Thursday, 6 November 2014

काला धन क्या है पूरा मामला पुष्प रंजन का लेख

काला धन क्या है पूरा मामला
पुष्प रंजन का लेख

काले धन के साथ कई सारी त्रासद कथाएं जुड़ चुकी हैं। जर्मनी और फ्रांस दो ऐसे देश हैं, जिनके पास इसका जवाब नहीं कि उन्हें इसका लाइसेंस कैसे मिल गया कि काले धन से संबंधित चोरी की सीडी खऱीदें, और फि र उसे दुनिया की सरकारों को बेचें। अपने यहां अब तक किसी दल ने यह सवाल नहीं उठाया है कि क्या भारत सरकार चोरी का माल खऱीदने के लिए अधिकृत है? आधा सच बोलने वाले वित्त मंत्री अरूण जेटली, संप्रग के दौर के मंत्री के काले खाते की बात कर रहे हैं, लेकिन एनडीए के शासन में विदेश में कितना काला धन गया, यह सवाल वेताल की तरह डाल पर लटका हुआ है। 'ब्लैक मनी बमÓ में आधी-अधूरी सूचनाओं की रस्सी काफी लंबी लपेटी जा चुकी है।
बस्तर जि़ले के जगदलपुर का क्षेत्रफ ल 60 वर्गमील है। ठीक इसी के बराबर ऑस्ट्रिया और स्विट्जऱलैंड के बीच बसा एक देश है, लिश्टेन्स्टाइन। लिश्टेन्सटाइन को लेकर अपने यहां भ्रांति है कि यह देश स्विट्जऱलैंड, या जर्मनी का हिस्सा है। वैटिकन सिटी और मोनाको के बाद मुझे तीसरा ऐसा मुल्क मिला था, जहां एक दिन में पूरे देश की परिक्रमा की जा सकती है। दुनिया में ऐसे सत्रह देश हैं, जिनके क्षेत्रफल दो सौ वर्गमील से कम हैं। क्षेत्रफल में छोटे देशों की एक जैसी विशेषता यह है कि उनके यहां बैंकों का ज़बरदस्त कारोबार है, और काले धन खपाने के कारण ये 'टैक्स हीबेनÓ के नाम से कुख्यात हैं। लिश्टेन्स्टाइन का राज परिवार दुनिया के छठे सबसे अमीर शाही घराने में शुमार होता है। यहां की जनता का जीवन स्तर शानदार है। इसी लिश्टेन्स्टाइन के शासनाध्यक्ष प्रिंस एलोइस ने जर्मन सरकार पर चोरी का आरोप लगाया था।
लिश्टेन्स्टाइन के एलजीटी बैंक से एक सीडी की चोरी 2002 में हुई। बैंक की शिकायत पर हेनरिश कीबर नामक कर्मी, 2003 में पकड़ा गया। कीबर जमानत पर छूटा, और जर्मनी के बोखम नामक शहर में भूमिगत हो गया। 2006 में जर्मन खुफि या 'बीएनडीÓ ने ने उस सीडी के बदले कीबर को 42 लाख यूरो का पेमेंट किया था। इस सीडी में कोई 1400 लोगों के 'अकाउंट डिटेल्सÓ थे, जिनमें जर्मनों की संख्या 600 के आसपास थी। इस सीडी को भारत, ब्रिटेन, अमेरिका और बाक़ी देशों को बेचने के लिए जर्मनी 2007 में सक्रिय हुआ। 24 फ रवरी 2008 को ब्रिटेन ने 100 लोगों के बैंक डाटा पाने के लिए एक लाख पौंड जर्मनी को दिये। इस सीडी के लिए अमेरिका, आस्ट्रेलिया, फ ्रांस समेत यूरोप के दसियों देशों ने जर्मनी को करोड़ों यूरो दिये।
लिश्टेन्स्टाइन के प्रिंस एलोइस 14 से 20 नवंबर 2010 को भारत आये, उन्होंने यहां कृषि बीज व्यापार को विस्तार देने के अलावा सरकार से बैंक से संबंधित सूचनाओं को साझा करने पर सहमति दी। 28 मार्च 2013 को लिश्टेन्स्टाइन और भारत के बीच 'कराधान सूचना आदान-प्रदान समझौताÓ (टीआईइए) स्विट्जऱलैंड की राजधानी बर्न में हुआ। प्रिंस एलोइस एक बार फिर अक्टूबर 2013 में भारत आये। मुख्य विषय काले धन से संबंधित सूचनाएं थीं, जिन्हें सार्वजनिक न करना मनमोहन सरकार की मज़बूरी थी।
डाटा चोरी की खऱीद-बिक्री फ ्रांस ने भी की। 2007 में 'एचएसबीसी' बैंक की जिनेवा शाखा में हर्वे फेल्सियानी नामक एक सिस्टम इंजीनियर के बारे में पता चला वह ग़ायब है। फेल्सियानी पांच सीडी के साथ स्पेन में भूमिगत था, और वहीं से यूरोप, इजऱाइल की सरकारों से बैंक डाटा बेचने के लिए संपर्क साध रहा था। फेल्सियानी को मोसाद के जासूसों ने अगवा करने की कोशिश की थी। जेम्स बांड की फि ल्मों की तरह फेल्सियानी का भागना-छिपना जारी रहा। अंतत: जनवरी 2009 में हर्वे फेल्सियानी फ्रांसीसी खुफिया 'डीसीआरआईÓ के हत्थे चढ़ा। फ्रांस ने तीन चरणों की सुरक्षा देते हुए, उसे ऐसे ठिकाने पर भूमिगत कर दिया, जहां उस तक पहुंचना सबके लिए आसान नहीं था। इसके बाद शुरू हुआ सूचनाओं का सौदा। हर्वे फेल्सियानी की उन पांच सीडी में लगभग एक लाख तीस हज़ार खातेदारों का ब्योरा था, जिसे पाने के लिए दुनिया भर की सरकारें, उनकी खुफि या एजेंसियां सक्रिय हो गईं थीं। भारत को काले धन के बारे में दो अलग-अलग सूचनाओं के लिए जर्मनी और फ्र ांस की सरकारों को कितने करोड़ यूरो देने पड़े, इसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। संभव है बैंक सीडी की दलाली में कई लोगों ने अपने हाथ साफ किए हों।
ख़ैर, भारत और लिश्टेन्सटाइन के टैक्स इंफॉर्मेशन एक्सचेंज एग्रीमेंट(टीआईइए) में स्पष्ट लिखा गया है कि जांच और नाम की गोपनीयता बनी रहनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के हवाले से जिन 18 खातेदारों के नामों का खुलासा किया गया, उन सभी के अकाउंट्स लिश्टेंस्टाइन के एलजीटी बैंक में हैं, जिनमें से एक की मौत हो चुकी है। इन 18 खातेदारों के नामों को देखकर लगता है कि उनमें से अधिकांश लोगों के संबंध गुजरात से हैं, और ट्रस्ट चलाते हैं। सीबीआई, अपने बयान पर कायम रही कि स्विट्जऱलैंड के बैंकों में भारतीयों के 500 अरब डॉलर (लगभग 24.5 लाख करोड़ रुपये) काला धन जमा है। लेकिन स्विस नेशनल बैंक के अधिकारी बताते हैं कि भारतीयों के मात्र 14 हज़ार करोड रुपये ़(2.03 अरब स्विस फ ्रांक) स्विस बैंकों में जमा हैं। इस पर भरोसा न करने का कोई कारण नहीं नजऱ आता। क्या साढ़े चौबीस लाख करोड,़ और चौदह हज़ार करोड़ रुपये के बीच कोई मेल है? तो क्या सीबीआई, आयकर और रेवेन्यू इंटेलीजेंस के अधिकारी आल्प्स की वादियों में अल्पाइन के पत्ते गिनने जाते थे? यूरोप वाले इस पर हंसते हैं कि काले धन को लेकर भारतीय मीडिया में इतना भौकाल पैदा किया गया कि हर ओर भ्रम का वातावरण है। संपूर्ण सच नहीं बोलने वाले वित्त मंत्री अरूण जेटली पर कैसे भरोसा करें कि वह काले धन पर राजनीति नहीं कर रहे हैं? पूरा सच यह है कि एनडीए के राज में काला धन लिश्टेन्सटाइन और स्विट्जऱलैंड के बैंकों में ही नहीं, मारिशस से लेकर मोनाको तक, दुनिया के तमाम 'टैक्स हेवनÓ में गया । तय मानिये कि काले धन के सभी 800 खातेदारों के नाम उछलते ही देश की राजनीति में एक बड़ा तूफ ान खड़ा होगा। राजनीतिक दल एक-दूसरे के कपड़े फाड़ेंगे, और उन्हें चंदा देने वाले अदृश्य हाथ धमकाएंगे। प्रश्न यह है कि यदि किसी भारतीय ने अपने पूरे ब्योरे के साथ स्विस बैंकों में खाता खोला हुआ है, और भारत सरकार को कर अदा नहीं किया है, तो क्या उस धन को जब्त कर भारत लाया जा सकता है?
इस समय दुनिया भर में 70 से अधिक देश हैं, जो काले धन जमा करते हैं, जिन्हें 'टैक्स हेवनÓ कहा जाता है। इन्हें स्विट्जऱलैंड के उस अध्यादेश से प्रेरणा मिली थी, जिसके आधार पर ब्लैक मनी जमा करने वाले 20 प्रतिशत तक कर देकर, अपना काला धन सफेद कर सकते थे। स्विट्जऱलैंड ने प्रस्ताव भेजा था कि जर्मनी 50 अरब यूरो, और ब्रिटेन सात अरब पौंड लेकर काले धन को सफेद करने की अनुमति अपने नागरिकों को दे दे। स्विस बैंक 'यूबीएसÓ ने 52 हज़ार अमेरिकियों के काले धन को सफेद करने के लिए 78 अरब डॉलर देना स्वीकार कर लिया है। काले धन को सफेद करने की इस कार्रवाई को 'रूबिक डीलÓ कहा गया है। मोदी सरकार पर भारतीय उद्योग जगत का दबाव है कि काले धन की वापसी से बेहतर है कि स्विस बैंकों के भारतीय खाताधारकों पर जुर्माना लगाया जाए। जब अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी की ताकतवर सरकारें 'रूबिक डीलÓ के लिए राजी हैं, तो भारत के आगे क्या विकल्प हो सकता है?
भारत सरकार काले धन वालों को पकडऩे के लिए डबल टैक्सेशन एव्याएड एग्रीमेंट (डीटीएए) को भी एक कारगर हथियार मानती है। 88 देशों से भारत सरकार ने 'डीटीएएÓ समझौते किये हैं, जिनमें से एक स्विट्जऱलैंड भी है। 'डीटीएएÓ समझौते के तहत यदि किसी स्विस नागरिक का शेयर भारत की कंपनियों को ट्रांसफर होता है, तो उससे होने वाले पूंजी लाभ (कैपिटल गेन) पर भारत सरकार कर लगा सकती है। यही कराधान व्यवस्था स्विट्जऱलैंड में भारतीय निवेशकों के साथ लागू होती । ऐसे में क्या स्विट्जऱलैंड इसकी अनुमति देगा कि भारतीय खाताधारकों के पैसे भारत सरकार सरकार वापिस ले ले? यदि ऐसा हुआ तो स्विस बैंकिंग व्यवस्था बर्बाद हो जाएगी, और पूरी दुनिया के खातेदारों का उस पर से भरोसा उठ जाएगा। 'डीटीएएÓ में यह भी संकल्प किया गया है कि खाताधारकों के नाम सार्वजनिक नहीं किये जाएंगे। इसके बरक्स वित्तमंत्री अरूण जेटली यह बयान देते हैं कि अदालत में नाम जाते ही यह सार्वजनिक हो जाएगा। क्या यह 'डीटीएएÓ समझौते के विरूद्ध नहीं है? राजनीति की बदनाम गली में आठ सौ काले धनपतियों के नाम अवश्य गूंजेंगे, पर देश में काला धन आ जाएगा, ऐसा शायद ही संभव है!

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