागर तट पर देखी गई। इस घटनाक्रम से दो निष्कर्ष निकलते हैं। एक, हिंद महासागर में चीन की सक्रियता बढ़ी है और दूसरे इस पहलकदमी को श्रीलंका, मालदीव व पाकिस्तान का परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन हासिल है। पड़ोसी देशों का यह अतिशय चीन-प्रेम क्यों? पाकिस्तान की बात समझ में आती है पर श्रीलंका और मालदीव का भारत से किस बात पर टकराव है? चीन का जोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर है। ज्यादातर विकासशील देशों को इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए पैसा और तकनीकी मदद चाहिए। चीन के पास दोनों चीजें हैं। भारत के पड़ोसी देशों को वह अंतरिक्ष तकनीक से जोड़ रहा है। यह काम हमने क्यों नहीं किया? शायद इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण एशियाई देशों के लिए एक उपग्रह तैयार करने की सलाह इसरो को दी है। भारत ऐसा कर सका तो यह मास्टर स्ट्रोक होगा। चीन और श्रीलंका के खुल्लम-खुल्ला भाईचारे के बरक्स भारत ने भी चीन के पड़ोस में रिश्ते बनाने शुरू कर दिए हैं1 दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज के समझौते पर दस्तखत करके भारत ने चीन को नाखुश करने वाला कदम उठाया है। भारत यात्रा के दौरान वियतनामी प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि चीन के विरोध के बावजूद उनका देश भारत को तेल खोज का काम दे रहा है। दोनों के बीच सामरिक सहयोग के समझौते के तहत वियतनाम को भारत नौसैनिक पोत देगा। शायद ब्रह्मोस मिसाइल का पहला निर्यात भी वियतनाम को होगा। दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में वियतनाम नई उभरती ताकत है। यहां सागर की सीमा को लेकर ब्रूनेई, चीन, ताइवान, मलयेशिया, फिलिपींस और वियतनाम के अपने-अपने दावे हैं। ऐसा विवाद भारत के साथ न श्रीलंका का है और न मालदीव का। फिर भी वे भारत की मुखालफत क्यों कर रहे हैं? स्वाभाविक है चीन अपनी आर्थिक शक्ति का फायदा उठा रहा है। एक समय श्रीलंका का सबसे बड़ा मददगार जापान था पर अब वह चीन से पीछे है। नवम्बर 2010 में हम्बनटोटा बन्दरगाह का उद्घाटन करते हुए राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे ने कहा था, चीन और भारत के नेतृत्व में तेजी से विकसित होते एशिया के साथ हमारा देश भी आगे बढ़ेगा। यह वक्तव्य शायद भारत को चिढ़ाने के लिए था। तकरीबन डेढ़ अरब डॉलर की राशि से विकसित बन्दरगाह श्रीलंका और चीन के मैत्री सम्बन्धों की कहानी है। चीन ने केवल हम्बनटोटा बंदरगाह बनाने में ही मदद नहीं दी, उसके नए बंदरगाह, हवाई अड्डों, सड़कों और रेलवे के निर्माण की योजनाएं भी बन रहीं हैं। कुछ साल पहले तक श्रीलंका में भारत में बनी रेलगाड़ियां चलती थीं, पर अब चीनी रेलगाड़ियाँ चल रहीं हैं। पाकिस्तान-ईरान सीमा पर चीन ने पाकिस्तान के लिए ग्वादर बंदरगाह बना उसका संचालन भी हाथ में ले लिया है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित क्षेत्र में चीन सड़क बना रहा है, जो उसके जिनिशयांग प्रांत को पाकिस्तान से जोड़ेगी। सड़क से चीन को अरब सागर तक जाने का जमीनी रास्ता मिल जाएगा। यह संयोग नहीं कि मालदीव के माले हवाई अड्डे का काम भारतीय कम्पनी जीएमआर से ले लिया गया। चीन के राष्ट्रपति सितम्बर में भारत आने के पहले मालदीव गए थे, जहां सरकार ने हवाई अड्डे के विस्तार का काम चीनी कम्पनी को सौंप दिया। इनके मूल में हालांकि चीन के आर्थिक विस्तार की मनोकामना है, पर आर्थिक विस्तार तभी संभव है जब सामरिक शक्ति सहारा दे। यह बात चीन पर जितनी लागू होती है, उतनी ही हम पर भी। केवल नैतिक शक्ति के बल पर सम्मान नहीं मिलता। उसका ठोस आधार होना चाहिए।
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