भारत वियतनाम सम्बन्ध
शीत युद्ध के बाद भारत ने लुक ईस्ट नीति पर अमल शुरू किया, लेकिन अन्य तमाम वजहों से वियतनाम वह महत्व नहीं हासिल कर सका जैसा कि अब दिख रहा है। पिछले दशक में वियतनाम के साथ भारत के द्विपक्षीय रिश्तों में धीमी गति से मजबूती आनी शुरू हुई, लेकिन यह सदैव ही कुछ हिचक और ङिाझक के साथ एक दायरे तक सीमित रही। चीन के मद्देनजर भारतीय हितों के लिहाज से आज दोनों देशों के बीच संबंधों का विस्तार हुआ है। दक्षिण चीन सागर विवाद के चलते दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र इस समय काफी संवेदनशील हो गया है। दक्षिण चीन सागर में तीन क्षेत्रीय देशों वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया के भूभागों को लेकर बीजिंग द्वारा दावा किया जा रहा है। इस मुद्दे पर चीन के लगातार मुखर और आक्रामक होते रुख को देखते हुए वैश्विक समुदाय भी खुद को असहज पा रहा है, लेकिन चीनी नौसेना की शक्ति को देखते हुए कोई भी उसका ताकत के साथ विरोध कर पाने की स्थिति में नहीं है। इस क्षेत्र में अमेरिका एक प्रमुख राजनीतिक और सैन्य शक्ति है, लेकिन इस मामले में सीधे-सीधे शामिल होने से वह भी कतरा रहा है। अमेरिका सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानून का आदर करने को कह रहा है। भारत भी इस मसले के शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में है। भारत वियतनाम के साथ इस क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन खोज गतिविधियों में शामिल है। वियतनाम के साथ धीरे-धीरे भारत के बढ़ते सहयोगी रिश्तों पर बीजिंग को आपत्ति है और इसके लिए वह गुस्सा भी दिखा रहा है। संप्रग के शासनकाल में दिल्ली ने सावधानी बरतते हुए इस मामले में संतुलन बनाए रखा। पिछले कुछ महीनों में स्थिति में बदलाव आया है और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ-साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का वियतनाम में स्वागत किया गया। इस तरह अब यह साफ हो चुका है कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रिश्ते राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हो
गए हैं। मोदी सरकार ने अब इसके संकेत दे दिए हैं कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रिश्ते समुद्री सुरक्षा के लिहाज से अधिक मजबूत हैं। वियतनामी प्रधानमंत्री की यात्र के बाद संयुक्त घोषणा में कहा गया कि रक्षा सहयोग के मामले में प्रगति संतोषजनक रही है। इसके साथ ही यह उम्मीद भी जताई गई है कि भारत और वियतनाम के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग को भविष्य में और अधिक मजबूत बनाया जाएगा। मोदी ने भी कहा कि वियतनाम के साथ हमारा रक्षा सहयोग हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारत वियतनाम के रक्षा और सुरक्षा बलों के आधुनिकीकरण के लिए प्रतिबद्ध है। इसके तहत प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार शामिल है। दोनों देशों के बीच संयुक्त युद्धाभ्यास के साथ-साथ रक्षा उपकरणों के आदान-प्रदान के मामले में भी सहयोग जारी रहेगा। इसके लिए शीघ्र ही 10 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया जाएगा ताकि वियतनाम भारत से नए नौसैनिक जहाज खरीद सके। अंतरिक्ष मामलों में भी दोनों देशों के बीच सहयोग स्थापित करने पर जोर दिया गया है, जिसमें वियतनाम के लिए उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ-साथ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए नागरिक परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी सहयोग किया जाएगा।
चीनी विदेश मंत्रलय ने भारत को चेताते हुए उसे वियतनाम के साथ विवाद के मामले से दूर रहने को कहा है। चीन ने दक्षिण चीन सागर में तेल के खोज कार्य के लिए भारत को आमंत्रित करने पर हनोई के फैसले का विरोध किया है। जापान की यात्र के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ देशों की विस्तारवादी नीतियों का उल्लेख किया था। उनका इशारा चीन की तरफ था। वियतनाम को ब्रव0161ाोस क्रूज मिसाइल देने के निर्णय से भारत-चीन संबंधों पर प्रभाव पड़ेगा। इसी माह प्रधानमंत्री मोदी 10 दिवसीय विदेशी दौर पर जा रहे हैं जिसमें वह म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया और फिजी जाएंगे। म्यांमार में उनका कार्यक्रम ईस्ट एशिया समिट में भाग लेना है। स्पष्ट है कि भारत के लिए पूरब महत्वपूर्ण बना रहेगा। जी-20 के नेता ब्रिस्बेन में शिखर बैठक में शिरकत करेंगे, जिसमें भारत-वियतनाम संबंधों पर सबकी निगाहें होंगी, जबकि चीन के अपने पड़ोसी देशों के साथ टकराव पर सभी को चिंता है।
शीत युद्ध के बाद भारत ने लुक ईस्ट नीति पर अमल शुरू किया, लेकिन अन्य तमाम वजहों से वियतनाम वह महत्व नहीं हासिल कर सका जैसा कि अब दिख रहा है। पिछले दशक में वियतनाम के साथ भारत के द्विपक्षीय रिश्तों में धीमी गति से मजबूती आनी शुरू हुई, लेकिन यह सदैव ही कुछ हिचक और ङिाझक के साथ एक दायरे तक सीमित रही। चीन के मद्देनजर भारतीय हितों के लिहाज से आज दोनों देशों के बीच संबंधों का विस्तार हुआ है। दक्षिण चीन सागर विवाद के चलते दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र इस समय काफी संवेदनशील हो गया है। दक्षिण चीन सागर में तीन क्षेत्रीय देशों वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया के भूभागों को लेकर बीजिंग द्वारा दावा किया जा रहा है। इस मुद्दे पर चीन के लगातार मुखर और आक्रामक होते रुख को देखते हुए वैश्विक समुदाय भी खुद को असहज पा रहा है, लेकिन चीनी नौसेना की शक्ति को देखते हुए कोई भी उसका ताकत के साथ विरोध कर पाने की स्थिति में नहीं है। इस क्षेत्र में अमेरिका एक प्रमुख राजनीतिक और सैन्य शक्ति है, लेकिन इस मामले में सीधे-सीधे शामिल होने से वह भी कतरा रहा है। अमेरिका सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानून का आदर करने को कह रहा है। भारत भी इस मसले के शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में है। भारत वियतनाम के साथ इस क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन खोज गतिविधियों में शामिल है। वियतनाम के साथ धीरे-धीरे भारत के बढ़ते सहयोगी रिश्तों पर बीजिंग को आपत्ति है और इसके लिए वह गुस्सा भी दिखा रहा है। संप्रग के शासनकाल में दिल्ली ने सावधानी बरतते हुए इस मामले में संतुलन बनाए रखा। पिछले कुछ महीनों में स्थिति में बदलाव आया है और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ-साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का वियतनाम में स्वागत किया गया। इस तरह अब यह साफ हो चुका है कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रिश्ते राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हो
गए हैं। मोदी सरकार ने अब इसके संकेत दे दिए हैं कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रिश्ते समुद्री सुरक्षा के लिहाज से अधिक मजबूत हैं। वियतनामी प्रधानमंत्री की यात्र के बाद संयुक्त घोषणा में कहा गया कि रक्षा सहयोग के मामले में प्रगति संतोषजनक रही है। इसके साथ ही यह उम्मीद भी जताई गई है कि भारत और वियतनाम के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग को भविष्य में और अधिक मजबूत बनाया जाएगा। मोदी ने भी कहा कि वियतनाम के साथ हमारा रक्षा सहयोग हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारत वियतनाम के रक्षा और सुरक्षा बलों के आधुनिकीकरण के लिए प्रतिबद्ध है। इसके तहत प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार शामिल है। दोनों देशों के बीच संयुक्त युद्धाभ्यास के साथ-साथ रक्षा उपकरणों के आदान-प्रदान के मामले में भी सहयोग जारी रहेगा। इसके लिए शीघ्र ही 10 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया जाएगा ताकि वियतनाम भारत से नए नौसैनिक जहाज खरीद सके। अंतरिक्ष मामलों में भी दोनों देशों के बीच सहयोग स्थापित करने पर जोर दिया गया है, जिसमें वियतनाम के लिए उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ-साथ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए नागरिक परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी सहयोग किया जाएगा।
चीनी विदेश मंत्रलय ने भारत को चेताते हुए उसे वियतनाम के साथ विवाद के मामले से दूर रहने को कहा है। चीन ने दक्षिण चीन सागर में तेल के खोज कार्य के लिए भारत को आमंत्रित करने पर हनोई के फैसले का विरोध किया है। जापान की यात्र के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ देशों की विस्तारवादी नीतियों का उल्लेख किया था। उनका इशारा चीन की तरफ था। वियतनाम को ब्रव0161ाोस क्रूज मिसाइल देने के निर्णय से भारत-चीन संबंधों पर प्रभाव पड़ेगा। इसी माह प्रधानमंत्री मोदी 10 दिवसीय विदेशी दौर पर जा रहे हैं जिसमें वह म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया और फिजी जाएंगे। म्यांमार में उनका कार्यक्रम ईस्ट एशिया समिट में भाग लेना है। स्पष्ट है कि भारत के लिए पूरब महत्वपूर्ण बना रहेगा। जी-20 के नेता ब्रिस्बेन में शिखर बैठक में शिरकत करेंगे, जिसमें भारत-वियतनाम संबंधों पर सबकी निगाहें होंगी, जबकि चीन के अपने पड़ोसी देशों के साथ टकराव पर सभी को चिंता है।
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